राजनीति: निगरानी के बढ़ते खतरे

हाल में वाट्सऐप से जासूसी की खबर ने सारे समाज में न केवल चिंता और गुस्सा उत्पन्न किया है, अपितु अनेक सवालों को भी जन्म दे डाला है।

Author Updated: November 26, 2019 5:41 AM
अब अचानक सब कुछ सार्वजनिक होने लगा है।

कंप्यूटर और संचार प्रौद्योगिकी ने ‘सूचना समाज’ की उत्पत्ति को संभव बनाया और इसने जीवन के प्रत्येक पक्ष को नए स्वरूप प्रदान किए। राजनीति, अर्थव्यवस्था, समाज, संस्कृति, शिक्षा और मनोरंजन सभी क्षेत्रों में इसका प्रभाव देखा जा सकता है। प्रारंभ में कंप्यूटर और संचार प्रौद्योगिकी के माध्यम से किसी का व्यक्तिगत डाटा रोजगार, व्यावसायिक, प्रशासनिक एजेंसियों द्वारा या पुलिस एवं सुरक्षा एजेंसियों द्वारा एकत्र किया जाता था। दूसरे शब्दों में कहें तो बड़े निगमों और सरकारी संस्थानों से संबद्ध कंप्यूटर डाटाबेस में हमारी निजी जानकारी प्रतिदिन एकत्र और परिष्कृत होती रहती है। इसे ही निगरानीमूलक समाज की संज्ञा दी जाती है। धीरे-धीरे इस तकनीक का प्रयोग परिवार के अंदर भी होने लगा। सामाजिक संबंधों में अविश्वास की बढ़ती प्रवृत्ति ने परिवार के प्रत्येक सदस्य को शक के दायरे में ला दिया है, इसलिए हर कोई एक-दूसरे पर निगरानी रखने लगा है। मोबाइल फोन, सोशल साइट, सोशल मीडिया, कलाई घड़ी इत्यादि आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक गेजेट और डिवाइस मनुष्य के हर पल की खबर को कैद कर लेने में सक्षम हैं और उसे संग्रहीत करते जाते हैं, जिसका कोई भी कभी भी दुरुपयोग कर सकता है। इस निगरानी मूलक समाज ने अनेक नए प्रकार के खतरों और भय को उत्पन्न किया है।

सूचना क्रांति और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हुए तीव्र विकास के बाद से हर जगह यानी दुकान, आॅफिस, मॉल, होटल, रेस्तरां, लिफ्ट, पार्किंग एरिया, बहुमंजिला इमारतों में यह लिखा देखा जा सकता है कि ‘आप कैमरे की निगरानी में हैं’। आखिर ऐसा क्या हुआ जो हमारे जीवन के हर पक्ष को सार्वजनिक करने की होड़ जारी है। हमारे हाथ में रहने वाला मोबाइल फोन जिस पर बातचीत, संदेशों, तस्वीरों और दस्तावेजों का आदान-प्रदान होता है, हम अपनी निजी जिंदगी से जुड़ी बातें साझा करते हैं, वह किसी और के नियंत्रण में है। इस तरह निजता खतरे में पड़ गई है। अब अचानक सब कुछ सार्वजनिक होने लगा है। आखिर क्यों? समाज को नियंत्रित करने का यह कौन सा तरीका है जो ‘निजता के अधिकार’ (राइट टू प्राइवेसी) का उल्लंघन करने से भी नहीं चूकता? इस नई तकनीक ने निजी और सार्वजनिक के बीच के अंतर को मिटा कर रख दिया है।

यह एक तथ्य है कि अब से पहले इतिहास में किसी भी समाज में कभी भी आमजन के रोजमर्रा के सामाजिक जीवन की इस तरह से निगरानी नहीं की गई। इससे समाज में एक नए किस्म के खतरे और भय-मनोविज्ञान को उत्पन्न होते देखा जा सकता है। विभिन्न क्षेत्रों में अनुसंधान, शोध कार्य करते समय लोगों को यह आश्वासन दिया जाता है कि उनके द्वारा दी गई सूचनाओं को गोपनीय रखा जाएगा, पर अब इस नई प्रौद्योगिकी के आने के बाद भी क्या इस तरह का कोई भरोसा दिया जा सकता है, ताकि उत्तरदाता / नागरिक निडर होकर सही और पक्षपात रहित जानकारी दे सकें। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि आने वाले कुछ वर्षों में हर व्यक्ति सोचने से भी डरने लगे कि ऐसा न हो कि उसके सोचने पर भी निगरानी शुरू हो जाए। देखा जाए तो संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों के समक्ष वर्तमान सूचना समाज ने अनेक जोखिम उत्पन्न कर दिए हैं। उदाहरण के लिए वाक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, निजता का अधिकार आदि हाशिये पर चले गए हैं।

