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राजनीति: चीन के लिए चुनौती बना हांगकांग

हांगकांग में लोकतंत्र को नियंत्रित और प्रशासित करने के चीन के साम्यवादी प्रयास वहां की जनता के लिए विरोध का कारण बने हैं।

दुनिया का सबसे बड़ा व्यापारिक केंद्र हांगकांग अब तक उच्च विकसित अर्थव्यवस्था के लिए पहचाना जाता था।

आर्थिक समृद्धि और आर्थिक सुधार पर आधारित नीतियों से संपूर्ण मानव अधिकारों की सुरक्षा नहीं हो सकती। लोकतंत्र पर आधारित समाज राजनीतिक अधिकारों में समानता, स्वतंत्रता, शांति और सुख-समृद्धि महसूस करता है, इसलिए उसे आर्थिक उच्च विकास के नाम पर खामोश नहीं किया जा सकता। आज हांगकांग इसी स्थिति से गुजर रहा है। दुनिया का सबसे बड़ा व्यापारिक केंद्र हांगकांग अब तक उच्च विकसित अर्थव्यवस्था के लिए पहचाना जाता था, लेकिन इस समय यह चीन की लोकतंत्र विरोधी नीतियों के खिलाफ मुखर होकर खड़ा है। यहां के युवा तेजी से अलगाववादी बन रहे हैं, हथियार उठा रहे है, हिंसक प्रदर्शन कर रहे हैं और अमेरिका जैसा देश उनका राजनीतिक समर्थन कर चीन को चुनौती दे रहा है।

यहां यह ध्यान रखना होगा कि आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों के बीच अलगाव पैदा करने की डेंगशियाऊ पिंग की चीन की पुरानी विदेश नीति भारत, रूस, अफगानिस्तान या अन्य देशों में भले ही सफल हो जाए, लेकिन उसके अपने भाग हांगकांग में यह बुरी तरह पस्त पड़ गई है। जनवादी चीनी गणराज्य द्वारा प्रशासित पूंजीवादी हांगकांग में राजनीतिक उदारीकरण और आर्थिक उदारीकरण के बीच सामंजस्य कायम न कर पाने की चीनी नाकामी हिंसक होकर लोकतांत्रिक आंदोलन को कुचलने देने को आमादा है। साम्यवादी चीन हांगकांग के विकास को आर्थिक नीतियों से जोड़ कर वहां के बाशिंदों के राजनीतिक अधिकारों को नजरअंदाज कर रहा है और चीन की यह नीति जनता को स्वीकार नहीं है। चीन की यह मान्यता है कि वह अपने विकास के लिए अन्य देशों का शोषण नहीं करेगा, लेकिन उसकी राजनीतिक दृष्टि लोकतंत्र विरोधी रही है, इसलिए उसके अपने इलाकों में ही अंतर्विरोध देखा जा सकता है। एक तरफ चीन अपने अशांत इलाके शिनजियांग प्रांत में विकास कर लोगों को दबा रहा है, जबकि वहां बसने वाले मुसलमानों के राजनीतिक अधिकार छीन लिए गए हैं। जनता के राजनीतिक अधिकारों के प्रति साम्यवादी चीन का आक्रामक व्यवहार न शिनजियांग प्रांत के लोगों का विश्वास जीत सका है, न ही वह इस नीति पर चल कर हांगकांग के लोगों का भरोसा जीत सकेगा।

लोकतांत्रिक आंदोलन चीन के लिए विरोध का प्रतीक माने जाते रहे हैं और चीनी शासक और रणनीतिकार इसे बेरहमी से दबाने में भरोसा करते हैं। सन 1989 में चीन के छात्रों ने थियेनमान चौक पर लोकतंत्र की बहाली के लिए प्रदर्शन किया था, जिसे चीनी सत्ता ने सख्ती से कुचल डाला था। हांगकांग में चीन आर्थिक उदारीकरण बनाए रखने का समर्थक तो है, परंतु राजनीतिक उदारीकरण का विरोधी है। लोकतंत्र को दबाने की चीन की यह प्रवृत्ति हांगकांग में भी सामने आई है।
इस साल अक्तूबर में हत्या के आरोपी एक हांगकांग युवा के ताईवान में प्रत्यर्पण की खबरों से भी लोग भारी विरोध पर उतर आए थे। चान टोंग-काई नाम के युवक पर पिछले साल ताइवान में अपनी गर्भवती प्रेमिका की हत्या करके भाग कर हांगकांग आने का आरोप है, लेकिन हांगकांग और ताइवान के बीच कोई प्रत्यर्पण संधि नहीं है। इस मामले के बाद चीनी सरकार ने प्रत्यर्पण कानूनों में बदलाव की योजना बनाई गई थी। चीन के इस कदम से नाराज हांगकांग के लोगों ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए। प्रस्तावित कानून के आलोचकों का कहना है कि चीन में प्रत्यर्पण से कई लोगों को मनमाने ढंग से हिरासत में लिया जा सकेगा और उन पर मुकदमा चलाया जा सकेगा। हांगकांग के लोग इस बात से भयभीत हो गए कि चीन यहां के लोकतंत्र समर्थकों को भी निशाना बना सकता है और उन्हें चीन में प्रत्यर्पण कर अत्याचार कर सकता है। हालांकि चीन की ऐसी मंशा को लेकर दुनिया को कोई संदेह भी नहीं है। हालांकि महीनों के भारी विरोध प्रदर्शनों के बाद सरकार को इसे औपचारिक रूप से वापस ले लिया, लेकिन प्रदर्शन अब तक नहीं थमे हैं।

