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राजनीति: जम्मू-कश्मीर के विकास का नया सवेरा

भारत सरकार की विकासात्मक पहलों के साथ, आज श्रीनगर, सोपोर, बडगाम, भदेरवाह और जम्मू में बीपीओ चल रहे हैं। नागरिकों के लिए डिजिटल सेवाएं देने के लिए राज्य में 3158 कॉमन सर्विस सेंटर कार्य कर रहे हैं।

Author Published on: August 19, 2019 1:46 AM
कश्मीर में शांति का माहौल फोटो सोर्स- @JmuKmrPolice

रवि शंकर प्रसाद

अनुच्छेद 370 से किसे फायदा हुआ- यह सबसे वैध सवाल होना चाहिए, जो हम सभी को भारत की आजादी के 73 वर्ष बाद पूछना चाहिए। जाहिर तौर पर जम्मू-कश्मीर के आम लोगों को कोई लाभ नहीं हुआ। पहाड़ी, शिया समुदाय, गुर्जर, बक्करवाल, गद्दी, अन्य अनुसूचित जनजातियों, अनुसूचित जाति और लद्दाख और करगिल में रहने वाले लोगों को इस अनुच्छेद की मदद से बनाई गई व्यवस्था से कोई ठोस फायदा नहीं मिला।

जम्मू-कश्मीर के आम लोगों के हित के लिए अनुच्छेद 370 को हटाना पड़ा। हमें प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के साहस और गृह मंत्री श्री अमित शाह की दृढ़ता की सराहना करनी चाहिए जिन्होंने कार्यभार संभालने के बाद 70 दिन से भी कम समय में 70 वर्ष पुरानी समस्या को इतिहास बना डालने का निश्चय किया। अनुच्छेद 370 को गलत परिस्थितियों में भारत के संविधान में अस्थायी प्रावधान के रूप में जोड़ दिया गया था। लेकिन 560 से अधिक पूर्व देसी रियासतें अनुच्छेद 370 जैसे अस्थायी प्रबंध के बिना भारत का हिस्सा बन गईं।

इन देसी रियासतों में सांस्कृतिक विविधता के साथ सभी समुदायों के लोग रहते थे। फिर भी असाधारण बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता के अधिनायक भारत के संविधान निर्माताओं ने इन देसी रियासतों के लिए अनुच्छेद 370 जैसे किसी विशेष प्रावधान से सहमति व्यक्त नहीं की। इससे केवल यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जम्मू और कश्मीर को छोड़कर 560 से अधिक देसी रियासतों को सरदार पटेल ने संभाला और आज वे सभी भारत का हिस्सा हैं। जम्मू-कश्मीर को जवाहर लाल नेहरू ने संभाला था, जो सरदार पटेल के लिए बेहद शर्मिंदगी की स्थिति थी, जो उप प्रधानमंत्री के रूप में गृह मंत्रालय और देसी रियासतों को संभालने के साथ इसे भी संभाल सकते थे।

जम्मू-कश्मीर की समस्या को अब 70 वर्ष से ज्यादा बीत चुके हैं। लगभग 42,000 लोगों की जानें जा चुकी हैं। कश्मीरी पंडितों को बंदूक की नोक पर उनके घर छोड़ने के लिए मजबूर किया गया। तथाकथित विशेष व्यवस्था के कारण अलगाववाद को बढ़ावा देने वाली भारत विरोधी ताकतों को बढ़ावा मिला। केंद्र में मौजूद कांग्रेस सरकार द्वारा शेख अब्दुल्ला को 11 वर्ष के लिए कैद कर दिया गया और जेल में रखा गया। 1990 और 1996 के बीच घाटी में एक वर्ष में औसतन 200 दिन कर्फ्यू रहा। पीछे मुड़कर देखें तो नेहरू के भावनात्मक लगाव ने जम्मू-कश्मीर के बारे में अस्पष्ट वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन किया।

जम्मू-कश्मीर के लोगों के प्रति दोषपूर्ण दृष्टिकोण के कारण उन्हें कष्ट झेलने पड़े। नई दिल्ली की मानसिकता यह थी कि यदि जम्मू-कश्मीर के कुछ परिवारों पर नियंत्रण बना रहता है तो पूरे राज्य की समस्याओं को अच्छी तरह संभाला जा सकता है। इन थोड़े से परिवारों ने अपनी शक्ति को बनाए रखने, अपना नियंत्रण मजबूत करने, श्रेणीबद्ध तरीके से भ्रष्टाचार में शामिल होने के लिए अनुच्छेद 370 का उपयोग किया और जब भी इस बाबत उनसे सवाल पूछा गया तो उन्होंने अनुच्छेद 370 के पीछे शरण ले ली। कोई भी कैसे उचित ठहरा सकता है कि सत्ता के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार के मामलों में राजनीतिक और सरकारी अधिकारियों दोनों के खिलाफ अपराध संबंधी जवाबदेही पर जोर देते हुए विस्तृत कानूनी प्रावधानों (भ्रष्टाचार निवारण कानून) को जम्मू-कश्मीर में लागू ही नहीं किया गया।

