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राजनीति: आर्थिक संकट में घिरा पाकिस्तान

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था दिवालिया जैसी हालत में है। प्रधानमंत्री इमरान खान का कहना है कि उनके देश के पास कर्ज की किस्तें चुकाने तक के लिए डॉलर नहीं बचे हैं। विकास दर चार फीसद पर आ गई है, जो नौ साल के निचले स्तर पर है। इसी तरह विदेशी मुद्रा भंडार तेरह अरब डॉलर से भी कम रह गया है। पाकिस्तान एक बार फिर आर्थिक मदद के लिए आइएमएफ के दरवाजे पर खड़ा है।

Author Published on: September 16, 2019 2:13 AM
Imran Khanपाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान। (REUTERS/Jonathan Ernst/File Photo)

जयंतीलाल भंडारी

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध काफी तनावपूर्ण चल रहे हैं। इस मुद्दे पर दुनिया का ध्यान खींचने के लिए पाकिस्तान ने पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) में नियंत्रण रेखा पर सेना की तैनाती और बढ़ा दी है। ऐसे में दुनिया के अर्थविशेषज्ञों का कहना है कि यदि पाकिस्तान भारत पर युद्ध थोपने का दुस्साहस करता है तो पहले से ही कमजोर पड़ी उसकी अर्थव्यवस्था और चौपट हो जाएगी। हालांकि भारत की अर्थव्यवस्था में भी सुस्ती का दौर है, लेकिन पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था तो एकदम खस्ताहाल है और भारी मंदी की चपेट में है। ऐसे में भारत के साथ युद्ध की कल्पना भी उसे नहीं करनी चाहिए। युद्ध से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को जो नुकसान होगा, उसकी भरपाई वह दशकों तक नहीं कर पाएगा।

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के समक्ष संकट एक नहीं, कई हैं। जहां उसके आंतरिक वित्तीय राजस्व में कमी आ रही है, वहीं बाहरी वित्तीय मदद का संकट भी गहराता जा रहा है। पिछले महीने आॅस्ट्रेलिया की राजधानी कैनबरा में आतंकी गतिविधियों के लिए धन मुहैया कराने और धन शोधन करने वाले देशों पर निगरानी रखने वाली अंतरराष्ट्रीय एजेंसी फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की एशिया-प्रशांत इकाई की हुई बैठक में पाकिस्तान को काली सूची में डालने का फैसला किया गया था। अब इस पर अंतिम फैसले के लिए अगले महीने एफएटीएफ की बैठक होगी। पाकिस्तान के लिए गंभीर संकट की आहट है। यदि पाकिस्तान को काली सूची में डालने के फैसले पर मुहर लग जाती है तो उसकी आर्थिक स्थिति और गंभीर हो जाएगी।

एफएटीएफ के एशिया प्रशांत समूह ने अपनी जांच में पाया था कि पाकिस्तान ने धनशोधन और आतंकवाद के वित्त पोषण संबंधी कुल चालीस मानकों में से बत्तीस का अनुपालन नहीं किया। ऐसे में अब खस्ताहाल अर्थव्यवस्था से जूझ रहे पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आएएमएफ), विश्व बैंक और यूरोपीय संघ आदि से मदद मिल पाना मुश्किल हो जाएगा। इसका असर यह होगा कि मूडीज और स्टैंडर्ड एंड पूअर्स (एसएंडपी) जैसी वैश्विक रेटिंग एजेंसियां भी पाकिस्तान की रेटिंग गिराने को मजबूर होंगी। रेटिंग एजेंसियों की रेटिंग से ही देश यह तय करते हैं कि किस देश में निवेश किया जा सकता है। इससे पाकिस्तान में होने वाले निवेश पर प्रतिकूल असर पड़ेगा, निवेशक बिदकेंगे और इससे उसकी अर्थव्यवस्था की कमर टूट सकती है। अमेरिका ने भी पाकिस्तान को एक बड़ा आर्थिक झटका दिया है। अमेरिका ने केरी लूगर बर्मन एक्ट के तहत पाकिस्तान को ऊर्जा एवं जल संकट से निपटने के लिए दी जाने वाली प्रस्तावित मदद में चवालीस करोड़ डॉलर की कमी कर दी है।

