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राजनीति: खतरे में हांगकांग की संप्रभुता

पिछले साल शी जिनपिंग ने चीनी विशेषताओं वाले समाजवाद का दृष्टिकोण रखते हुए कहा था कि खुलेपन से तरक्की का रास्ता खुलता है और चीन पहले से अधिक खुलापन लाएगा। हांगकांग में एकाधिकार कायम करने की चीनी जल्दबाजी से साफ है कि चीन ताकत के सहारे सब कुछ हासिल करने पर भरोसा करता है। चीन संपन्नता से एकाधिकार करना चाहता है, जबकि आर्थिक संपन्नता के साथ ही सामाजिक न्याय, मौलिक अधिकार, अभिव्यक्ति की आजादी और लोकतंत्र से ही विकास का मार्ग सुनिश्चित हो सकता है।

Author Published on: October 7, 2019 1:44 AM
चीन ने लगातार हांगकांग के लोगों के अधिकारों में कटौती की है।

ब्रह्मदीप अलूने

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने हाल में एक भाषण में चीनी शब्द ‘डूजेंग’ का इस्तेमाल कई बार किया। इस शब्द का मतलब होता है- संघर्ष करना। जिनपिंग ने संघर्ष को चीन की नियति बताते हुए उग्र राष्ट्रवाद को हवा देने की कोशिश की और इसके जरिए उन्होंने अपनी उन नाकामियों पर परदा भी डाला जिनसे उनका देश इस समय जूझ रहा है। माओ की आक्रामक नीतियों के विरोधाभास के बीच सत्तर सालों में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन कर उभरने वाले चीन के राष्ट्रपति इस समय बैचेन हैं। चीन इस समय अमेरिका के साथ व्यापार युद्ध में बुरी तरह उलझा हुआ है और उसकी विकास दर भी लगातार गिर रही है। वीगर मुसलमानों पर अत्याचार की गूंज पूरे विश्व में है। इन सबके बीच चीनी अर्थव्यवस्था के केंद्र बन चुके हांगकांग में लोकतंत्र के समर्थन में युवा सड़कों पर उतरे हुए हैं और चीनी आधिपत्य को खुली चुनौती दे रहे हैं।

इस महीने की शुरुआत में चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के शासन के सत्तर साल पूरे होने के अवसर पर चीन की खुशियां हांगकांग में चीन विरोधी काले दिवस और हिंसक प्रदर्शन के आगे फीकी पड़ गर्इं। पिछले कुछ सालों से हांगकांग का समाज इस बात से आशंकित है कि चीन उनके यहां लोकतंत्र को खत्म कर देगा और इसी आश्ंका ने चीन विरोधी भावनाओं को भड़का दिया है। अब यहां के लाखों नागरिक पिछले कई महीनों से सरकारी दफ्तरों, चीन की सेना के स्थानीय मुख्यालय और शहर की संसद के बाहर जमा होकर चीनी नीतियों के विरोध में व्यापक प्रदर्शन कर रहे हैं। इस प्रकार अति-आधुनिक हांगकांग हिंसा के दलदल में फंसता जा रहा है।

उच्च विकसित पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में जीने के आदि हो चुके हांगकांग को चीनी पहचान स्वीकार नहीं है। हांगकांग में सिविल ह्यूमन राइट्स फ्रंट वह अगुआ संगठन है जो चीनी सरकार की नीतियों के विरोध में लोगों को लामबंद किए हुए है। इस संगठन के नेताओं का कहना है कि लोगों का पुलिस पर भरोसा नहीं है और पुलिस भी लोगों पर भरोसा नहीं कर रही है। चीनी सेना शांतिप्रिय हांगकांग को घेर रही है और यह दबाव अंतत: हांगकांग को गंभीर संकट की ओर धकेल रहा है। जनवादी चीन के आधिपत्य में 1997 में आए हांगकांग को विकसित दुनिया का मुकुट कहा जाता है, लेकिन इस समय यह क्षेत्र गहरे प्रशासनिक और सामाजिक संकट से गुजर रहा है। ब्रिटिश उपनिवेश से मुक्त होकर चीन के आधिपत्य में आई हांगकांग की युवा पीढ़ी को चीन पर भरोसा ही नहीं है। हांगकांग की संसद में घुस कर प्रदर्शनकारी नौजवान ब्रिटिश कालीन झंडा फहरा कर अपना गुस्सा जता चुके हैं। चीन के राष्ट्रीय गान के प्रति कई मौकों पर असम्मान दिखता है। इस साल जून में हांगकांग की सड़कों पर हिंसा का खौफनाक मंजर सामने आया था। इसके बाद से ही हांगकांग सुलगा हुआ है। इसका असर चीन की शक्तिशाली सत्ता पर भी पड़ा है।

हांगकांग 1841 से 1997 तक ब्रिटेन का उपनिवेश था। ब्रिटेन ने उसे ‘वन कंट्री टू सिस्टम’ (एक देश और दो प्रणाली) समझौते के तहत चीन को सुपुर्द किया था। यह समझौता हांगकांग को ऐसे आजादी और लोकतांत्रिक अधिकार देता है, जो चीन के लोगों को हासिल नहीं हैं। हांगकांग चीन का हिस्सा है, लेकिन उसे ‘विशेष स्वायत्तता’ मिली हुई है। ये स्वायत्तता 2047 में खत्म हो जाएगी और हांगकांग में रहने वाले कई लोग नहीं चाहते कि हांगकांग का वही हाल हो जो साम्यवाद की जकड़न में किसी क्षेत्र का होता है। इस बीच चीन तेजी से हांगकांग की सत्ता हथियाने को तत्पर नजर आ रहा है और इसी से हांगकांग की नौजवान पीढ़ी परेशान है।

