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राजनीति: मानव, पर्यावरण और समन्वयवाद

वर्तमान वैश्विक दौर में जिस तरह पर्यावरण पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं, वह गहन चिंता की बात है। प्रश्न चाहे हिमालयी क्षेत्र की लुप्त होती जैव विविधता का हो, या नगरों-महानगरों में बढ़ती जनसंख्या व प्रदूषण का। आखिर इन सारे सवालों के समाधान के लिए हमें ‘संभववाद’ और ‘नियतिवाद’ जैसी विचारधाराओं से बाहर निकल कर ‘समन्वयवाद’ की ओर उन्मुख होना श्रेयकर होगा।

Author June 5, 2019 1:43 AM
पर्यावरण पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं

चंद्रशेखर तिवारी

मानव का प्रकृति से बहुत गहरा संबंध है। प्रकृति और वायुमंडल से मिल कर बने पर्यावरण के तत्व जहां मानव को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से प्रभावित करते रहे हैं, वहीं मानव प्रकृति में विद्यमान प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग अपने हितों के लिए करता आया है। आदिकाल से वर्तमान तक अनवरत रूप से वह अनाज पैदा करने और वन व खनिजों के दोहन से अपना जीवन चलाता आ रहा है। यही नहीं, वह पर्यावरण के प्रभावों को प्रारंभ से ही महसूस करता आया है। कुल मिला कर पृथ्वी और वायुमंडल से मिल कर बना वातावरण जिसे हम दूसरे शब्दों में पर्यावरण भी कहते हैं, मानव जगत पर एक सामूहिक प्रभाव डालते हैं। विभिन्न स्थानों का पर्यावरण अलग-अलग होने के कारण वहां की भौगोलिक बनावट, जलवायु, प्राकृतिक संसाधन इत्यादि मानव पर प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से भिन्न-भिन्न प्रभाव डालते हैं। पर्यावरण के इस प्रभाव को मनुष्य ने शुरुआत से ही महसूस किया है। हालांकि वनस्पति, जानवरों और अन्य निर्जीव वस्तुओं की तरह मानव पर भी उसी तरह का प्रभाव पड़ता है। लेकिन मानव अपनी विकसित बुद्धि से पर्यावरण के प्रभाव को एक निश्चित सीमा तक दूर करने का प्रयास करता आया है। इस संदर्भ में अनेक विद्वानों ने समय-समय पर अपने महत्त्वपूर्ण मत दिए हैं।

पर्यावरण और मानव के सह-संबंधों के बारे में लोगों के अलग-अलग मत हैं। कुछ लोग पर्यावरण को स्वामी मानते हैं। उनके विचार में मानव पर्यावरण का दास है और मानव को स्थान विशेष के पर्यावरण के अनुरुप ही जीवन जीने को मजबूर होना पड़ता है। ‘नियतिवाद’ अथवा ‘निश्चितवाद’ की इस विचारधारा को वर्तमान में विशेष महत्त्व नहीं दिया जाता, लेकिन प्राचीन समय में हिप्पोक्रेट्स व अरस्तू सरीखे दार्शनिक इस विचारधारा को मानते थे। इस विचारधारा को मानने वाले लोगों का मत था कि क्षेत्र विशेष के पर्यावरण से प्रभावित होकर मानव वहां के पर्यावरण के अनुरूप ढल जाता है। शीत जलवायु वाले टुंड्रा प्रदेश के निवासी वहां की विकट जलवायु और भू-सरंचना में जीवन यापन करते हैं, जिस कारण उनके जीवन निर्वाह व विचार की शैली अन्य प्रदेश के निवासियों से भिन्न होती है। मध्य एशिया के चरवाहे अपने पशुओं के साथ जगह-जगह घूमते रहते हैं क्योंकि वहां की भौगोलिक बनावट ही इस तरह की है कि न तो वहां स्थायी खेती के लिए अच्छी व उपजाऊ मिट्टी है और न ही जल संसाधनों की उपलब्धता। इस तरह उनकी घुमक्कड़ी प्रवृत्ति के पीछे स्थानीय पर्यावरण को उत्तरदायी माना जा सकता है। भारत के राजस्थान, बुंदेलखंड व पहाड़ी इलाकों के निवासियों में वीरता व साहस जैसी विशेषताओं का पनपाने में भी दरअसल उस क्षेत्र की विषम भौगोलिक परिस्थितियों का हाथ माना जाता है।

मानव अपने बुद्वि कौशल व ज्ञान के बल पर पर्यावरण के तमाम तत्वों- वनस्पति, खनिज, मिट्टी, जल तथा वन्य जीव-जंतुओं का उपयोग अपने जीवन-यापन के लिए करता रहा है। वैज्ञानिक काल में नवीन तकनीकों के प्रचलन से कृषि पद्वति, उद्योग व व्यवसाय के क्षेत्र में असाधारण बदलाव होने लगा। जल संसाधन का उपयोग मानव ने पेयजल, सिंचाई व जलविद्युत उत्पादन के लिए किया। प्राकृतिक संसाधनों का वृहद उपयोग करने में खुद को सक्षम पाकर मानव महसूस करने लगा कि अब वह पर्यावरण के बंधन में जकड़ा हुआ नहीं है। पर्यावरण पर विजय प्राप्त कर लेने से उसे अब ‘नियतिवाद’ विचारधारा में पिछड़ेपन की बू आने लगी। इसके फलस्वरुप ‘संभववाद’ के नाम से नई विचारधारा जन्म लेने लगी। इस विचारधारा को मानने वाले विद्वान फैब्बरे का मत था ‘सब ओर संभावनाएं हैं, मानव इन संभावनाओं का मालिक है, इस कारण वह इसके उपयोग का हकदार है।’

