ताज़ा खबर
 

आतंकवाद और दोहरा रुख

पुलवामा हमले की चीन ने निंदा की है, लेकिन मौलाना मसूद अजहर को लेकर कोई ठोस बात नहीं की है। चीन ने मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने वाले प्रस्ताव को दो बार वीटो कर दिया। हालांकि 2017 के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में चीन ने जैश-ए-मोहम्मद को आतंकवादी संगठन करार दिया था, फिर भी संयुक्त राष्ट्र में वीटो के द्वारा मसूद अजहर का बचाव जारी है। इसका प्रमुख कारण है चीन और पाकिस्तान की घनिष्ठ मित्रता।

Author Updated: February 26, 2019 4:23 AM
पाकिस्तान इस वक्त सबसे भयानक आर्थिक संकट से गुजर रहा है।

राहुल लाल

पुलवामा आतंकी हमले के बाद देशभर में आतंकवाद को लेकर आक्रोश उच्चतम स्तर पर व्याप्त है। पाकिस्तान की आर्थिक नाकेबंदी को लेकर भारत ने उससे आर्थिक क्षेत्र के विशिष्ट तमगे ‘सर्वाधिक तरजीह राष्ट्र’ (एमएफएन) का दर्जा भी वापस ले लिया है। पाकिस्तान से आयात की जाने वाली सभी वस्तुओं पर आयात शुल्क में भी दो सौ फीसद की वृद्धि कर दी है। पाकिस्तान इस वक्त सबसे भयानक आर्थिक संकट से गुजर रहा है। हालत यह है कि उसका विदेशी मुद्रा भंडार नौ अरब डॉलर रह गया है, जबकि बांग्लादेश का तैंतीस अरब डॉलर है। लेकिन ऐसे में जब पाकिस्तान को संपूर्ण दुनिया में आतंकवाद के पोषण स्थल के रूप में माना जा रहा है, फिर भी सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने पाकिस्तान के साथ बीस अरब डॉलर का समझौता किया, जिसमें ग्वादर बंदरगाह के नजदीक एक तेल रिफाइनरी में आठ अरब डॉलर का निवेश भी शामिल है। ऐसे में सवाल उठता है कि सऊदी अरब जिसके भारत से काफी अच्छे संबंध हैं, वह भारत के समर्थन में पाकिस्तान पर दबाव क्यों नहीं बना रहा?

इस सवाल के जवाब के लिए मध्यपूर्व के संवेदनशील क्षेत्र में शिया और सुन्नी विवाद को समझना होगा। सऊदी अरब संपूर्ण दुनिया में सुन्नी मुसलमानों की अगुआ और धर्मगुरु होने का दावा करता है, जबकि ऐसा ही दावा ईरान शिया समुदाय को लेकर करता है। पाकिस्तान भी सुन्नी बहुल मुसलिम देश है जो ईरान के विरुद्ध सऊदी अरब को सदैव सुरक्षा सहयोग देने का आश्वासन देता है और आर्थिक सहयोग की अपेक्षा रखता है। यही कारण है कि सऊदी अरब ने पाकिस्तान में परमाणु क्षेत्र मेंं भी पहले से निवेश कर रखा है। जमाल खशोगी हत्याकांड के बाद पिछले कुछ महीनों में सऊदी प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की छवि खराब हुई है। ऐसे में सलमान पाकिस्तान जैसे परंपरागत मित्रों को अपने साथ कर पुन: मध्य पूर्व में अपनी स्थिति मजबूत बनाना चाहते हैं। सऊदी के पैसे से इस्लामिक कट्टरता में भी जो अप्रत्याशित वृद्धि हुई है, वह भी अंतत: आतंकवाद को प्रोत्साहित करती है। स्पष्ट है कि निजी हितों के लिए आतंकवाद को माध्यम बनाया जा रहा है।

सऊदी अरब की तरह चीन का भी आतंकवाद के प्रति दोहरा रवैया रहा है। पुलवामा आतंकी हमले की जिम्मेदारी पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने ली है। जैश के प्रमुख मसूद अजहर को चीन वैश्विक आतंकवादी घोषित करने से बचाता रहा है। पुलवामा हमले की चीन ने निंदा की है, लेकिन मौलाना मसूद अजहर को लेकर कोई ठोस बात नहीं की है। चीन ने मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने वाले प्रस्ताव को दो बार वीटो कर दिया। हालांकि 2017 के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में चीन ने जैश-ए-मोहम्मद को आतंकवादी संगठन करार दिया था, फिर भी संयुक्त राष्ट्र में वीटो के द्वारा मसूद अजहर का बचाव जारी है। इसका प्रमुख कारण है चीन और पाकिस्तान की घनिष्ठ मित्रता। पाकिस्तान की संपूर्ण दशा-दिशा वहां की लोकतांत्रिक सरकार नहीं, बल्कि सेना एवं कट्टर चरमपंथी संगठन मिल कर तय करते हैं। चीन ने पाकिस्तान में भारी निवेश किया है। अमेरिका से पाकिस्तान की दूरी बढ़ने पर पाकिस्तान एक तरह से चीन का उपनिवेश ही बन गया है। ऐसे में अब पाकिस्तान पर चीन का दबदबा बढ़ गया है। इसलिए अब यह आवश्यक हो गया है कि भारतीय विदेश नीति को चीन के प्रति भी आक्रामक बनाया जाए।

