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राजनीति: लोकपाल और चुनौतियां

भ्रष्टाचार की व्यापकता और उसकी स्वीकार्यता जिस अनुपात में समाज में व्याप्त हो चुकी है, उसका निर्मूलन इस अकेले कानून से संभव नहीं है। इसके बावजूद अब लोकपाल अस्तित्व में आ गया है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि निरंकुश जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई संभव होगी।

जस्टिस पीसी घोष को भारत का पहला लोकपाल नियुक्त किया गया है। (फोटो सोर्स: एक्सप्रेस आर्काइव)

अड़तालीस साल बाद देश को लोकपाल मिला है। लोकपाल के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन समिति ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश पिनाकी चंद्र घोष का नाम तय किया था। राष्ट्रपति ने मंगलवार को इसे विधिवत मंजूरी दे दी। अब भारत में लोकपाल नाम की संस्था अस्तित्व में आ गई है। साढ़े पांच साल पहले लोकपाल कानून बन जाने के बावजूद लोकपाल की नियुक्ति नहीं हो पा रही थी। लोकपाल की नियुक्ति की जो प्रक्रिया है, उसमें विपक्ष के नेता को भी एक सदस्य के रूप में शामिल किए जाने का प्रावधान है। 2014 के आम चुनाव के बाद लोकसभा का जो गणित बना था, उसमें किसी भी दल की विपक्ष के नेता का दर्जा पाने की हैसियत नहीं रही। हालांकि कांग्रेस चवालीस सदस्यों के साथ लोकसभा में सबसे बड़ा विपक्षी दल है, पर सदन में उसी पार्टी का नेता प्रतिपक्ष बनता है, जिसके लोकसभा के कुल सदस्यों की संख्या कम से कम दस फीसद हो। लिहाजा, कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को लोकसभा अध्यक्ष ने प्रतिपक्ष का नेता मानने की कांग्रेस की अपील खारिज कर दी थी। हालांकि न्यायालय ने 2017 में दिए एक फैसले में स्पष्ट कर दिया था कि संसद में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी का नेता ही, नेता प्रतिपक्ष कहलाएगा। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर लोकसभा में कांग्रेस सबसे बड़ा विपक्षी दल था, इसलिए उसके नेता खड़गे को केंद्र सरकार ने समिति का विशेष आमंत्रित सदस्य बना दिया। किंतु खड़गे ने यह सदस्यता स्वीकार नहीं की, नतीजतन वे समिति की बैठक में हाजिर नहीं हुए। बहरहाल, लोकपाल आंदोलन के जनक अण्णा हजारे के आंदोलन ने अंतत: देश को पहला लोकपाल दे दिया।

गांधीजी ने कहा था, ‘सच्चा स्वराज थोड़े से लोगों द्वारा सत्ता हासिल कर लेने से नहीं, बल्कि जब सत्ता का दुरुपयोग हो, तब सब लोगों द्वारा उसका प्रतिकार करने की क्षमता जगा कर ही प्राप्त किया जा सकता है।’ इस नजरिए से राजकाज में बदलाव लाने का यह सक्रिय हस्तक्षेप और इसकी प्रासंगिकता दोहराई जाती रहनी चाहिए, जिससे इस प्रक्रिया के माध्यम से भारतीय लोकतंत्र ने जो उपलब्धि हासिल की है, उसकी निरंतरता बनी रहे। भ्रष्टाचार की व्यापकता और उसकी स्वीकार्यता जिस अनुपात में समाज में व्याप्त हो चुकी है, उसका निर्मूलन इस अकेले कानून से संभव नहीं है। इसके बावजूद अब लोकपाल अस्तित्व में आ गया है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि निरंकुश जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई संभव होगी।

लोकपाल से संबद्ध जो पूरक विधेयक लंबित हैं, उनके प्रारूप को भी वैधानिक दर्जा मिलना जरूरी है। तभी लोकपाल जैसे सशक्त प्रहरी की वास्तविक सार्थकता सामने आएगी। लोकसेवकों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के समावेश भी तभी परिलक्षित होंगे। अगर विपक्ष या सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा जन हस्तक्षेप कालांतर में जारी नहीं रहता है तो लोकपाल जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने वाला नहीं है। केंद्र सरकार की लोकपाल के बाबत शिथिलता के चलते यह अनुभव हुआ है कि संसद में किसी एक दल को असाधारण बहुमत मिलना भी लोकहित में लाभदायी नहीं है। जबकि सच्चाई यह है कि ऐसी ही स्थिति में लोकपाल की अधिक जरूरत है, जिससे लोकसेवक भय का अनुभव करते रहें। हमारे देश में 1963 में पहली बार लोकपाल की अवधारणा सामने आई थी।

