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राजनीति: चिकित्सा शिक्षा के इलाज की दरकार

चिकित्सा के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में सीटें खाली रह जाने के आंकड़े चिंताजनक हैं। इसके दो कारण गिनाए जा रहे हैं। एक तो यह कि इन पाठ्यक्रमों की प्रवेश परीक्षा के लिए योग्य अभ्यर्थी पर्याप्त संख्या में नहीं मिले। दूसरे, जो योग्य विद्यार्थी मिले भी, उन्होंने इन पाठ्यक्रमों में पढ़ने से मना कर दिया। यह स्थिति तब है जब विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक 33 प्रतिशत भारतीय चिकित्सक डिग्री हासिल करने के बाद विदेश चले जाते हैं।

Author Published on: May 24, 2019 2:11 AM
स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने बताया था कि 14 लाख ऐलोपैथ चिकित्सकों की कमी है।

प्रमोद भार्गव

देश में हर साल पचास हजार चिकित्सक महाविद्यालयों से डिग्री लेकर निकलते हैं। वैश्विक स्तर पर भारतीय चिकित्सकों की अच्छी साख है। दुनिया की सबसे बड़ी चिकित्सा शिक्षा प्रणाली भी भारत में है। इसके बावजूद हमारे मेडिकल कॉलेजों में नए शोध नहीं हो रहे हैं। स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों की सीटें भी बड़ी संख्या में हर साल खाली रह जाती हैं। इन कमियों का खुलासा चिकित्सकों की महत्त्वपूर्ण संस्था एसोसिएशन आॅफ डिप्लोमैट नेशनल बोर्ड ने किया है। देश के कुल 576 चिकित्सा संस्थानों में से 332 ने एक भी शोध-पत्र प्रकाशित नहीं किया है। नए शोध अनुसंधान, नवाचार एवं अध्ययन-प्रशिक्षण का आधार होते हैं। यदि आधे से ज्यादा कॉलेजों में अनुसंधान नहीं हो रहे हैं, तो क्या इनसे पढ़ कर निकलने वाले चिकित्सकों की योग्यता व क्षमता विश्वसनीय रह जाएगी? दरअसल, हर स्नातकोत्तर छात्र को अंतिम परीक्षा के लिए मौलिक विषय व अनुसंधान से जुड़ा एक शोध-पत्र लिखना होता है। इसे थीसिस कहते हैं। यदि थीसिस नहीं लिखाई जा रही हैं, तो इससे उन शिक्षकों की योग्यता पर भी सवाल उठता है, जो थीसिस का विषय सुझाने के साथ मार्गदर्शक भी होते हैं। तब क्या यह मान लिया जाए कि मोटा वेतन लेने वाले चिकित्सा शिक्षक भी नवीन अध्ययन, चिंतन व मनन की परंपरा से किनारा करते जा रहे हैं! वैसे भी चिकित्सा शिक्षा से लेकर अन्य विषयों के ज्यादातर शोधों में गंभीरता दिखाई नहीं दे रही है। इसके पीछे शिक्षकों का निरंतर अध्ययनरत नहीं रहना एक बड़ा कारण है।

अब तक सरकारी चिकित्सा संस्थानों की शैक्षिक गुणवत्ता पर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन ध्यान रहे कि लगभग साठ प्रतिशत मेडिकल कॉलेज निजी क्षेत्र में हैं। ये संस्थान छात्रों से भारी-भरकम शुल्क तो वसूलते ही हैं, कैपीटेशन फीस लेकर प्रबंधन के कोटे में छात्रों की सीधी भर्ती करते हैं। ऐसे में छात्रों को शोध का अवसर नहीं देना चिकित्सा शिक्षा और छात्र के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। दूसरी तरफ चिकित्सकों को उपचार की विशेषज्ञता हासिल कराने वाले स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में सैकड़ों सीटें खाली रह जाती हैं। यह स्थिति भी शोध-पत्र नहीं लिखे जाने की एक वजह है। चिकित्सा से इतर विषयों के डिग्रीधारियों के लिए नौकरियों में कमी की बात तो समझ में आती है, कोई एमबीबीएस बेरोजगार हो, यह जानकारी नहीं मिलती! फिर क्या पीजी पाठ्यक्रमों में सीटें खाली रह जाना, निपुण छात्रों के अभाव का सूचक है या फिर छात्र स्वयं गंभीर पाठ्यक्रमों से दूर भाग रहे हैं? या फिर चिकित्सकों के सम्मान में जो कमी आई है और अस्पतालों में उन पर इलाज में लापरवाही का आरोप लगा कर जो हमले हो रहे हैं, उस भय की वजह से छात्र पीछे हट रहे हैं? अथवा भारतीय चिकित्सा परिषद के विधान में संशोधन कर वैकल्पिक चिकित्सा से जुड़े चिकित्सकों को एक सेतु-पाठ्यक्रम के जरिए ऐलोपैथी चिकित्सा करने की जो छूट दिए जाने की कवायद चल रही है, उसकी वजह से सीटें रिक्त रह जाती हैं?

