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राजनीति: ट्रंप के निशाने पर भारत

ट्रंप प्रशासन के दबाव में भारत ने ईरान से तेल आयात बंद कर दिया। भारत ईरान से रोजाना साढ़े चार लाख बैरल तेल आयात करता था। ईरान भारत को तेल आयात के बिल भुगतान के लिए साठ दिन का समय देता था। यह छूट दूसरे तेल निर्यातक देश नहीं देते हैं। लेकिन ट्रंप की नजर सिर्फ भारतीय तेल बाजार पर नहीं है, वे भारत के रक्षा बाजार पर भी नजरें गड़ाए हुए हैं।

Author June 4, 2019 1:59 AM
पीएम मोदी खुद को ट्रंप का अच्छा मित्र बताते रहे हैं। (फाइल फोटो)

संजीव पांडेय

पिछले कुछ समय में अमेरिकी प्रशासन का यह दूसरा झटका है। ट्रंप प्रशासन ने व्यापार में वरीयता की सामान्य व्यवस्था के तहत भारत को मिलने वाले प्रशुल्क छूट के लाभ को समाप्त कर दिया है। भारत को यह छूट अमेरिका सामान्य तरजीही व्यवस्था (जीएसपी) के तहत विकासशील देशों को मिलने वाली छूट के तहत देता था। ट्रंप के इस फैसले से भारत का लगभग छह अरब डॉलर का निर्यात प्रभावित होगा। अमेरिकी प्रशासन का यह फैसला भारतीय उद्योग जगत को झटका है। इससे भारत के कई उत्पाद अमेरिका में शुल्क लगने के कारण महंगे होंगे। इनकी प्रतिस्पर्धा की क्षमता कम होगी। ट्रंप ने साफ किया है कि भारत अपने बाजार को अमेरिकी निर्यात के लिए खोले। अगर नहीं खोलेगा तो भविष्य में भारत की मुश्किलें और बढ़ेंगी। ट्रंप का कहना है कि भारत अपने बाजार को अमेरिकी सामान के लिए नहीं खोल रहा है। इसलिए पांच जून से भारत का लाभार्थी विकासशील देश का दर्जा समाप्त करना उचित है। चीन के बाद अब भारत अमेरिका के निशाने पर है। वैसे तो अमेरिका भारत को एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अपना सहयोगी बताता रहा है। लेकिन ट्रंप प्रशासन का यह फैसला भारतीय अर्थव्यवस्था की चुनौतियों को और बढ़ाएगा। यह शुरुआत है। ईरान से तेल आयात पर अमेरिकी प्रतिबंध के कारण भारत की मुश्किलें पहले से ही बढ़ी हुई हैं।

भारतीय निर्यात को हतोत्साहित करने की नीति अपनाए जाने के संकेत ट्रंप प्रशासन ने पहले ही दे दिए थे। चीन के साथ ही ट्रंप के निशाने पर यूरोपीए यूनियन, भारत, जापान, कनाडा जैसे देश हैं। ट्रंप ने जब चीन से व्यापार युद्ध शुरू किया तो यूरोपीय यूनियन और भारत जैसे मुल्क खुश थे। इन्हें लग रहा था कि अमेरिकी बाजारों में चीनी निर्यात कम होने पर उनकी हिस्सेदारी बढ़ेगी। यूरोपीय यूनियन का निर्यात सत्तर अरब डॉलर और जापान और कनाडा का निर्यात बीस-बीस अरब डॉलर तक बढ़ने की संभावना थी। भारतीय निर्यात में भी साढ़े तीन फीसद के इजाफे की उम्मीद थी। लेकिन भारत की यह खुशी सामान्य तरजीही व्यवस्था से बाहर होने के साथ ही खत्म हो गई। इसके संकेत पिछले दिनों भारत दौरे पर आए अमेरिकी वाणिज्य मंत्री विल्बर रोस ने दे दिए थे। उनका कहना था कि भारत अमेरिका से आयात होने वाले सामान पर उच्च शुल्क लगा रहा है। भारत में नई सरकार के गठन के बाद अमेरिका इस मुद्दे को उठाएगा। भारत में आयात होने वाले अमेरिकी सामान पर औसत शुल्क 13.8 फीसद है। जबकि आॅटोमोबाइल पर साठ फीसद और मोटरसाइकिल पर पचास फीसद शुल्क है। कुछ अमेरिकी उत्पादों पर डेढ़ सौ से तीन सौ फीसद तक शुल्क भी लगाया जाता है। इससे अमेरिका खासा नाराज है।

अमेरिकी दबाव भारत को परेशान करने वाला है। हालांकि अमेरिका को खुश करने के लिए भारत ने अमेरिकी तेल उद्योग से सालाना पांच अरब डॉलर के तेल और गैस आयात करने का फैसला किया। अमेरिकी उड्डयन उद्योग से भी भारत ने विमान खरीद का फैसला किया है। भारत अगले कुछ वर्षों में चालीस अरब डॉलर के विमान की खरीद करेगा। ट्रंप दुनिया के कई देशों पर दबाव बना कर अमेरिकी रक्षा उद्योग के बाजार का विस्तार कर रहे हैं। वे इससे व्यापार संतुलन भी अमेरिका के पक्ष में करना चाहते हैं। उत्तर कोरिया के लगातार मिसाइल परीक्षणों से परेशान जापान ने अपनी सेना के लिए अगले पांच साल में पचास अरब डॉलर के हथियार और रक्षा उपकरण खरीदने का फैसला किया है। इसका सबसे ज्यादा लाभ अमेरिकी रक्षा उद्योग को मिलेगा।

