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राजनीति: रिश्तों की कूटनीति में भारत का बाजार

इन दिनों चीन खुद अमेरिका के साथ व्यापार युद्ध में उलझा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के व्यापार युद्ध ने चीन के उद्योगों और विकास दर को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। चीनी निर्यात पर अमेरिका द्वारा बढ़ाए गए शुल्क का असर चीनी अर्थव्यवस्था पर तेजी से पड़ रहा है। इस स्थिति में भारत का विशाल बाजार चीन के लिए बड़ी ताकत बना हुआ है।

Author Published on: October 15, 2019 1:07 AM
लगभग साढ़े तीन हजार किलोमीटर लंबी भारत-चीन सीमा को लेकर दोनों देशों के बीच काफी लंबे समय से विवाद है।

महाबलीपुरम में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच दोनों मुल्कों में आपसी रिश्तों को बेहतर बनाने के लिए बात हुई। इसी में आतंकवाद से लेकर कारोबार, सीमा विवाद आदि मुद्दे भी आए। दोनों पक्षों ने ‘चेन्नई कनेक्ट’ को भारत-चीन संबंधों में नए युग की शुरुआत बताया है। उम्मीद की जा रही है कि वुहान से आगे महाबलीपुरम में विश्वास और बढ़ा है। यह पूरे दक्षिण एशिया के विकास, क्षेत्रीय सहयोग और शांति के लिए जरूरी है। सहयोग और शांति के लिए संवाद ही महत्त्वपूर्ण उपाय है। हालांकि भारत-चीन के बीच तमाम विवादों का हल निकालने में चीन ने पिछले साठ सालों में कोई खास रुचि नहीं दिखाई है। लगभग साढ़े तीन हजार किलोमीटर लंबी भारत-चीन सीमा को लेकर दोनों देशों के बीच काफी लंबे समय से विवाद है।

जम्मू-कश्मीर को लेकर चीन पूरी तरह से पाकिस्तान के साथ है। भारत-चीन के बीच होने वाले द्विपक्षीय व्यापार में व्यापार संतुलन चीन के पक्ष में है। व्यापार संतुलन चीन के पक्ष में होने के कारण भारत की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ा है। भारत के निर्यात घाटे का असर अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। इसके अलावा चीन बंगाल की खाड़ी से लेकर अरब सागर और हिंद महासागर तक में भारत की घेरेबंदी कर रहा है और अपनी सामरिक स्थिति मजबूत कर रहा है।

लंबे समय तक तनाव के बाद राजीव गांधी की सरकार ने चीन के साथ संवाद शुरू किया था। उनके कार्यकाल में विदेश सचिव स्तर पर भारत और चीन की बातचीत शुरू हुई थी। इस परंपरा को अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में जारी रखा गया। अब दोनों मुल्कों के मुखिया अनौपचारिक बैठक कर रहे हैं। समय की मांग यही है कि दोनों देशों के बीच संवाद से विश्वास कायम हो। इसी में दोनों देशों का हित है। पर इसके लिए जरूरी है कि संवाद यथार्थ के धरातल पर हो। हमें स्वीकार करना होगा कि चीनी विदेश नीति चीन के हितों पर आधारित है।

चीन भारत से बातचीत के दौरान कहीं भी अपने हितों का त्याग नहीं करेगा। चीन भारत का विशाल बाजार नहीं खो सकता। भारतीय बाजार में चीनी उत्पादों की भरमार ने सिर्फ भारत के व्यापार घाटे को नहीं बढ़ाया है, बल्कि भारतीय कृषि और उद्योग जगत की कमर तोड़ दी है। इसे आंकड़ों से समझने की जरूरत है। 2018-19 में भारत का कुल व्यापार घाटा एक सौ तीन अरब डॉलर था। इसमें चीन की भागीदारी तिरपन अरब डॉलर की थी, आधे से भी ज्यादा। चीनी निर्यात ने भारतीय कृषि और उद्योग जगत को खासा नुकसान पहुंचाया है। वुहान और महाबलीपुरम दोनों ही बैठकों में व्यापार संतुलन पर बातचीत हुई, लेकिन इसका परिणाम क्या होगा, इसका फिलहाल अंदाज लगा पाना मुश्किल है।

इन दिनों चीन खुद अमेरिका के साथ व्यापार युद्ध में उलझा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के व्यापार युद्ध ने चीन के उद्योगों और विकास दर को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। चीनी निर्यात पर अमेरिका द्वारा बढ़ाए गए शुल्क का असर चीनी अर्थव्यवस्था पर तेजी से पढ़ रहा है। इस स्थिति में भारत का विशाल बाजार चीन के लिए बड़ी ताकत बना हुआ है। चीन जल्द से जल्द सोलह देशों के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार संधि (क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी) को लागू करवाने की कोशिश में है, क्योंकि इससे सबसे ज्यादा लाभ चीन को ही होना है। भारत भी इस संधि में भागीदार बनने जा रहा है। हालांकि भारतीय कृषि और उद्योग जगत ने इस संधि का कड़ा विरोध किया है। इस संधि में शामिल होने के बाद भारत के कृषि उत्पाद, वस्त्र, इस्पात सहित कई बड़े उद्योग प्रभावित होंगे।

