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राजनीति: कैसे सुधरे किसानों की हालत

सातवें दशक में ग्रामीण परिवार की तीन चौथाई आय का स्रोत कृषि हुआ करती थी।

Author नई दिल्ली | Published on: January 22, 2020 12:34 AM
देश में किसान और खेती दोनों ही संकट के दलदल में धंसते जा रहे हैं।

आजादी के सात दशक बाद भी भारत के किसानों की दशा में कोई बड़ा कांतिक्रारी बदलाव देखने को नहीं मिला है। बल्कि देश में किसान और खेती दोनों ही संकट के दलदल में धंसते जा रहे हैं। जिन अच्छे, समृद्ध किसानों की बात की जाती है, उनकी गिनती तो बहुत ही कम है। लेकिन ऐसे किसानों की संख्या बहुत अधिक है जो आज भी हाशिये का जीवन जीने को मजबूर हैं। किसान हमेशा से हमारे देश की अर्थव्यवस्था का आधार रहे हैं। लेकिन यही आधार जब कमजोर पड़ने लगेगा तो हमारी कृषि का क्या होगा, यह गंभीर सवाल है जिस पर हमें सोचने की जरूरत है।

किसानों की दुर्दशा को हम लंबे समय से देखते-सुनते आ रहे हैं। हालात कितने गंभीर हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पिछले दो दशक में लगभग तीन लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं। यही कारण है कि आज जगह-जगह किसानों के उग्र आंदोलन हो रहे हैं। कम आय, खेती की बढ़ती लागत और सरकारी उपेक्षा ने कृषि संस्कृति को संकट में डाल दिया है। पिछले कई सालों से खेती करने की लागत जिस तेजी से बढ़ती जा रही है, उस अनुपात में किसानों को मिलने वाले फसलों के दाम बहुत ही कम बढ़े हैं।

भले प्रधानमंत्री ने 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने का वादा किया हो, लेकिन सरकार के अब तक के प्रयासों में ऐसी कोई ठोस पहल देखने को नहीं मिली है, जिससे यह संकेत नजर आते हों कि आने वाले वक्त में किसान खुशहाल दिखने लगेगा। सरकार ने फसलों की कीमत को डेढ़ गुना करने का अपना वादा निभाने का प्रयास भर किया है, लेकिन एमएस स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय करने से अब तक परहेज ही किया है। वर्तमान लागत मूल्य निर्धारण प्रक्रिया के तहत ए-2 एफ-एल को आधार बना कर फसलों के लागत मूल्य के अनुपातिक एमएसपी बढ़ाया गया है, जबकि किसान संगठनों की मांग रही है कि सी-2 प्रणाली को आधार बना कर लागत मूल्य निर्धारित किया जाए और इस पर पचास फीसद का अतिरिक्त लाभ दिया जाए। स्पष्ट है कि गतिरोध लागत मूल्य निर्धारण प्रक्रिया को लेकर ही है। प्रक्रिया ए-2 एफ-एल के तहत खेती में उपयोग होने वाली सभी वस्तुएं जैसे- बीज, उर्वरक, कीटनाशक, मजदूरी, मशीनों का किराया और पारिवारिक श्रम जैसी मदें शामिल होती हैं, जबकि सी-2 व्यवस्था में अन्य लागतों के साथ भूमि का किराया भी जोड़ा जाता है। इसके तहत लागत मूल्य निर्धारण से किसानों को मिलने वाले दाम और मौजूदा व्यवस्था के तहत मिलने वाले दाम में बड़ा अंतर है।

शांता कुमार कमेटी की रिपोर्ट में यह बात कही गई थी कि मात्र छह प्रतिशत किसानों को एमएसपी का फायदा मिल पाता है। इसका असर यह पड़ा है कि प्रतिवर्ष खेती का रकबा घट रहा है। किसान खेती को छोड़ कर मजदूरी जैसे काम में लग रहे हैं। रोजगार की तलाश में गांवों से पलायन जोरों पर है। जाहिर है, देश अपने किसानों को खो रहा है। ये संकेत भी मिल रहे हैं कि बहुत से ग्रामीण बेरोजगार होने के बावजूद खेती में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं। इससे पता चलता है कि भारत बड़े बदलाव की ओर अग्रसर है।

सातवें दशक में ग्रामीण परिवार की तीन चौथाई आय का स्रोत कृषि हुआ करती थी। इसके पैंतालीस साल बाद 2015 में यह एक तिहाई से भी कम रह गई है। अब अधिकांश ग्रामीण परिवार गैर कृषि कार्यों से अधिक आय अर्जित कर रहे हैं। बेशक, हमारा देश आज भी कृषि प्रधान है, बावजूद इसके शहरीकरण और औद्योगीकरण के चलते खेती का रकबा लगातार घटता जा रहा है। यही वजह है कि हमारी कृषि गहरे संकट में फंसती जा रही है। किसानों की आत्महत्या के बढ़ते सरकारी आंकड़े भी इस हकीकत को बयां करते हैं। सवाल उठता है कि खेती-बाड़ी पर निर्भर लोग क्यों मौत को गले लगा रहे हैं और यह सिलसिला आखिर क्यों नहीं थम पा रहा है?