आखिर शिक्षा का अधिकार कानून, बाल विवाह पर रोक कानून, सूचना का अधिकार कानून और सिर पर मैला ढोने की प्रथा पर रोक लगाने वाले कानूनों को उस राज्य में लागू क्यों नहीं किया गया? राज्य के लोगों को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव से वंचित करने के लिए धारा 370 का दुरुपयोग किया गया। लोगों को अब भी याद है, निष्पक्ष चुनावों में से एक चुनाव काफी लंबे समय बाद उस वक्त हुआ था जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे। सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि जब कई बहादुर कश्मीरी मुसलिम जैसे कि सेना के अधिकारी उमर फयाज, राइफलमैन औरंगजेब और कई अन्य लोगों को आतंकवादियों ने मार डाला, तो अनुच्छेद 370 के खिलाफ आक्रामक तरीके से बोलने वालों ने एक विशेष प्रकार की चुप्पी साधे रखी।

हमें याद रखना होगा कि 1956 में जम्मू-कश्मीर राज्य की संविधान सभा ने राज्य के संविधान को स्वीकार किया था। भाग दो, अनुच्छेद 3 के तहत, विशेष रूप से यह व्यवस्था की गई, ‘जम्मू-कश्मीर राज्य भारत का अभिन्न अंग है और यह अभिन्न अंग रहेगा।’ अनुच्छेद 147, भाग 12 के अंतर्गत, इस संविधान में संशोधन की व्यवस्था की गई, जहां अन्य बातों के साथ-साथ यह स्पष्ट रूप से निर्धारित किया गया था कि धारा 3 (जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग रहेगा) के प्रावधान में कोई भी बदलाव करने के लिए कोई भी विधेयक या संशोधन राज्य विधानमंडल के दोनों में से किसी भी सदन में पेश नहीं किया जाएगा। एक बार जब जम्मू-कश्मीर राज्य की संविधान सभा ने एक संविधान लागू कर दिया है, जिसमें गर्व से जम्मू -कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग घोषित किया जा चुका है, इसे अब बदला नहीं जा सकता, तो कई मायनों में अनुच्छेद 370 ने अपनी प्रासंगिकता खो दी है।

अनुच्छेद 370 को जानबूझकर एक अस्थायी प्रावधान के रूप में रखा गया और प्रधानमंत्री ने ठीक कहा कि जो लोग इसका समर्थन कर रहे हैं उन्होंने इसे स्थायी करने का साहस क्यों नहीं दिखाया। इस बात पर ध्यान देना जरूरी है कि एक बार संविधान सभा ने संविधान लागू कर दिया, उसका उद्देश्य पूरा हो गया और राज्य के संविधान के अनुच्छेद 147 के अनुसार किसी प्रकार का अन्य संशोधन का अधिकार राज्य विधानसभा को दिया गया। इसलिए इस परिप्रेक्ष्य में, राष्ट्रपति की अधिसूचना से घोषित करना पूरी तरह से उचित था कि अनुच्छेद 370 (3) के तहत संविधान सभा को राज्य विधानसभा के रूप में पढ़ा जाए और चूंकि राज्य राष्ट्रपति शासन के अधीन था, इसलिए इसकी शक्ति भारत के संविधान के अनुच्छेद 356 (1) (बी) के तहत संसद द्वारा संवैधानिक रूप से इस्तेमाल की गई ।

संसद में बहस के दौरान जम्मू-कश्मीर के सभी क्षेत्रों के सांसदों की बातें सुनी गईं। इस सच्चाई पर भी जोर दिया जाना चाहिए कि भाजपा को अनुच्छेद 370 को हटाने के अपने वादे पर भारत के लोगों से शानदार जनादेश मिला था। इस तरह के तर्क कि अनुच्छेद 370 की तरह पूर्वोत्तर क्षेत्रों और जनजातीय इलाकों के कल्याण से संबंधित अन्य विशेष प्रावधानों को भी हटाया जा सकता है, पूरी तरह से गलत है। अनुच्छेद 371 (ए) से (जे) विशेष प्रावधान हैं और वे अस्थायी प्रावधान नहीं हैं, वे बने रहेंगे। नए राज्यों के निर्माण के बाद एक विशेष क्षेत्र या विशेष जनजातियों के विकास के लिए विशेष प्रावधानों को शामिल किया गया। ये विशेष प्रावधान स्थायी हैं।

हाल में, मैं जम्मू से अखिल भारतीय सेवा की युवा अधिकारी से मिला और वो एक हिंदू लड़की थी, जिसने बताया कि उसने जम्मू-कश्मीर में अपने सभी अधिकारों को खो दिया क्योंकि उसने अपने गृह राज्य के बाहर एक प्रशासनिक अधिकारी से विवाह कर लिया था। नम आंखों से उसने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के प्रति आभार जताया जिन्होंने अनुच्छेद 370 को हटाकर उसके साथ न्याय किया है।

भारत सरकार की विकासात्मक पहलों के साथ, आज श्रीनगर, सोपोर, बडगाम, भदेरवाह और जम्मू में बीपीओ चल रहे हैं। नागरिकों के लिए डिजिटल सेवाएं देने के लिए राज्य में 3158 कॉमन सर्विस सेंटर कार्य कर रहे हैं। जब भी मैं उनसे मिलता हूं, उनकी आंखों में चमक आ जाती है। निश्चित रूप से यह जम्मू और कश्मीर को जोड़ने और उसके विकास की एक नई सुबह है, जो उन लोगों को आवाज प्रदान करेगी जो वंचित हैं और अधिकारविहीन हैं। जाहिर है, आतंकवाद और अलगाववाद के संरक्षक नाखुश हैं लेकिन यह वो भारत नहीं है जहां उन्हें कोई स्थान मिलेगा।
(लेखक केंद्रीय विधि और न्याय मंत्री हैं)

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