वास्तव में चीन और ब्रिटेन के बीच समझौते के अनुसार हांगकांग को एक देश दो व्यवस्था के सिद्धांत पर काम करना था। वर्ष 2047 तक उसे विदेश और रक्षा मामलों को छोड़ कर राजनीतिक और आर्थिक आजादी हासिल है। इस समझौते के बाद हांगकांग विशेष प्रसासनिक क्षेत्र बन गया। इसके पास अपनी कानूनी व्यवस्था, बहु-राजनीतिक पार्टी व्यवस्था और अभिव्यक्ति और इकट्ठा होने की आजादी थी। इन विशेष अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए इस क्षेत्र के पास अपना छोटा संविधान है। इसे ‘बेसिक लॉ’ कहा जाता है, जो घोषित करता है कि इसका मूल उद्देश्य ‘सार्वभौमिक मताधिकार’ और ‘लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं’ के माध्यम से इस इलाके का नेता यानी मुख्य कार्यकारी चुनना है।

साल 2014 में बेजिंग ने कहा था कि वह मुख्य कार्यकारी अध्यक्ष के सीधे चुनाव की इजाजत देगा, लेकिन केवल पहले से अधिकृत उम्मीदवारों की सूची से ही इनका चुनाव होगा। 2014 में ज्यादा लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग के साथ ‘आॅक्यूपाई सेंट्रल प्रोटेस्ट’ हुआ था, जहां आंदोलनकारियों ने पुलिस के आंसू गैस हमले से बचने के लिए छाते थामे और इसे अंब्रेला मूवमेंट कहा गया। इस घटना से चीन की वैश्विक छवि पर विपरीत असर पड़ा। हालांकि उनयासी दिन के आंदोलन के बाद भी चीन ने अपनी योजना को खारिज नहीं किया।

लेकिन कुछ महीने पहले आए प्रत्यर्पण कानून का हांगकांग में व्यापक विरोध हुआ और चीन को अंतत: इसके आगे झुकना पड़ा। प्रत्यर्पण कानून के व्यापक विरोध के बाद चीन और हांगकांग की सरकार को कदम पीछे खींचना पड़े। हांगकांग की सीईओ कैरी लैम ने हिंसा रोकने के लिए एलान किया कि सरकार ने प्रत्यर्पण कानून को अस्थायी रूप से स्थगित कर दिया है। चीन ने भी उनके इस एलान का समर्थन किया, लेकिन हांगकांग की जनता को न तो अपनी सरकार पर भरोसा है और न ही चीन पर। इस कानून के मुताबिक हांगकांग के लोगों को मुकदमे के लिए चीन भेजा जा सकता था। हांगकांग वासियों को डर था कि इससे राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाया जा सकता है। साथ ही ये हांगकांग को मिली स्वायत्तता का भी हनन है।

चीन ने अपने फैसले पर अस्थायी रोक लगा कर हांगकांग के लिए एक फौरी राहत तो दे दी, लेकिन इससे लोगों में आशंका बढ़ गई। चीन ने लगातार हांगकांग के लोगों के अधिकारों में कटौती की है। जहां तक स्वायत्तता की बात है, इस शहर को स्वायत्तता तो दी गई है और चुनाव भी कराने का अधिकार है, लेकिन पूर्ण लोकतंत्र यहां लोगों को नसीब नहीं है। हांगकांग में ऐसे बहुत से लोग हैं जो इस बात से चिंतित हैं कि चीन हांगकांग की राजनीति में कई तरीके से हस्तक्षेप कर रहा है और यहां की उदार राजनीतिक परंपरपराओं को नजरअंदाज कर रहा है।

हांगकांग के आंदोलनकारियों में अधिकांश युवा हैं। वहीं, चीन के समर्थन में भी एक समूह है जो लोकतंत्र के पक्ष में खड़े नेताओं को निशाना बना रहा है। जाहिर है, चीन की जल्दबाजी के चलते एक विकसित और अत्याधुनिक क्षेत्र गृहयुद्ध की ओर बढ़ रहा है। पिछले साल शी जिनपिंग ने चीनी विशेषताओं वाले समाजवाद का दृष्टिकोण रखते हुए कहा था कि खुलेपन से तरक्की का रास्ता खुलता है और चीन पहले से अधिक खुलापन लाएगा। हांगकांग में एकाधिकार कायम करने की चीनी जल्दबाजी से साफ है कि चीन ताकत के सहारे सब कुछ हासिल करने पर भरोसा करता है। चीन संपन्नता से एकाधिकार करना चाहता है, जबकि आर्थिक संपन्नता के साथ ही सामाजिक न्याय, मौलिक अधिकार, अभिव्यक्ति की आजादी और लोकतंत्र से ही विकास का मार्ग सुनिश्चित हो सकता है। हांगकांग के युवा कहते हैं कि अपनी ताकत के बल पर चीन लोकतंत्र को नहीं दबा सकता।

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