ताज़ा खबर
 

राजनीति: सूखे का मंडराता खतरा

उत्तर प्रदेश-मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र और महाराष्ट्र, गुजरात के कई जिलों में हाहाकार मचा है। जबकि पिछले मानसून की समाप्ति के दिन दावा किया गया था कि देश में बारिश सामान्य हुई है। सरकारी दावा यह भी था कि पिछली बारिश के पानी को हमने बांधों में पर्याप्त मात्रा में जमा करके रख लिया है। फिर भी आधा देश सूखे की चपेट में आ गया।

Author June 13, 2019 1:15 AM
सूखे तालाब के बीच से गुजरता शख्स।

सुविज्ञा जैन

देश पर सूखे का साया मंडरा रहा है। यह आशंका सिर्फ इस वजह से नहीं है कि मानसून देर से आया या अल नीनो के असर से पानी कम गिरने का अंदेशा है, बल्कि पिछले साल का कटु अनुभव हमारे सामने है। पिछला मानसून सामान्य रहने के बाद भी इस साल देश का लगभग आधा हिस्सा सूखे की चपेट में है। आखिर ऐसा क्योंकर हुआ? सरकारी जवाब में इसका कारण आसमानी बताया जाता है। लेकिन पड़ताल की जाए तो पता चलेगा कि मसला कुछ और है। इसे प्रबंधन प्रौद्योगिकी के नजरिए से बेहतर समझ सकते हैं। कुदरत पूरी दुनिया की जमीन पर जितना पानी बरसाती है उसका चार फीसद भारत को देती है। जबकि भारत का क्षेत्रफल दुनिया की पूरी जमीन का सिर्फ ढाई फीसद है। यानी कुदरत बाकी दुनिया की तुलना में हमें कोई पौने दो गुना ज्यादा पानी देती है। इस लिहाज से हम जल संपन्न हैं। लेकिन भारत की आबादी दुनिया की कुल आबादी की सत्रह फीसद है। इसीलिए बाकी दुनिया की तुलना में प्रकृति से प्रतिव्यक्ति पानी की उपलब्धता एक चौथाई रहने लगी है। लेकिन इतना पानी भी कोई कम नहीं है। दूसरे कई देश बहुत ज्यादा जल विपन्न हैं। पर उनका जल प्रबंधन पुख्ता है। इसीलिए वे लगातार दो-तीन साल तक कम बारिश के बावजूद सूखे या अकाल से बचे रहते हैं। दरअसल, उन्होंने जल भंडारण के लिए प्रचुर बांध और जलाशय बना लिए हैं।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक सदियों से हमें औसतन चार हजार अरब घनमीटर पानी हर साल बारिश से मिलता है। इस समय हमारी आबादी एक सौ छत्तीस करोड़ है। यानी भारत में वर्षा से प्रति व्यक्ति सालाना करीब तीन हजार घनमीटर पानी अभी भी मिल रहा है। अंतरराष्ट्रीय पैमाने के मुताबिक सालाना प्रतिव्यक्ति दो हजार घनमीटर पानी की जरूरत होती है। इस लिहाज से तो हम प्रकृति से आज भी डेढ़ गुना ज्यादा पानी पा रहे हैं। इसलिए सवाल उठता है कि फिर भी जल संकट क्यों है? सरकारी विशेषज्ञ बताते हैं कि जो पानी हमें वर्षा के रूप में मिलता है वह पूरा का पूरा हम इस्तेमाल नहीं कर सकते। इसका कारण देश की भू-आकृति है। और फिर हिसाब लगा कर बताया जाता है कि चार हजार अरब घनमीटर पानी में से हम सिर्फ ग्यारह सौ अरब घनमीटर पानी इस्तेमाल कर सकते हैं। यह सरकारी आंकड़ा सनसनीखेज है।

देश में इस्तेमाल हो सकने लायक पानी की यह मात्रा देश में प्रतिव्यक्ति पानी की जरूरत से कमोबेश आधी ही है। सरकारी विशेषज्ञों का दावा है कि देश में सतही जल सिर्फ छह सौ चौरासी अरब घनमीटर और भूजल चार सौ तेईस अरब घनमीटर उपलब्ध है। इन्हीं दोनों मदों को जोड़ कर कुल उपलब्ध पानी का आंकड़ा 1107 अरब घनमीटर का निकला है। दो हजार घनमीटर प्रतिव्यक्ति के हिसाब से हमें एक सौ छत्तीस करोड़ लोगों के लिए इस समय 2720 अरब घनमीटर पानी चाहिए। जबकि देश में इस्तेमाल के लिए उपलब्ध पानी की मात्रा 1107 अरब घनमीटर बताई जा रही है। यह न्यूनतम जरूरत से आधी से भी कम है। इससे भी सनसनीखेज तथ्य यह है कि इस 1107 अरब घनमीटर उपलब्ध पानी को भी पूरा का पूरा इस्तेमाल करने का इंतजाम इस समय देश के पास नहीं है।
अब रही सूखे की समस्या से निपटने की बात। दरअसल, सूखे और बाढ़ को हमने प्राकृतिक आपदा मान रखा है। इसके लिए आपदा प्रबंधन का एक अलग से अकादमिक विषय भी बन गया है। लेकिन इस मामले में अनुभव यही है कि दोनों आपदाओं के लिए हमारे पास राहत के काम के अलावा करने को ज्यादा कुछ है नहीं। आगे वाकई कुछ करना हो तो सूखे के बारे में अब तक के ज्ञान को दोहराना जरूरी है। सूखे के मुख्य चार प्रकार हैं। मिटीरियोलॉजिकल यानी मौसमी सूखा, हाइड्रोलॉजिकल यानी जलविज्ञानी सूखा, एग्रीकल्चरल यानी कृषि सूखा और सोशियो-इकोनॉमिक यानी सामाजिक-आर्थिक सूखा। मौसमी सूखे के मायने ये हैं कि जब बारिश औसत से पच्चीस फीसद या उससे कम हो। इसके भी दो प्रकार हैं। एक, जब पच्चीस से पचास फीसद तक कम हो और दूसरा, जब पचास फीसद से भी कम हो जिसे भयावह आपदा कहा जाता है।