दरअसल, इस त्रासदी की जड़ें कृषि संकट में ही छिपी हैं। अलबत्ता प्रतिकूल मौसम की मार से इस संकट की तीव्रता बढ़ जाती है। दरअसल, खेती कभी मुनाफे का धंधा हुआ करती थी, लेकिन अब वह घाटे का कारोबार हो गई है। इस स्थिति के लिए सरकारी नीतियां ही जिम्मेदार हैं जिनमें खेती-बाड़ी को देश के विकास की मुख्यधारा का मानक मानने की न्यूनतम समझदारी भी कभी नहीं दिखाई गई। जब भी किसानों को संकट से उबारने की बात होती है, तो सस्ती ब्याज दर पर कृषि-ऋण मुहैया कराने के अलावा सरकारों को और कुछ नहीं सूझता। लेकिन कर्ज के रूप में ये मदद मरहम के बजाय जख्म ही साबित होती है।

एक मोटे अनुमान के मुताबिक देश में करीब पंद्रह करोड़ किसान परिवार हैं। इनमें से बारह करोड़ लघु एवं सीमांत किसान हैं। 2019-20 में खेती-किसानी के लिए कृषि मंत्रालय का एक लाख तीस हजार चार सौ पिच्यासी करोड़ रुपए का बजट है। सरकार की कई बड़ी योजनाओं का एलान भी किया। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि देश के ज्यादातर राज्यों में कृषि संबंधी जो भी सरकारी लाभ हैं, वे भू-स्वामी यानी खेत के मालिक को ही मिलते हैं। उसके खेत पर फसल पैदा करने वाले मेहनतकश और भूमिहीन किसान को कृषि संबंधी कोई सरकारी सहायता नहीं मिलती।

एक समस्या यह भी है कि किसान को हर हाल में घाटे का सामना करना पड़ता है। उत्पादन अच्छा हो तब भी और न हो तब भी। लगभग प्रत्येक वर्ष आलू, प्याज, टमाटर और मौसमी सब्जियां आदि औने-पौने दामों पर बेच दी जाती हैं और जब वह दाम भी नहीं मिलता है तो रोष स्वरूप किसान उन्हें सड़कों पर फेंक देते हैं। भारत में अभी भी साठ फीसद से ज्यादा किसान परंपरागत तरीकों से ही खेती कर रहे हैं। सरकार उद्योगों को हर तरह से बढ़ावा देती है, लेकिन कृषि में सिर्फ लोकलुभावन घोषणाएं करके ही जिम्मेदारी पूरी समझ लेती है। स्वामीनाथन आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कृषि क्षेत्र के उत्थान और किसानों की आर्थिक दशा सुधारने के लिए जो सिफारिशें की थीं, उन्हें भी सरकार द्वारा पूरी तरह से लागू नहीं किया गया। सरकारें बदलती गर्इं, लेकिन किसानों की आर्थिक दशा में सुधार नहीं हो पाया। इसका एक ही मुख्य कारण है- सरकार की इच्छाशक्ति में कमी।

आज भी किसान की औसत वार्षिक आय बीस हजार रुपए ही है। अभी तक किसानों के कल्याण की जो योजनाएं बनाई गई हैं और जिस तरह से उनका क्रियान्वयन किया गया है, वह सिर्फ वोट बैंक को ध्यान में रख कर किया गया है। जब तक कृषि को उद्योग का दर्जा नहीं दिया जाता, तब तक कृषि कराहती रहेगी, ग्रामीण युवा खेती-किसानी से पलायन करते रहेंगे और किसान आत्महत्या करते रहेंगे। इसलिए दम तोड़ती खेती को बचाना और उसे सुगम बनाना सरकारों का सबसे बड़ा आर्थिक सरोकार होना चाहिए। ऐसा तभी संभव है जब सत्ता में बैठे लोग विकास योजनाएं तय करते समय खेती और किसानी का खास ध्यान रखें। कृषि हमारी अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार है, यह हम बरसों से सुनते आ रहे हैं। लेकिन नीतियों के क्रियान्वयन में शिथिलता अर्थव्यवस्था के इस अहम केंद्र की जड़ें कमजोर ही करती जा रही है। इस दिशा में समुचित प्रयास नहीं किए गए तो खेती-बाड़ी से किसानों का मोहभंग होता जाएगा। इसलिए किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए सरकार को कई स्तरों पर नए सिरे से सुधार करने की जरूरत है।

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