डेरी क्षेत्र को भी इससे नुकसान पहुंचेगा। इस संधि में भारत के शामिल होने के बाद चीनी सामान से भारतीय बाजार भर जाने की आशंका भी जताई जा रही है।
इस बात को पूरी दुनिया मान रही है कि चीन एक बहुत बड़ी आर्थिक ताकत है। चीन की अर्थव्यवस्था इस समय चौदह लाख करोड़ डॉलर की है। यह भारत की अर्थव्यवस्था से पांच गुनी बड़ी है। भारत की अर्थव्यवस्था पौने तीन लाख करोड़ डॉलर की है। आठवें दशक तक भारत की अर्थव्यवस्था का आकार चीन की अर्थव्यवस्था के बराबर था।

चीन आज अपने रक्षा बजट पर ढाई सौ अरब डॉलर सालाना खर्च कर रहा है। उसने अमेरिका की तर्ज पर दुनिया के कई बंदरगाहों को विकसित कर अपने सैन्य अड्डे विकसित करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाए हैं। चीन के सार्वजनिक क्षेत्र से लेकर निजी क्षेत्र की कंपनियां तक पूरी दुनिया में निवेश कर रही हैं। जहां भारतीय कंपनियां विदेशों में पूंजी निवेश को लेकर सोचती हैं, वहीं चीन की कंपनियां विदेशों में दनादन पैसे लगा रही हैं।

अफ्रीकी से लेकर एशियाई देश तक चीनी पूंजी के गिरफ्त में हैं। भारत के पड़ोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमा और नेपाल में चीन ने खासा निवेश किया है। पाकिस्तान में साठ अरब डॉलर और बांग्लादेश में अड़तीस अरब डॉलर के निवेश पर चीन ने काम शुरू कर रखा है। म्यांमा में चीन खासा निवेश कर चुका है। भारत का पड़ोसी नेपाल चीन की बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव परियोजना का भागीदार बन चुका है। चीन-नेपाल के बीच बृहद हिमालयन रेल, रोड जोड़ योजना पर काम शुरू हो चुका है।

दरअसल जिनपिंग महाबलीपुरम से वापसी के वक्त नेपाल पहुंचे थे। दिलचस्प बात यह थी कि चीनी मीडिया ने जिनपिंग की महाबलीपुरम यात्रा से ज्यादा नेपाल यात्रा को महत्त्व दिया। इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता है कि महाबलीपुरम की यात्रा से पहले जिनपिंग ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान से मुलाकात कर संकेत दिया था कि पाकिस्तान चीन के लिए काफी अहमियत रखता है। जिनपिंग की भारत यात्रा से ठीक पहले इमरान खान का चीन दौरा और महाबलीपुरम से लौटते हुए जिनपिंग का नेपाल जाना भारत के लिए सांकेतिक इशारा था कि भारत के दो पड़ोसी मुल्क चीन के लिए भारत से ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं। नेपाली प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली अपने भारत विरोध और चीन समर्थन के लिए खासे जाने जाते हैं।

मोदी और जिनपिंग का संवाद अच्छे परिणाम लाएगा, इसकी पूरी उम्मीद है। लेकिन महाबलीपुरम में जिनपिंग ने कश्मीर को लेकर कोई बात नहीं की। शायद भारत यह मान कर चल रहा है कि कश्मीर पर चीन की नीति में कोई बदलाव नहीं आएगा। जम्मू-कश्मीर को लेकर चीन पाकिस्तान के साथ खड़ा होगा, यह भारतीय कूटनीति के निर्धारकों को पता है। गिलगित-बलतिस्तान, अक्साईचिन और पाक अधिकृत कश्मीर में चीन के आर्थिक हित हैं। यहां पर चीन ने अरबों डॉलर का पूंजी निवेश किया है। भारतीय कूटनीति की परीक्षा यहीं पर होगी। कश्मीर को लेकर चीन, मलेशिया और तुर्की पाकिस्तान के साथ खुल कर खड़े हैं।

महाबलीपुरम वार्ता से पहले पाकिस्तान में तैनात चीनी राजदूत ने कश्मीर को लेकर भारत के खिलाफ बयानबाजी की। चीनी विदेश मंत्री ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में भी कश्मीर को लेकर पाकिस्तान के पक्ष में मोर्चा खोला। लेकिन चीन से होने वाले भारी आयात पर भारत अभी तक चुप है। महाबलीपुरम में कश्मीर पर जिनपिंग ने कोई बातचीत ही नहीं की। हालांकि भारत के पास इस समय चीन से विरोध जताने के लिए काफी कुछ है। अमेरिका चीन को हांगकांग, तिब्बत और पश्चिमी चीन में मानवाधिकार दमन पर लगातार घेर रहा है। उइगुर मुसलमानों के दमन को आधार पर बना कर अमेरिका ने हाल में कुछ चीनी कंपनियों पर प्रतिबंध भी लगाया है। लेकिन भारत फिलहाल हांगकांग तिब्बत और उइगुर मुसलमानों के मानवाधिकारों को लेकर चुप है।

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