कालांतर में ‘नियतिवाद’ और ‘संभववाद’ के सम्मिश्रण ने एक तीसरी विचारधारा निकली जिसे ‘समन्वयवाद’ कहा गया। इस विचारधारा के समर्थक जहां मानव को पूरी तरह पर्यावरण का दास मानने से इनकार करते हैं, वहीं वे पर्यावरण के विरुद्व कार्य करने की संभावनाओं को भी एक निश्चित सीमा तक मानते हैं। इस विचारधारा के लोग मानते हैं कि मानव जो स्वयं पर्यावरण का ही एक अंग है, पर्यावरण के गुणों को समझ-बूझ कर उसके साथ समझौता-सहयोग कर लेता है। इस विचारधारा को मानने वाले लोगों का कहना था कि मानव जो स्वयं में पर्यावरण का ही एक अंग है, उसे पर्यावरण की विशेषताओं को समझ-बूझ कर उसके समुचित उपयोग और उसके साथ समन्वय व सहयोग करने की जरुरत है।

वर्तमान वैश्विक दौर में जिस तरह पर्यावरण पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं, वह गहन चिंता की बात है। प्रश्न चाहे हिमालयी क्षेत्र की लुप्त होती जैव विविधता का हो, या नगरों-महानगरों में बढ़ती जनसंख्या व प्रदूषण का। आखिर इन सारे सवालों के समाधान के लिए हमें ‘संभववाद’ और ‘नियतिवाद’ जैसी विचारधाराओं से बाहर निकल कर ‘समन्वयवाद’ की ओर उन्मुख होना श्रेयकर होगा। सही रूप में प्रकृति के साथ समन्वय करके ही उस पर विजय पाई जा सकती है। पर्यावरण के सिद्वांतों के अनुरूप ही हम सभी को अपनी सुविधाओं एवं आकांक्षाओं में परस्पर तालमेल बिठाना होगा। इसके लिए पग-पग पर पर्यावरण से सहयोग करना उतना ही जरूरी समझा जाना चाहिए, जितना कि उससे लाभ उठाने की इच्छा। इस दृष्टि से भारतीय परंपरा का जिक्र करना उचित होगा।

भारत के लोकजीवन के विविध पक्षों में पर्यावरण की महत्ता को पग-पग पर स्वीकार किया गया है। मांगलिक कार्यों में देवी-देवताओं के साथ ही यहां प्रकृति पूजा का भी विधान है। विभिन्न व्रत-पर्वों में धरती के प्रतीक कलश की स्थापना कर सूर्य, चंद्र, नवग्रह, जल, अग्नि सहित दूव, वृक्ष, बेल व पत्तियों को पूजने की परंपरा चली आ रही है। पूजा-अर्चना में प्रयुक्त इनकी उपस्थिति हमें इस बात का अहसास कराती है कि यही प्राकृतिक तत्व हमें जीवन प्रदान करते हैं। प्रकृति के प्रमुख तत्व जल को वैदिक विज्ञान में सर्वाधिक कल्याणकारी माना गया है। जल हमारी सभी अशुद्धियों को धोकर निर्मल व पवित्र कर देता है, साथ ही शरीर व मन से हमें संस्कारवान होने की प्रेरणा देता है। भारत की प्राचीन जल संस्कृति में नदियों को बहुत महत्ता प्रदान की गई है। यहां के अनेक नगर और तीर्थ नदियों के किनारे ही स्थित हैं। इन्हीं नगरों से भारतीय सभ्यता और संस्कृति नदी की धारा के साथ सतत आगे बढ़ती रही है। नदियों का मूल स्वभाव दूसरों का हित करने का रहा है। कुल मिलाकर भारतीय परंपरा में नदियां सुसंस्कृत समाज के लिए सृजन व चेतना के तौर पर मुखरित होती दिखाई देती हैं।
भारतीय परंपरा में धरती को हमेशा से ही माता कह कर पुकारा गया है।

भारतीय साहित्य व लोक मान्यताओं में प्रकृति को सर्वोच्च सत्ता के रूप में आसीन करने और भूमि को देवत्व स्वरूप प्रदान करने की परिकल्पना रची गई है। उत्तराखंड में आज भी लोग खेती का कार्य करने से पहले और नई फसल को देवताओं को अर्पित करते समय भूमि के रक्षक भूम्याल (भूमिपाल) का आह्वान करते हैं। यहां कई जगहों पर देववनों की स्थापना भी की गई है। संरक्षण की दृष्टि से गांव समाज के सामूहिक जंगलों को पांच साल के लिए स्थानीय देवी देवताओं को अर्पित किया गया है। लोक नियमानुसार इस अवधि में इन देववनों से पेड़ की एक भी पत्ती नहीं तोड़ी जा सकती। हमारी भारतीय परम्परा में धरती माता के प्रति इससे बड़ी आस्था और क्या हो सकती है।

निश्चय ही ‘समन्वयवाद’ के इस नजरिए से हमें पर्यावरण पर पूर्ण रूप से हावी होने के स्थान पर अपनी बढ़ती भोगवादी संस्कृति पर लगाम लगानी होगी। अंतत: धरती की पीड़ा को समझते हुए उसकी सुरक्षा के लिए अपनी जीवन शैली में बदलाव लाने जैसी तमाम कोशिशें हमारी सर्वाेच्च प्राथमिकताओं में होनी चाहिए। इस तरह पर्यावरण के साथ सतत रूप से समन्वय बिठा कर ही भूमंडल की सुरक्षा में योगदान देने का प्रयास हमें करना होगा।

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