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राजनीति: जाते मानसून के सबक

इस बार के मानसून ने जाते-जाते हमें जो सबक दिए हैं, उनमें सबसे बड़ा सबक जल प्रबंधन का ही है। हमें तत्काल एक ऐसी योजना बनाने के बारे में सोचना चाहिए कि प्राकृतिक संसाधन के रूप में जितना पानी हर साल उपलब्ध होता है, उसका ज्यादा से ज्यादा लाभकारी इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है। जितना पानी हम इस्तेमाल कर रहे हैं, उससे दुगना पानी बाढ़ की तबाही मचाता हुआ बेकार न जाए।

Author Published on: October 16, 2019 1:46 AM
गौरतलब है कि औसत से दस फीसद ज्यादा या दस फीसद कम बारिश को असामान्य घटना माना जाता है।

सुविज्ञा जैन

इस बार मानसून कई सबक देकर जा रहा है। वैसे मानसून का अपना तय समय एक जून से तीस सितंबर है। माना जाता है कि एक सितंबर से मानसून लौटना शुरू हो जाता है। लेकिन इस साल मानसून की विदाई चालीस दिन देर से हो रही है। पिछले पचास साल में पहली बार ऐसा हुआ है जब मानसून इतनी देर से जा रहा है। मानसून खत्म होने की निर्धारित तारीख के दो हफ्ते बाद तक देश के कई हिस्सों में इतना ज्यादा पानी गिरा जितना आमतौर पर जुलाई-अगस्त के दिनों में गिरा करता था। कुल मिला कर सरकारी मौसम विभाग के सारे अनुमान इस साल बुरी तरह गड़बड़ा गए।

पूर्वानुमानों की गलती की नापतोल करें तो कहा जा सकता है कि इन अनुमानों में चौदह फीसद का अंतर पड़ गया। मौसम विभाग ने वर्षा काल शुरू होने के पहले अपनी अत्याधुनिक वैज्ञानिक पद्धति से अनुमान लगाया था कि इस साल पिछले पचास साल के औसत से चार फीसद पानी कम गिरेगा। यानी अनुमान छियानवे फीसद बारिश का था, लेकिन बरस गया एक सौ दस फीसद। गौरतलब है कि वैज्ञानिक आकलन में चार फीसद कम या चार फीसद ज्यादा की एक खिड़की बना कर रखी जाती है। उस लिहाज से ज्यादा से ज्यादा सौ फीसद वर्षा का अनुमान था, वह भी दस फीसद गलत हो गया। वैसे तो पिछले कई साल से पूर्वानुमानों में गड़बड़ी होती रही है। इस साल मानसून के अपने पूर्वानुमानों से मौसम विज्ञानियों को एक बड़ा सबक मिला है।

यह तो उस पूर्वानुमान की बात हुई है जो पूरे देश में कहीं ज्यादा और कहीं कम बारिश होने के आंकड़ों को जोड़ कर और भाग देकर निकाला जाता है। अगर देश के अलग-अलग चार जोन के पूर्वानुमानों को वास्तविक वर्षा से मिलान करें तो पता चलेगा कि गलती की और ज्यादा हद हो गई। मसलन, बारिश के पहले अनुमान बताया गया था कि मध्य भारत में सौ फीसद बारिश होगी। इस अनुमान के मुताबिक मध्य भारत में बानवे फीसद से लेकर एक सौ आठ फीसद के बीच पानी गिरने की बात कही गई थी, लेकिन बरस गया एक सौ उनतीस फीसद।

लगभग यही हालत दक्षिण प्रायद्वीप क्षेत्र की हुई। पूर्वानुमान था सनतानवे फीसद का और वास्तविक वर्षा हुई एक सौ सोलह फीसद। देश के उत्तर-पश्चिम और उत्तर पूर्वी क्षेत्रों में सामान्य वर्षा जरूर दर्ज हुई, लेकिन कई जगह सामान्य से बहुत कम बारिश के कारण अलग तरह की समस्या पैदा होने का अंदेशा सिर पर है। मसलन, देश के चार क्षेत्रों में जो कुल छत्तीस उपसंभाग हैं उनमें से पांच में अस्सी फीसद से भी कम बारिश हुई है। जहां बीस फीसद कम बारिश हो उन क्षेत्रों को पानी की कमी के लिहाज से संवेदनशील माना जाने लगता है।