भारत में भ्रष्टाचार ने सरकारी विभागों से लेकर सामाजिक सरोकारों से जुड़ी सभी संस्थाओं को अपनी चपेट में ले लिया है। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मानवीय मूल्यों से जुड़ी संस्थाएं भी इससे अछूती नहीं हैं। नौकरशाही को तो छोड़िए, देश व लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्था संसद की संवैधानिक गरिमा बनाए रखने वाले सांसद भी सवाल पूछने और चिट्ठी लिखने के एवज में रिश्वत लेने से नहीं हिचकिचाते। न्यायाधीशों को भी कदाचार के कठघरे में लाया गया है। जाहिर है, भ्रष्टाचार लोकसेवकों के जीवन का एक तथ्य मात्र नहीं, बल्कि शिष्टाचार के मिथक में बदल गया है। जनतंत्र में भ्रष्टाचार की मिथकीय प्रतिष्ठा उसकी हकीकत में उपस्थिति से कहीं ज्यादा घातक इसलिए है कि मिथ हमारे लोक-व्यवहार में आदर्श स्थिति के नायक-प्रतिनायक बन जाते हैं। राजनीतिक व प्रशासनिक संस्कृति का ऐसा क्षरण राष्ट्र को पतन की ओर ही ले जाएगा। इसीलिए साफ दिखाई दे रहा है कि सत्ता पक्ष की गड़बड़ियों पर सवाल उठाना, संसदीय विपक्ष के बूते से बाहर होता जा रहा है। विडंबना यह है कि जनहित से जुड़े सरोकारों के मुद्दों को सामने लाने का काम न्यायपालिका को करना पड़ रहा है।

राजनीतिक संस्कृति के इस क्षरण और पतन को रोकने का पहला दायित्व तो उस विधायिका का था, जो रामलीला मैदान में अण्णा आंदोलन के चरम उत्कर्ष पर पहुंचने के दौरान, संसद की सर्वोच्चता और गरिमा का स्वांग तो रच रही थी, लेकिन जनता को दोषमुक्त शासन-प्रणाली देने की दृष्टि से एक कदम भी कानूनी प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ा रही थी। इसमें कोई दोराय नहीं कि संविधान के अनुसार संसद हमारे राष्ट्र की सर्वोच्च विधायी शक्ति व संस्था है। लोकतांत्रिक राजनीतिक संरचना में उसी का महत्त्व सर्वोपरि है। लेकिन जिस तरह से वह व्यापक व समावेशी भूमिका निर्वहन में गौण होती चली जा रही है, उस परिप्रेक्ष्य में उसकी कार्य संस्कृति का प्रदूषित होते जाना तो था ही, जन सरोकारों से आंखें मूंद लेना भी था। संसद की गरिमा को नष्ट करने का काम विधायिका में स्थापित होती जा रही व्यक्ति केंद्रित राजनीतिक शैली ने भी किया है।

राजनेताओं की उम्मीदवारी का निर्धारण आर्थिक व जातीय हैसियत से किए जाने के कारण भी, इस जनतांत्रिक व्यवस्था का क्षय हुआ है। राजनीति में अर्थ की महत्ता ने नैतिक सरोकारों को हाशिये पर खदेड़ दिया। संविधान निर्माताओं ने समता व न्याय पर आधारित और मानवीय गरिमा से प्रेरित भारतीय संप्रभुता के जो आदर्श स्थापित किए थे, उसकी अवहेलना इसी विधायिका ने की। संविधान-सम्मत कोई भी व्यवस्था कितनी भी श्रेष्ठ क्यों न हो, उसकी स्वीकार्यता तभी संभव होती है जब देश की जनता का बहुमत उसके साथ हो। डॉ भीमराव आंबेडकर ने 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा की बैठक में कहा था, ‘संविधान का कार्य पूर्णत: संविधान की प्रकृति पर निर्भर नहीं करता। संविधान सिर्फ विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका को शक्ति देता है। राज्य के इन स्तंभों की क्रियात्मकता जिन कारकों पर अवलंबित है, वे हैं जनता-जनार्दन और राजनीतिक दल। उनकी आकांक्षाएं और राजनीति ही मुख्य निर्धारक आधार बिंदु हैं। जनता और दलों के भावी व्यवहार के बारे में कौन सटीक आकलन कर सकता है?’ डा. आंबेडकर की यह आशंका सही साबित हुई। कालांतर में हमारे राजनीतिकों के व्यक्तित्व से सैद्धांतिक व्यवहार और आमजन के प्रति विश्वास दुर्लभ तत्त्व होते चले गए।

राजनीति परिणाममूलक रहे, इसके लिए जरूरी है कि राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था लोक की निगरानी में रहें। जरूरत पड़ने पर आंदोलन भी होते रहें। इसी के समांंतर विधायिका और कार्यपालिका का दायित्व बनता है कि जनतंत्र से उपजने वाली असहमतियों का वे सम्मान करें और उसके अनुरूप चलें, क्योंकि भारतीय प्रजातंत्र में अब तक बड़े समुदायों को लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से जुदा रखा गया है। कानून बनाने में उनकी सलाह या साझेदारी को स्वीकार नहीं किया गया। लिहाजा, कानूनों को जन समुदायों पर ऊपर से थोप दिया जाता है। पंचायती राज प्रणाली का भी यही हश्र हुआ। कुछ ऐसी ही वजहें रहीं कि लोकतंत्र का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ ‘संविधान’ और सर्वोच्च संस्था ‘संसद’ वास्तविक व्यवहार में जनता से दूरी बनाते चले गए और इनसे प्रदत्त अधिकार विशेषाधिकार प्राप्त सांसदों व विधायकों में सिमटते चले गए। इस परिप्रेक्ष्य में लोकपाल कितना सुधार कर पाते हैं, यह भविष्य में देखने में आएगा।

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