ट्रंप के दो फैसले भारतीय हितों के खिलाफ थे। ट्रंप प्रशासन के दबाव में भारत ने ईरान से तेल आयात बंद कर दिया। भारत ईरान से रोजाना साढ़े चार लाख बैरल तेल आयात करता था। ईरान भारत को तेल आयात के बिल भुगतान के लिए साठ दिन का समय देता था। यह छूट दूसरे तेल निर्यातक देश नहीं देते हैं। लेकिन ट्रंप की नजर सिर्फ भारतीय तेल बाजार पर नहीं है, वे भारत के रक्षा बाजार पर भी नजरें गड़ाए हुए हैं। एक बार फिर अमेरिका ने भारत द्वारा रूस से खरीदी जा रही एस-400 मिसाइलों को लेकर विरोध जताया है। यह सौदा पांच अरब डॉलर का है। अमेरिका ने साफ धमकी दी है कि रूस से एस-400 मिसाइल खरीदने से भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों पर बुरा असर पड़ेगा। अमेरिका ने साफ किया है कि अंतराष्ट्रीय बाजार में उच्च रूसी तकनीक से युक्त रक्षा उपकरणों की खरीद पर अमेरिका ने प्रतिबंध लगा रखा है। अगर भारत इसे खरीदेगा तो अमेरिकी कानूनों के तहत उसे भी प्रतिबंध झेलना पड़ेगा।
अमेरिकी निर्यात के पांच बड़े बाजारों में कनाडा, मेक्सिको, चीन, जापान और ब्रिटेन हैं।

आबादी के हिसाब से भारत दुनिया का दूसरा बड़ा देश है। इसके बावजूद भारत अमेरिका के निर्यात बाजार की रैकिंग में तेरहवें नबर है। अमेरिका कनाडा को सलाना तीन सौ अरब डॉलर, मेक्सिको को ढाई सौ अरब डॉलर, चीन को एक सौ तीस अरब डॉलर, जापान को सत्तर अरब डॉलर और ब्रिटेन को साठ अरब डॉलर का सामान निर्यात करता है। जबकि भारत को सालाना तैंतीस अरब डॉलर का सामान बेचता है। अमेरिका की नजर भारत के मध्यवर्ग पर है। दरअसल, ट्रंप ने अमेरिकी निर्यात को बढ़ाने के लिए अमेरिका में आयात होने वाले स्टील, अल्युमीनियम सहित हजारों वस्तुओं पर लगने वाले शुल्क में बढ़ोतरी की है। इससे दुनिया भर के स्टील, अल्युमीनियम, कपड़ा उद्योग के अलावा कई उद्योगों को भारी नुकसान पहुंचा है। ट्रंप का तर्क है कि अमेरिकी कारपोरेशन सस्ते श्रम के लोभ में दुनिया के दूसरे देशों में निवेश कर रहे हैं। इससे अमेरिका में बेरोजगारी बढ़ी है। ट्रंप की कोशिश है कि अमेरिकी पूंजी का निवेश अमेरिका में ही हो, ताकि ज्यादा रोजगार पैदा हो। अमेरिकी शिक्षा उद्योग की नजर भी भारत पर है। अमेरिकी विश्वविद्यालय भारतीय छात्रों की पसंद बन रहे हैं। भारतीय छात्रों से अमेरिकी शिक्षा जगत को सालाना पांच अरब डॉलर की आय हो सकती है।

भारत पर ताजा अमेरिकी दबाव के कुछ कूटनीतिक कारण भी हैं। ट्रंप भारत से एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सिर्फ सहयोग ही नहीं चाहते, बल्कि चीन और रूस से भारत की दूरी भी बढ़ाना चाहते हैं। दरअसल, ट्रंप एक तीर से कई शिकार कर रहे हैं। ईरान के तेल निर्यात पर प्रतिबंध लगा कर वे चीन और भारत दोनों की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करना चाहते हैं। ईरान से तनाव बढ़ने की स्थिति में तेल की कीमतें बढ़ेंगी। इससे दोनों मुल्कों की अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचेगी। भारत अपनी जरूरत का अस्सी फीसद तेल आयात करता है। इसके अतिरिक्त ट्रंप एशिया में मजबूत हो रहे शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) को भी कमजोर करना चाह रहे हैं।

एससीओ के पीछे चीन और रूस का दिमाग है। एससीओ बीते कुछ समय में काफी मजबूत बन कर उभरा है, इससे अमेरिका खासा परेशान है। यह संगठन मध्य एशिया से लेकर यूरोप तक आर्थिक सहयोग ही नहीं, बल्कि एशियाई देशों के ऊर्जा संकट को भी दूर करेगा। इसमें दुनिया के दो बड़े देश चीन और भारत आपस में सहयोग बढ़ा रहे हैं, इससे भी अमेरिका की परेशानी बढ़ गई है। हालांकि कई मुद्दों पर चीन और भारत के बीच आपसी तनाव है, पर आर्थिक सहयोग को लेकर दोनों मुल्कों में एक सहमति बन रही है। ट्रंप की परेशानी यह भी है कि तमाम प्रतिबंधों के बावजूद चीन और रूस ईरान के साथ खड़े हैं। तुर्की भी ईरान के साथ है। इसलिए वे इन कूटनीति संबंधों के बीच एससीओ की मजबूती को कम करना चाहते हैं। भारतीय निर्यात पर मिली शुल्क छूट को समाप्त करने के पीछे ट्रंप प्रशासन की एक मंशा एससीओ को कमजोर करना भी हो सकती है।

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