इसमें कोई दो मत नहीं है कि इस समय भारतीय अर्थव्यवस्था में सुस्ती का दौर है, लेकिन फिर भी भारतीय अर्थव्यवस्था पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के मुकाबले तो काफी मजबूत है। भारतीय अर्थव्यवस्था पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था से नौ गुना बड़ी है। विकास दर, विदेशी मुद्रा भंडार और महंगाई नियंत्रण के मामले में भी भारतीय अर्थव्यवस्था पाकिस्तान की तुलना में बहुत अच्छी स्थिति में है। लेकिन पाकिस्तान में हालात इसके उलट हैं। पिछले महीने पाकिस्तान ब्यूरो आॅफ स्टेटिस्टिक्स (पीबीएस) ने महंगाई के जो आंकड़े जारी किए थे, वे चौंकाने वाले थे। इन आंकड़ों के अनुसार पाकिस्तान में महंगाई तेजी से बढ़ रही है। जुलाई 2019 में पाकिस्तान में महंगाई दर 10.34 फीसद रही, जो पिछले साल जुलाई 2018 में 5.86 फीसद थी। जबकि भारत में महंगाई कम बढ़ी है।
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था दिवालिया जैसी हालत में है। प्रधानमंत्री इमरान खान का कहना है कि उनके देश के पास कर्ज की किस्तें चुकाने तक के लिए डॉलर नहीं बचे हैं। विकास दर गिरती हुई चार फीसद पर आ गई है जो नौ साल के निचले स्तर पर है। इसी तरह विदेशी मुद्रा भंडार तेरह अरब डॉलर से भी कम रह गया है।

पाकिस्तान एक बार फिर आर्थिक मदद के लिए आइएमएफ के दरवाजे पर खड़ा है। उसकी मुद्रा एशिया की सबसे कमजोर मुद्रा हो गई है। डॉलर के मुकाबले पाकिस्तान का रुपया डेढ़ सौ के पार चला गया है। यदि पाकिस्तान भारत पर युद्ध थोपता है तो यह उसका आत्माघाती कदम होगा। बीस साल पहले भी करगिल की लड़ाई में दोनों देशों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा था। अब बीस साल बाद भारत पाकिस्तान से किसी भी युद्ध की स्थिति में आर्थिक दृष्टिकोण से बहुत मजबूत स्थिति में है। इस समय भारत का वार्षिक रक्षा बजट पाकिस्तान से पांच गुना ज्यादा है। करगिल युद्ध में दोनों देशों को रोजाना करीब पंद्रह करोड़ रुपए का खर्च आया था। चूंकि करगिल युद्ध कश्मीर के एक छोटे क्षेत्र तक ही सीमित था, इसलिए यह पंद्रह करोड़ रुपए तक ही सीमित रहा था। लेकिन अब ऐसा नहीं है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है की जिस तरह बहुत बड़े क्षेत्र में विस्तृत पैमाने पर भारत-पाक युद्ध छिड़ने की आशंका बढ़ रही है, उसमें यह खर्च पांच से दस हजार करोड़ रुपए प्रति सप्ताह से भी अधिक बढ़ सकता है। इतना भारी-भरकम खर्च पाकिस्तान की कमजोर अर्थव्यवस्था की मुश्किलें और बढ़ा देगा।

युद्ध की स्थिति में पाकिस्तान की आर्थिक मुश्किलें बढ़ाने के लिए भारत नदियों को भी हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हुए दुश्मन देश को सबक सिखा सकता है। भारत ने इस साल 21 फरवरी को फैसला किया था कि वर्ष 1960 में हुए सिंधु जल समझौते के कारण पाकिस्तान को जो लाभ हो रहे हैं, उन्हें भी रोका जाएगा। भारत के इस फैसले से पाकिस्तान चिंतित हो गया है। एक मार्च को पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र को पत्र लिख कर कहा था कि अगर भारत नदियों से पाकिस्तान को मिलने वाला पानी रोकता है तो इससे पाकिस्तान के सामने पीने के पानी और कृषि तथा उद्योगों के लिए संकट खड़ा हो जाएगा। यदि भारत अब आतंकी हमले और शत्रुता के मद्देनजर सिंधु जल समझौते को तोड़ दे तो पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित होगी।

इन सबके अलावा पाकिस्तान से युद्ध की चुनौती के बीच भारत दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के साथ-साथ पाकिस्तान रहित दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार क्षेत्र (साफ्टा) के लिए म्यांमार, श्रीलंका, थाईलैंड, नेपाल और भूटान को मिला कर बनाए गए समूह बिम्सटेक (बे आॅफ बंगाल इनीशिएटिव फॉर मल्टी सेक्टर टेक्नीकल एंड इकोनॉमिक कोआॅपरेशन) की संभावना को आगे बढ़ा रहा है। इससे पाकिस्तान का पड़ोसी देशों के साथ कारोबार घटेगा। यह पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती होगी। स्पष्ट है कि पाकिस्तान को भारत के साथ उद्योग-कारोबार की जरूरत बनी हुई है। दुनिया के अर्थविशेषज्ञों का कहा है कि पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए जरूरी है कि वह पाकिस्तान में भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण और विद्वेष का माहौल बंद करे और पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए भारत के साथ कारोबार संबंध फिर से बहाल करे। यदि पाकिस्तान ऐसा नहीं करेगा तो उसकी पस्त होती अर्थव्यवस्था गर्त में चली जाएगी।

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