जब कोई प्रचलित व्यवस्था संकट में आती है, तो कई संदेह और सवालों का उठना लाजिमी है क्योंकि चिकित्सा के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में खाली सीटें रह जाने के आंकड़े चिंताजनक हैं। इसके दो कारण गिनाए जा रहे हैं। एक तो यह कि इन पाठ्यक्रमों की प्रवेश परीक्षा के लिए योग्य अभ्यर्थी पर्याप्त संख्या में नहीं मिले। दूसरे, पीजी के लिए जो योग्य विद्यार्थी मिले भी, उन्होंने इन पाठ्यक्रमों में पढ़ने से मना कर दिया। यह स्थिति तब है, जब विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक 33 प्रतिशत भारतीय चिकित्सक डिग्री हासिल करने के बाद विदेश चले जाते हैं। इनमें से डेढ़ हजार डॉक्टर अमेरिका का रुख करते हैं।

ऐलोपैैथी चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि आज के विद्यार्थी उन पाठ्यक्रमों में अध्ययन करना नहीं चाहते, जिनमें विशेषज्ञता प्राप्त करने में लंबा समय लगता है। इसके उलट वे ऐसे पाठ्यक्रमों में दक्षता हासिल करना चाहते हैं जहां जल्दी ही विशेषज्ञता की उपाधि प्राप्त कर धन कमाने के अवसर मिल जाते हैं। गुर्दा, नाक, कान, दांत, गला रोग एवं विभिन्न तकनीकी जांच विशेशज्ञ 35 साल की उम्र पर पहुंचने के बाद शल्यक्रिया शुरू कर देते हैं, जबकि हृदय और तंत्रिका-तंत्र विशेषज्ञों को यह अवसर 40-45 साल की उम्र बीत जाने के बाद मिलता है। साफ है कि दिल और दिमाग का मामला बेहद नाजुक है, इसलिए इनमें लंबा अनुभव भी जरूरी है। लेकिन कल को यह समस्या बनी रही तो भविष्य में इन रोगों के उपचार से जुड़े चिकित्सकों की कमी होना तय है। इस व्यवस्था में कमी कहां है, इसे ढूंढ़ना और फिर उसका निराकरण करना तो सरकार और ऐलोपैैथी शिक्षा से जुड़े लोगों का काम है, लेकिन फिलहाल इसके कारणों की पृष्ठभूमि में भारतीय चिकित्सा परिषद को खारिज कर ‘राष्ट्रीय चिकित्सा परिषद’ यानी बनाना और चिकित्सा शिक्षा का लगातार महंगी होते जाना तो नहीं?