इस बार के बारिश के अनुमानों में भयावह हालात का अंदेशा तो अभी नहीं जताया गया है लेकिन सरकारी और गैर-सरकारी एजंसियों ने ऐसे अंदेशे को खारिज भी नहीं किया है। लेकिन यह अनुभव हमारे पास है कि अगर इस बार मौसमी सूखा नहीं भी पड़ा तो दूसरे प्रकार का सूखा यानी जलविज्ञानी सूखा पड़ने का अंदेशा जरूर है। यह सूखा उस हालत में भी पड़ता है जब मौसमी बारिश तो सामान्य हुई हो, लेकिन बारिश के पानी को हम आगे के लिए जमा करके न रख पाए हों। इस बार यही आशंका सबसे ज्यादा है। यह आशंका इस आधार पर है कि पिछले कुछ साल से बार-बार सूखे के हालात बनने लगे हैं। गौरतलब है कि बारिश के लिहाज से छत्तीस उपखंडों में बांटे गए देश में एक जैसी बारिश नहीं होती। हर साल बहुत से उपखंड सूखे की चपेट में आ जाते हैं। जबकि देश में औसत बारिश का आंकड़ा सामान्य दिखता है।

कृषि सूखा वह परिस्थिति होती है जिसमें अगर मौसमी और जलविज्ञानी सूखा न भी पड़े तब भी कृषि सूखा पड़ता है, खासतौर पर तब जब हमने बरसाती पानी का भंडारण पर्याप्त मात्रा में करके न रखा हो। हम इसी दशा के शिकार हैं। हाल का उदाहरण देखें तो इस साल पिछले महीने तक देश के बांध लगभग रीत गए थे। उत्तर प्रदेश-मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र और महाराष्ट्र, गुजरात के कई जिलों में हाहाकार मचा है। जबकि पिछले मानसून की समाप्ति के दिन दावा किया गया था कि देश में बारिश सामान्य हुई है। सरकारी दावा यह भी था कि पिछली बारिश के पानी को हमने बांधों में पर्याप्त मात्रा में जमा करके रख लिया है। फिर भी आधा देश सूखे की चपेट में आ गया। इससे साबित होता है कि मौसमी और जलविज्ञानी सूखा नहीं पड़ने के बावजूद कृषि सूखे के हालात बन गए। पेशेवर भाषा में इसे प्रबंधन की नाकामी कहते हैं।

सामाजिक-आर्थिक सूखा वह विकट स्थिति होती है जब पानी उपलब्ध भी हो, लेकिन खेतों तक न पहुंचाया जा सके। गौरतलब है कि इस समय देश की कुल खेती की जमीन में आधी जमीन पर सिंचाई की सुविधा नहीं है। वर्षा आधारित खेती वाले किसान बहुत कुछ बारिश पर निर्भर होते हैं और भारी खर्चा करके जमीन के भीतर का पानी उलीचते हैं। सबको पता है कि सतही जल का प्रबंधन न होने के कारण भूजल स्तर गिरने की क्या हालत होती जा रही है। ये ज्यादातर किसान छोटी-छोटी जोत वाले हैं। वे अपने गुजारे लायक आमदनी भी मुश्किल से कर पा रहे हैं। मौसम की जरा सी ऊंच-नीच को हम सूखा भले न कहें, लेकिन गैर-सिंचित खेती करने वाले किसानों के लिए तो वह जीवन-मरण का सवाल होता है। कर्जा ले-लेकर निजी तौर पर पानी का इंतजाम करने वाले इन किसानों के पास खेती से या जीवन से पलायन करने के अलावा कोई और विकल्प बचा नहीं दिख रहा है।

हमारा जल प्रबंधन कच्चा है। हम बारिश का बहुत ही कम पानी बांधों में रोक कर रख पा रहे हैं। हालांकि इस मजबूरी के लिए कोई खर्च का तर्क दे सकता है। लेकिन पिछले सत्तर साल में बढ़ते-बढ़ते हम दो सौ लाख करोड़ की अर्थव्यवस्था बन गए हैं। लिहाजा, जल प्रबंधन पर खर्च का भी तर्क कच्चा है। जिस तरह से आजादी के बाद के तीन दशकों में जल प्रबंधन का काम हुआ था वैसा काम फिर से शुरू करने के अलावा कोई तरीका फिलहाल तो किसी के पास नहीं दिखता।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

X