यहां यह प्रश्न महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि क्या हम प्रौद्योगिकी के नियंत्रण में हैं या प्रौद्योगिकी हमारे नियंत्रण में? प्रौद्योगिकी एक अच्छी सेवक तो हो सकती है, पर उसका मालिक वाला स्वरूप समाज के लिए बड़ा खतरा है। प्रौद्योगिकी उस तेज धार चाकू के समान है जिससे फल-सब्जी भी काटे जा सकते हैं और किसी का गला भी। परंतु यह आप पर निर्भर करता है कि आप उसका प्रयोग किसके लिए करते हैं? अगर आप किसी का गला काटते हैं तो इसमें दोष चाकू या प्रौद्योगिकी का नहीं है। जब तक तकनीक का प्रयोग मनुष्य के कल्याण के लिए किया जाए, तब तक तो वह एक वरदान साबित होती है, लेकिन जब उसका उपयोग मनुष्य के खिलाफ किया जाने लगता है तो समाज विनाश के कगार पर आ जाता है, जैसा कि हम वर्तमान समाज में होता देख भी रहे हैं। परिणामस्वरूप परिवार, नातेदारी, समाज, राज्य और औपचारिक-अनौपचारिक संस्थाएं गंभीर चुनौतियों का सामना करती नजर आ रही हैं।

हाल में वाट्सऐप से जासूसी की खबर ने सारे समाज में न केवल चिंता और गुस्सा उत्पन्न किया है, अपितु अनेक सवालों को भी जन्म दे डाला है। एनएसओ नामक इजराइली कंपनी ने वाट्सऐप जासूसी घटना का उद्देश्य आतंकवाद और अपराध से लड़ने के लिए सरकारों को साइबर मामलों में तकनीकी मदद प्रदान करना बताया था। लेकिन मानवाधिकार समूहों और विशेषज्ञों का तर्क है कि कुछ देशों की सरकारें साइबर अपराधों की मदद से अपने राजनीतिक विरोधियों की जासूसी करवाती हैं और अपने खिलाफ पनपने वाले असंतोष को कुचलने की कोशिश करती हैं। सवाल है कि आखिर हम किस तरह के समाज की ओर अग्रसर हो रहे हैं, जहां उठना-बैठना, सोना-जागना, खाना-पीना और शयनकक्ष तक की गतिविधियां सब कुछ दूसरों के नियंत्रण में जा चुकी हैं।

विचारणीय विषय यह है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? किसी की निजी जिंदगी को सार्वजनिक करके कोई क्या हासिल करना चाहता है? हां, इतना अवश्य हुआ है कि इन सबके कारण साइबर अपराध की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं जिन पर काबू पाना कठिन होता जा रहा है। सामान्यत: कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि इस प्रौद्योगिकी का उपयोग समाज से अपराध को समाप्त करने के लिए किया किया जा रहा है, पर राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े बताते हैं कि 2014 में साइबर अपराध के 9622, 2015 में 11592 और 2016 में 12317 मामले सामने आए थे। जाहिर है, साइबर अपराधों का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है। साइबर अपराधों में भारत दुनिया में तीसरे स्थान पर है।

यह चिंता का विषय है कि तकनीकी विकास का यह दौर हमारे समाज को कहां ले जाएगा? क्या प्रौद्योगिकी के बाजार में हम एक वस्तु या उत्पाद बन कर रह गए हैं जहां हमारी मर्जी के बिना कोई भी इन सूचनाओं को खरीद और बेच सकता है। अगर कोई व्यक्ति अपने निजी दायरे में किसी से कोई बात साझा करता है या कोई संपर्क-संवाद करता है तो वह भी सार्वजनिक हो जा रहा है, जिसे कोई भी अपने लाभ के लिए इस्तेमाल कर सकता है, ब्लैकमेल कर सकता है या संभावित दुश्मन बन कर उभर सकता है। परिणामस्वरूप इसे ‘विश्वास के अंत का युग’ कहा जा सकता है, जिसमें हर कोई दूसरों पर अविश्वास करने के कारण निगरानी मूलक तकनीक का इस्तेमाल करने को बाध्य हुआ है। समाज शास्त्रीय दृष्टिकोण से देखें तो सामाजिक संबंधों का निर्माण पारस्पारिक विश्वास पर टिका होता है, लेकिन जब विश्वास का ही संकट खड़ा हो जाए तो मानवीय रिश्ते रह कहां जाएंगे! इसी का परिणाम है कि आज समाज में भय, हिंसा, अविश्वास, धोखा तेजी से पैर पसारते जा रहे हैं।

बिना अनुमति किसी भी नागरिक की निजी और सार्वजनिक सूचनाएं एकत्र करना या उन पर निगरानी रखना एक गंभीर अपराध है। इसे किसी भी दृष्टि से न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। हर व्यक्ति की अपनी एक आत्म-प्रतिष्ठा होती है जिसको किसी के साथ साझा करने या न करने का अधिकार भी केवल उसी का होता है। अत: बिना उसकी अनुमति के उसकी निजी जानकारी को सार्वजनिक करना उसकी निजता का हनन करना है जो संविधान द्वारा दिए गए अधिकार का भी उल्लंघन है।

ज्योति सिडाना

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