ताज़ा खबर
 

राजनीति: भंवर में शिक्षा

इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि देश में ज्यादातर पाठशालाएं भवन, पर्याप्त संख्या में शिक्षक, पुस्तकालय, शौचालय और पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। ऐसी पाठशालाएं भी बड़ी संख्या में हैं जहां कुछ सुविधाएं उपलब्ध कराने की खानापूर्ति भर कर दी गई है। कई पाठशालाएं ऐसी हैं जहां शौचालय तो हैं, लेकिन उनकी दशा उपयोग करने लायक नहीं है। यह निश्चित रूप से शिक्षा का अधिकार कानून का उल्लंघन है।

Author May 17, 2019 1:03 AM
स्कूल में शिक्षकों की नियुक्ति तक नहीं होती।

संजय ठाकुर

यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण ही है कि शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून बनने के बाद देश में शिक्षा के स्तर में कोई बड़ा सकारात्मक बदलाव आया है। यह तो जरूर कहा जा सकता है कि इस कानून के बनने के बाद प्राथमिक पाठशालाओं में बच्चों की संख्या बढ़ी है। लेकिन ऐसी संख्या का तब तक कोई महत्त्व नहीं जब तक शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार नहीं लाया जाता। गुणवत्ता के अभाव में बच्चे पाठशालाओं में पहुंच कर भी हासिल कुछ नहीं कर पा रहे। पाठशालाओं में बच्चों की संख्या बढ़ाने से कहीं ज्यादा जरूरी शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाना है। शैक्षणिक उन्नति का सवाल सीधे तौर पर शिक्षा की गुणवत्ता से जुड़ा है, न कि पाठशालाओं में बच्चों की संख्या से।

सरकार के पास शिक्षा के संबंध में योजनाओं का तो अंबार है, लेकिन उचित क्रियान्वयन के अभाव में इनसे शिक्षा के क्षेत्र में लाभ होता कभी देखा नहीं गया। ऐसी योजनाएं शिक्षा के मूल उद्देश्यों की पूर्ति से कोसों दूर हैं। ‘समग्र शिक्षा योजना’ ऐसी ही एक योजना है जिसे प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा के सभी स्तरों पर गुणवत्ता में सुधार के लिए एक बड़े बदलाव के तौर पर पेश किया गया था। लेकिन वास्तविक स्थिति इसके बिल्कुल उलट है। इस योजना के अंतर्गत ऐसा कुछ भी नहीं किया गया जिससे कहा जा सके कि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार की दिशा में कोई सार्थक प्रयास किए गए हैं। तकनीक का लाभ उठाने और अच्छी गुणवत्ता से युक्त शिक्षा तक सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की पहुंच बनाना भी इस योजना का एक उद्देश्य था। लेकिन इसकी पूर्ति करने में सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश नाकाम रहे।

इसी तरह ‘दीक्षा’ नाम से भी एक कार्यक्रम चलाया गया था जिसे शिक्षकों के लिए राष्ट्रीय डिजिटल प्लेटफॉर्म के रूप में प्रचारित किया गया, लेकिन यह भी शिक्षा के मूल उद्देश्यों की पूर्ति से दूर ही रहा। इसी तरह एक योजना ‘नई एकीकृत विद्यालय शिक्षा योजना’ के नाम से भी चलाई गई जो सर्वशिक्षा अभियान, राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान और शिक्षक-शिक्षण अभियान पर आधारित है। इस योजना के लिए पचहत्तर हजार करोड़ रुपए के बजट का प्रावधान किया गया है। हालांकि यह योजना सबको शिक्षा और अच्छी शिक्षा की परिकल्पना के परिप्रेक्ष्य में लाई गई है जिसका लक्ष्य देश में सबको प्री-नर्सरी से लेकर बारहवीं तक की शिक्षा-सुविधा उपलब्ध कराने के लिए राज्यों की सहायता करने पर केंद्रित है, लेकिन शिक्षा के मूल उद्देश्यों की पूर्ति इससे भी नहीं हो रही है। इस योजना में शिक्षा के क्षेत्र में सतत विकास के लक्ष्यों के अनुरूप नर्सरी से लेकर माध्यमिक स्तर तक सबके लिए समान रूप से समग्र और गुणवत्ता से युक्त शिक्षा सुनिश्चित करना, शिक्षकों और प्रौद्योगिकी पर ध्यान केंद्रित करते हुए विद्यालय-शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारना और छात्रों के सीखने की क्षमता में वृद्धि करवा कर उन्हें कई तरह के कौशल और ज्ञान में दक्ष बनाना जैसी बातों का समावेश था। लेकिन नतीजा वही, ढाक के तीन पात रहा।

सरकार द्वारा संसद में पेश एक रिपोर्ट के अनुसार देश में तेरह लाख सरकारी पाठशालाओं में से एक लाख पांच हजार छह सौ तीस पाठशालाएं सिर्फ एक-एक शिक्षक के भरोसे चल रही हैं। यह बात और है कि कई पाठशालाएं ऐसी हैं जहां एक भी शिक्षक नहीं है। वैसे तो, शिक्षा की यह तस्वीर देश के सभी राज्यों में देखी जा सकती है, लेकिन मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान शिक्षा की इस दुर्दशा के मामले में दूसरे राज्यों से बहुत आगे हैं। ऐसी किसी पाठशाला में कार्यरत एक शिक्षक पर बच्चों को सभी विषय पढ़ाने का दायित्व तो है ही, साथ ही उसे बच्चों के दोपहर के भोजन की भी व्यवस्था करनी होती है। कहां तो शिक्षा का अधिकार कानून के अंतर्गत यह प्रावधान किया गया है कि किसी भी पाठशाला में तीस से पैंतीस बच्चों पर एक शिक्षक का होना जरूरी है, जबकि देश की लाखों पाठशालाओं में शिक्षक ही नहीं हैं!

इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि देश में ज्यादातर पाठशालाएं भवन, पर्याप्त संख्या में शिक्षक, पुस्तकालय, शौचालय और पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। ऐसी पाठशालाएं भी बड़ी संख्या में हैं जहां कुछ सुविधाएं उपलब्ध कराने की खानापूर्ति भर कर दी गई है। कई पाठशालाएं ऐसी हैं जहां शौचालय तो हैं, लेकिन उनकी दशा उपयोग करने लायक नहीं है। यह निश्चित रूप से शिक्षा का अधिकार कानून का उल्लंघन है।

वर्तमान समय में शिक्षा जहां बुरी तरह से सरकार की उपेक्षा की शिकार है, वहीं शिक्षा के प्रति शिक्षकों की कोताही व उदासीनता और शिक्षक-राजनीति से भी शिक्षा और शिक्षा-मूल्यों का ह्रास हुआ है। शिक्षक शिक्षण कार्य से ज्यादा राजनीतिक गतिविधियों में दिलचस्पी लेने लगे हैं। ये राजनीतिक गतिविधियां विभागीय स्तर पर तो देखी ही जा सकती हैं, साथ ही महत्त्वाकांक्षाओं का यह जाल देश के राजनीतिक पैमाने पर भी देखा जा रहा है। इसकी एक जीती-जागती तस्वीर अपने असली रंग में लोकसभा व विधानसभा चुनावों में नजर आती है जब शिक्षक संघ किसी दल-विशेष के लिए काम करने लगते हैं। ऐसे घटनाक्रम का परिप्रेक्ष्य जो भी हो, इससे शिक्षण-संस्थानों में चल रहे राजनीतिक दुष्चक्र की हकीकत उजागर होती है। बहुत-से शिक्षकों के आचरण और ठाठ देख कर तो कहीं भी यह नहीं लगता कि इन्हें सरकार ने पाठशालाओं में पढ़ाने के लिए भर्ती किया है। देश में शिक्षक-राजनीति के खुले खेल का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि राजनीतिक दलों से ज्यादा शिक्षक-संघ हैं।

हैरानी की बात तो यह है कि इन शिक्षक-संघों को विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा बाकायदा मान्यता मिली होती है। विभिन्न शिक्षक-संघों से जुड़े शिक्षकों को सरकारी शिक्षण-संस्थानों में कार्यरत दूसरे शिक्षकों से बिल्कुल अलग देखा जाता है। इन पर सरकार व प्रशासन द्वारा निर्धारित मापदंड भी लागू नहीं होते। ये शिक्षक नियमित रूप से कक्षाओं में न जाने के कारण जब अपना पाठ्यक्रम पूरा नहीं करवा पाते तो वार्षिक परीक्षाओं में छात्रों को पास करवाने के लिए नकल करवाते हैं। इस तरह से ये शिक्षक अपना वार्षिक परीक्षा परिणाम भी अच्छा, या यों कहिए कि शत-प्रतिशत तक रखवाने में भी कामयाब हो जाते हैं। इनकी इस ‘कामयाबी’ के पीछे की वास्तविकता तो पर्दे के पीछे की ही बात रह जाती है। विभिन्न शिक्षक-संघों से संबद्ध ये शिक्षक पाठशालाओं में रहें या पाठशालाओं से बाहर, हमेशा अपनी राजनीतिक मंशाओं को पूरा करने में लगे रहते हैं। इसका नतीजा यह निकला है कि शिक्षा में गुणात्मक सुधार होना तो दूर, उल्टे शिक्षा का स्तर लगातार गिरता जा रहा है।

सरकार की उपेक्षा, शिक्षकों के रवैये और शिक्षक-राजनीति की इस बिसात से जो विसंगति सामने निकल कर आती है वह सीधे-सीधे शिक्षा के सरोकारों से जुड़ी है। इन सब बातों का खमियाजा शिक्षा जैसे गंभीर विषय, इससे जुड़े सरोकारों और उच्च शिक्षा-मूल्यों को भुगतना पड़ रहा है। इस सारे घटनाक्रम में कोई आहत हो रहा है तो वह है शिक्षा। इस उभरते परिदृश्य पर कोई तस्वीर विकृत रूप में उकेरी जा रही है तो वह है शिक्षा की। अगर सरकार शिक्षा के प्रति गंभीर नहीं है और शिक्षण-संस्थानों में शिक्षक शिक्षा के मूल उद्देश्यों से भटक कर अपने तुच्छ राजनीतिक स्वार्थों का ताना-बाना बुनते हैं तो शिक्षा का भंवर में फंसना निश्चित है। इससे शिक्षा के सार्थक उद्देश्यों की पूर्ति के संदर्भ में संदेह पैदा होते हैं। शिक्षा को इस भंवर से मुक्त करवाना वक्त की जरूरत है, वरना आने वाली पीढ़ियों का भविष्य अंधकार में ही होगा।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App