2016 में राष्ट्रीय चिकित्सा परिषद बनाने का मकसद चिकित्सा शिक्षा के गिरते स्तर को सुधारना, इस पेशे को भ्रष्टाचार मुक्त बनाना और निजी चिकित्सा महाविद्यालयों के अनैतिक गठजोड़ को तोड़ना था। लेकिन जब एनएमसी विधेयक का प्रारूप तैयार हुआ और उसका विशेषज्ञों ने मूल्याकंन किया तो आभास हुआ कि कालांतर में यह विधेयक कानूनी रूप ले लेता है तो इससे आधुनिक ऐलोपैथी चिकित्सा ध्वस्त हो जाएगी। इसकी खामियों को देखते हुए ही एमबीबीएस चिकित्सक इसके विरोध में खड़े हो गए। इस विधेयक की सबसे प्रमुख खामी है कि आयुर्वेद, होम्योपैथी और यूनानी चिकित्सक भी सरकारी स्तर पर एक छोटा कोर्स करके वैधानिक रूप से ऐलोपैथी चिकित्सा करने के हकदार हो जाएंगे। हालांकि अभी भी इनमें से ज्यादातर चिकित्सक बेखटके ऐलोपैथी की दवाएं लिखते हैं, पर यह व्यवस्था अभी गैर-कानूनी है। दरअसल, उपचार की हरेक पद्धति सैकड़ों साल के प्रयोग व प्रशिक्षण से परिपूर्ण हुई है। सबकी पढ़ाई भिन्न है। रोग के लक्षणों को जानने के तरीके और दवाएं भी भिन्न हैं। ऐसे में चार-छह माह की पढ़ाई करके कोई भी वैकल्पिक चिकित्सक ऐलोपैथी का डॉक्टर नहीं हो सकता?

एमबीबीएस और इससे जुड़े विषयों में पीजी में प्रवेश बहुत कठिन होता है। एमबीबीएस में कुल 67,218 सीटें हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन 1000 की आबादी पर एक डॉक्टर की मौजदूगी अनिवार्य मानता है, लेकिन हमारे यहां यह अनुपात 0.62.1000 है। 2015 में राज्यसभा में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने बताया था कि 14 लाख ऐलोपैथ चिकित्सकों की कमी है। अब यह कमी 20 लाख हो गई हैं। इसी तरह 40 लाख नर्सों की कमी है। इसके बावजूद एमबीबीएस शिक्षा के साथ कई तरह के खिलवाड़ हो रहे हैं। कायदे से उन्हीं छात्रों को मेडिकल कॉलेज में प्रवेश मिलना चाहिए जो सीटों की संख्या के अनुसार नीट परीक्षा से चयनित हुए हैं। लेकिन आलम है कि जो छात्र दो लाख से ऊपर की रैंक में हैं, उन्हें भी धन के बूते प्रवेश मिल जाता है। यह स्थिति इसलिए बनी हुई है कि जो मेधावी छात्र निजी कॉलेज की फीस अदा करने में सक्षम नहीं हैं, वे मजबूरीवश अपनी सीट छोड़ देते हैं। बाद में इसी सीट को निचली श्रेणी में स्थान प्राप्त छात्र खरीद कर प्रवेश पा जाते हैं।

इस सीट की कीमत 60 लाख से एक करोड़ तक होती है। मतलब यह कि जो छात्र एमबीबीएस में प्रवेश की पात्रता नहीं रखते हैं, वे अपने अभिभावकों की अनैतिक कमाई के बूते इस पवित्र और जिम्मेवार पेशे के पात्र बन जाते हैं। ऐसे में इनकी अपने दायित्व के प्रति कोई नैतिक प्रतिबद्धता कितनी होगी यह समझा जा सकता है। अपने बच्चों को हर हाल में मेडिकल और आईटी कॉलेजों में प्रवेश दिलाने की यह महत्त्वाकांक्षा रखने वाले अभिभावक यही तरीका अपनाते हैं। देश के सरकारी कॉलेजों का एक साल का शुल्क महज चार लाख है, जबकि निजी विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों में यही शुल्क 64 लाख है। यही धांधली एनआरआई और अल्पसंख्यक कोटे के छात्रों के साथ बरती जा रही है। एमडी में प्रवेश के लिए निजी संस्थानों में जो प्रबंधन के अधिकार क्षेत्र और अनुदान आधारित सीटें हैं, उनमें प्रवेश शुल्क की राशि दो करोड़ से पांच करोड़ है। इसके बावजूद सामान्य प्रतिभाशाली छात्र के लिए एमबीबीएस परीक्षा कठिन बनी हुई है।

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