अभी हमें सही-सही पता नहीं है कि इस बार देश में जो ताबड़तोड़ बारिश हुई है, उस पानी को हम कितना रोक कर रख पाए। लेकिन इतना तय है कि देश के पास सामान्य वर्षा के पानी को भी रोक कर रखने लायक बांध या जलाशय नहीं हैं। पचास साल के औसत जितनी यानी सौ फीसद बारिश हो तो देश में करीब सात सौ अरब घनमीटर सतही जल उपलब्ध होता है। लेकिन हमारे पास इस समय कुल दो सौ सत्तावन अरब घनमीटर पानी रोक कर रखने भर के बांध हैं। इसलिए यह बिल्कुल सोचना निरर्थक होगा कि अगर देश में ज्यादा पानी गिरा है तो आने वाले दिनों में पानी की कमी नहीं पड़ेगी। वैसे भी केंद्रीय जल आयोग के आंकड़े को देखें तो मानसून की निर्धारित अंतिम तिथि के फौरन बाद यानी तीन अक्तूबर के दिन देश के मुख्य बांधों में सिर्फ एक सौ बहत्तर अरब घनमीटर पानी जमा हो पाया था, जो अपनी कुल क्षमता का छियासठ फीसद है। जाहिर है, इस बार बादलों से जो लबालब पानी मिला था, वह नदियों से होता हुआ और बाढ़ की तबाही मचाता हुआ वापस समुद्र में चला गया।

गौरतलब है कि औसत से दस फीसद ज्यादा या दस फीसद कम बारिश को असामान्य घटना माना जाता है। इस बार के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो देश के छत्तीस उपसंभागों में से बारह उपसंभाग अतिवर्षा से पीड़ित हुए हैं। जिन उपसंभागों में औसत से बीस फीसद या उससे भी ज्यादा बारिश होती है, उन्हें असामान्य रूप से ज्यादा वर्षा की श्रेणी में रखा जाता है। इस बार अतिवर्षा का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इन उपसंभागों में दस ऐसे हैं जिनमें औसत से बीस फीसद से लेकर उनसठ फीसद तक ज्यादा बारिश हुई। दो उपसंभागों में साठ फीसद से भी ज्यादा पानी गिरा। देश के जो इलाके अतिवर्षा से पीड़ित हुए हैं, उनकी व्यथा पिछले डेढ़ महीने से पूरा देश देख ही रहा है।

इस बार के मानसून से एक सबक यह भी मिला है कि देश के पास औसत से कम से कम दस या पंद्रह फीसद ज्यादा बारिश की सूरत में बाढ़ से बचाव का इंतजाम तो होना ही चाहिए। यह कोई बहुत बड़ा काम नहीं है, बल्कि पिछले कुछ साल से देश जिस तरह पानी की कमी से जूझता दिखने लगा है, उस हिसाब से तो वर्षा के ज्यादा से ज्यादा पानी को सुरक्षित तरीके से जमा करने की हमें सख्त जरूरत है। बांधों और जलाशयों में पानी को रोक कर बाढ़ से बचाव तो एक बोनस जैसा होगा।
बाढ़ या सूखे से बचाव, जल संचयन या जल प्रबंधन का काम जल विज्ञानियों का है। भारत में जल विज्ञानी आमतौर पर सिविल इंजीनियर ही होते हैं, क्योंकि ये इंजीनियर ही बांध और नहरें बनाने का विशेषज्ञ कार्य कर सकते हैं। वर्षाकाल में बांधों में जल भंडारण पर निगरानी का काम भी इन्हीं के जिम्मे होता है। लेकिन देश के स्तर पर जल प्रबंधन का अर्थशास्त्र और जल प्रबंधन की सांख्यिकी का विशेषज्ञ होना बिल्कुल ही अलग बात है। सार्वजनिक निर्माण अभियांत्रिकी में हुनरमंद बनाए गए पेशेवरों से यह उम्मीद करना कि वे मौसम विज्ञान में भी पटु हों, अर्थशास्त्र को भी समझें और सांख्यिकी के नुक्ते भी जानें, प्रबंधन भी देखें, उन पर ज्यादती ही है। जाहिर है, जल प्रबंधन के काम को एक अंतर-विषयक कार्य बनाने की जरूरत है और उनके बीच समन्वय के लिए प्रबंधन प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों को बीच में लाने की दरकार है।

आज के जमाने में जब देश में हर क्षेत्र की व्यवस्थाओं में प्रबंधन प्रौद्योगिकी का महत्त्व समझा जा रहा हो, अगर जल प्रबंधन में प्रबंधन प्रौद्योगिकी का दखल न दिखता हो, तो इस स्थिति पर आश्चर्य जताया जाना चाहिए। सबसे ज्यादा हैरत इस बात पर होनी चाहिए कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों से तो हम उम्मीद कर लेते हैं कि जल प्रबंधन की जटिलताओं को वे समझ लेंगे, लेकिन जल प्रबंधन के काम में प्रबंधन प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करने की तरफ हमारा ध्यान नहीं है। जबकि जल प्रबंधन में प्रबंधन शब्द का इस्तेमाल हम दशकों और सदियों से करते आ रहे हैं।

इस बार के मानसून ने जाते-जाते हमें जो सबक दिए हैं, उनमें सबसे बड़ा सबक जल प्रबंधन का ही है। हमें तत्काल एक ऐसी योजना बनाने के बारे में सोचना चाहिए कि प्राकृतिक संसाधन के रूप में जितना पानी हर साल उपलब्ध होता है, उसका ज्यादा से ज्यादा लाभकारी इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है। जितना पानी हम इस्तेमाल कर रहे हैं, उससे दुगना पानी बाढ़ की तबाही मचाता हुआ बेकार न जाए।

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