न्यूयार्क में विश्व व्यापार केंद्र और वाशिंगटन में पेंटागन पर 2001 के हमले के बाद अमेरिका नाटो सेनाओं के साथ विश्वभर में हस्तक्षेप करता रहा है। लेकिन देखा जाए तो यह आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष कम और वर्चस्व तथा संसाधनों की लूट की लड़ाई ज्यादा थी। साल 2003 में सद्दाम हुसैन पर अमेरिका और ब्रिटेन ने आरोप लगाया कि वहां खतरनाक रासायनिक हथियार हैं। सद्दाम हुसैन को गिरफ्तार कर फांसी की सजा दी गई, लेकिन अमेरिका इराक में आज तक रासायनिक हथियारों को तो ढ़ूंढ़ नहीं पाया। इराक को हमेशा के लिए राजनीतिक एवं संघर्षात्मक हिंसा के लिए छोड़ दिया, जो आगे चल कर इस्लामिक स्टेट (आइएसआइएस) का क्षेत्र बन गया था। इस मामले से पश्चिम की आतंक के विरुद्ध आधी-अधूरी लड़ाई को समझा जा सकता है।

अमेरिका के लिए मध्यपूर्व ऊर्जा संसाधनों और भू-राजनीतिक रूप से बेहद महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह यूरोप तथा एशिया को जोड़ता है। रूस ने भी इस क्षेत्र में प्रवेश कर लिया और दोनों महाशक्तियों के बीच जोर आजमाईश प्रारंभ हो गई। अगर सीरिया मामले को ही देखें तो आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष को लेकर अमेरिका और रूस दो ध्रुवों पर खड़े हैं। रूस जहां बशर अल असद को समर्थन दे रहा है, वहीं अमेरिका विद्रोहियों को। रूस ने असद विद्रोहियों पर कार्रवाई की तो विरोध में अमेरिका ने असद को कमजोर करने के लिए सीरिया पर बड़ा रासायनिक हमला कर डाला। इस तरह से तो आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष संभव नहीं हो सकता। सीरिया की अधिकांश जनता सुन्नी है, वहीं बशर शिया समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे में क्षेत्रीय प्रभुत्व और सुन्नी वर्चस्व स्थापित करने के लिए सऊदी अरब भी अमेरिकी समूह में शामिल हो गया। वहीं बशर के शिया होने के कारण ईरान के हिजबुल्लाह लड़ाके भी बशर के समर्थन में आए। इस तरह शिया-सुन्नी विवाद के कारण कई बार आइएस को सीरिया में सऊदी अरब और अमेरिका में संरक्षण भी मिल जाता था। जाहिर है, आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष को लेकर अमेरिका की यह दोहरी और स्वाथपूर्ण नीति है। अमेरिका और ब्रिटेन ने नाटो सेनाओं के साथ मिल कर मध्यपूर्व और अफगानिस्तान में भी हस्तक्षेप किया। लेकिन आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष के बजाय इनके राष्ट्रीय हित प्राथमिक में रहे। पहले जब भारत आतंकवाद के खिलाफ बात करता था तो विकसित माने जाने वाले अधिकांश देश इसे तवज्जो ही नहीं देते थे। लेकिन जब आतंकियों ने पश्चिमी देशों में पांव पसारे तो अमेरिका के साथ यूरोप की भी आंखें खुलीं।

आतंक के खिलाफ पश्चिमी देशों के युद्ध के साथ ही कारोबार, साम्राज्यवाद तथा नव उपनिवेशवाद के दौर की भी शुरुआत हो गई है। आतंकवाद जैसी वैश्विक समस्या के समाधान के लिए आवश्यक है कि विश्व समुदाय आतंकवाद पर दोहरा रवैया रखना बंद करे। आइएसआइएस जैसे आतंकवादी संगठनों के प्रति भी पश्चिमी देशों का शुरुआती रवैया गंभीर नहीं था। कुछ खुफिया एजेंसियों का तो यह भी दावा था कि पश्चिमी राष्ट्र आइएस को प्रोत्साहन देकर दस डॉलर प्रति बैरल से भी सस्ता तेल खरीद कर अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत कर रहे थे। जब यह संगठन उन देशों के लिए भी संकट बनने लगा तब जाकर पश्चिमी देशों का दृष्टिकोण और भूमिका बदली। वर्ष 2017 में सोमालिया की राजधानी मोगादिशू में इस दशक का सबसे बड़ा आतंकवादी हमला हुआ था जिसमें चार सौ से ज्यादा लोग मारे गए थे। अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भले ही सभी आतंकवादी घटनाओं को एक रूप में देखने की शपथ ली जाती है, परंतु व्यवहार में ऐसा नजर नहीं आता। महाशक्तियों को समझना होगा कि भेदभावपूर्ण नीतियों से आतंकवाद के खिालफ संघर्ष कमजोर होता है। इसलिए आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष संपूर्ण विश्व समुदाय की जिम्मेदारी है। अब महाशक्तियों व क्षेत्रीय शक्तियों को आतंकवाद के नाम पर शक्ति संघर्ष के स्थान पर एकीकृत सोच अपनानी होगी। आतंकवाद पूरे विश्व में कहीं भी हो, यह मानवता के ऊपर बड़ा धब्बा है। विश्व समुदाय को चाहे आतंकवादी संगठन हों या पाकिस्तान जैसे देश जो आतंकवाद को खुलकर प्रायोजित करते हैं, उनसे कठोरता से निपटना होगा, तभी आतंक के खिलाफ संघर्ष के लक्ष्य को हासिल किया जा सकेगा।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 वैश्विक व्यापार में अवसर
2 चुनौतियों से जूझता बल
3 बौद्धिक संपदा और भारत