हांगकांग में लोकतंत्र को नियंत्रित और प्रशासित करने के चीन के साम्यवादी प्रयास वहां की जनता के लिए विरोध का कारण बने हैं। साल 2017 में चीन ने यह तय करने का प्रयास किया था कि हांगकांग में निर्धारित निर्वाचन में भाग लेने वाले प्रत्याशियों के नाम का चयन चीन के साम्यवादी दल द्वारा किया जाएगा। हांगकांग के लोगों ने चीन की इस नीति को अपने मौलिक और पारंपरिक अधिकारों पर अतिक्रमण माना और यहीं से विरोध शुरू हुआ। हांगकांग के लोगों का मानना है कि उनके प्रतिनिधि के चयन का अधिकार उन्हें ही होना चाहिए। इसके पहले 1997 ने जब ब्रिटिश आधिपत्य से हांगकांग को चीन को हस्तांतरित किया गया था, तब चीन ने यह वादा किया था कि हांगकांग में लोकतंत्र की स्थापना होगी। अब चीन हांगकांग में अपने उस वादे और नीति से उलट काम कर रहा है। इसीलिए उसका वैश्विक विरोध हो रहा है। हांगकांग को लेकर अमेरिका की जो नीति सामने आई है, उससे साफ है कि दुनिया हांगकांग में चीन की लोकतंत्र विरोधी गतिविधियों पर नजर रखे हुए है और वह जनता के साथ खड़ी है। इन सबके बीच बेजिंग की आपत्तियों को दरकिनार कर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हांगकांग में प्रदर्शनकारियों को समर्थन देने वाले कानून पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। ट्रंप के हस्ताक्षर के बाद अब हांगकांग मानवाधिकार एवं लोकतंत्र अधिनियम, 2019 बिल कानून बन गया है। यह कानून मानवाधिकारों के उल्लंघन पर प्रतिबंधों का उपबंध करता है। इसके बाद हांगकांग की पुलिस को ऐसा सामान निर्यात नहीं हो सकेगा जिससे प्रदर्शनकारियों को नुकसान पहुंचाया जा सके। अमेरिकी समर्थन से हांगकांग के लोग उत्साहित हैं और इस कारण चीन का विरोध बढ़ने का संकट गहरा गया है।

हांगकांग की मुख्य कार्यकारी कैरी लाम पर भी जनता को भरोसा नहीं रह गया है। लोग उन्हें चीनी एजेंट के तौर पर देखते हैं। जनता को स्थानीय पुलिस पर भी भरोसा नहीं है। ऐसे में इस व्यापारिक केंद्र में कानून-व्यवस्था बड़ी चुनौती बन गई है। हाल के स्थानीय चुनावों में लोकतंत्र समर्थकों को शानदार जीत मिली है। इस जीत को एक तरह से जनमत संग्रह के रूप में भी देखा जा रहा है। चीनी शासन के विरोध में सभी आयु वर्ग के लोग लामबंद हो गए हैं और इसका असर वहां के जनजीवन पर भी देखा जा सकता है। लोकतंत्र समर्थक आंदोलन के छह महीने पूरे होने पर आयोजित जनसभा में लाखों लोगों ने काले कपड़े पहन कर भाग लिया और इसे चीन के विरोध के तौर पर भी देखा जा रहा है। हांगकांग की संसद में घुस कर युवा ब्रिटिश कालीन झंडा फहराकर अपना गुस्सा जता चुके हैं। चीन के राष्ट्रीय गान के प्रति कई मौकों पर असम्मान दिखता है। इन घटनाओं का असर चीन की शक्तिशाली सत्ता पर पड़ना स्वाभाविक है।

हालांकि छह महीने से चल रहे इस आंदोलन से हांगकांग की व्यापारिक प्रतिष्ठा को गहरी ठेस पहुंची है और यह देश आर्थिक और कारोबारी संकट से घिरने लगा है। जीडीपी में गिरावट दर्ज की गई है और मंदी का असर जनजीवन पर भी देखा जा रहा है। इन सबके बीच चीन का नजरिया इस लोकतांत्रिक आंदोलन को कुचलने वाला ही नजर आता है। चीन को लगता है कि हांगकांग का आर्थिक विकास कर लोगों को खामोश किया जा सकता है, लेकिन उसकी नीति में लोगों को भरोसा नहीं है। हांगकांग के लोग बिना किसी नेता के लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। आंदोलनकारियों में अधिकांश युवा हैं। वहीं चीन के समर्थन में भी एक समूह है जो लोकतंत्र के पक्ष में खड़े नेताओं को निशाना बना रहा है। चीन की जल्दबाज़ी के चलते एक विकसित और अत्याधुनिक क्षेत्र गृहयुद्ध की ओर बढ़ रहा है। हांगकांग के लोग लोकतंत्र में विश्वास करते हैं। उन्हें साम्यवाद की आक्रामकता स्वीकार नहीं है। ये लोग अपनी भावी पीढ़ी के लिए साम्यवादी चीन की नीतियों को संकट की तरह देख रहे हैं।

ब्रह्मदीप अलूने

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