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रजीनीति: बदलाव के मोर्चे पर जूझती बेटियां

मौजूदा समय में बेटियां शिक्षित हो रही हैं और आत्मनिर्भर भी। पर बुनियादी स्तर पर उन्हें आज भी ऐसे कई मोर्चों पर लड़ाई लड़नी पड़ रही है, जो सामाजिक-पारिवारिक ढांचे में बदलाव आए बिना नहीं जीती जा सकती।

Author Published on: October 26, 2019 1:57 AM
सोच बदलने से लेकर सजग और सशक्त व्यक्तित्व गढ़ने तक शिक्षा की महती भूमिका है।

हाल ही में आई गैरसरकारी संगठन ‘क्राई’ यानी ‘चाइल्ड राइट्स ऐंड यू’ की रिपोर्ट ‘एजुकेटिंग द गर्ल चाइल्ड’ के मुताबिक घरेलू जिम्मेदारियां भी बेटियों की शिक्षा में बड़ी बाधा बन रही है। देश के चार हिस्सों से चुने गए चार राज्यों बिहार, आंध्र प्रदेश, गुजरात और हरियाणा से बीस-बीस गांवों के अध्ययन में यह उजागर हुआ कि देश में स्कूल जाने वाली बच्चियों में से छिहत्तर फीसद और स्कूल छोड़ने वाली बच्चियों में से नब्बे फीसद बच्चियां घरेलू कामों में लग जाती हैं। स्कूल छोड़ने वाली हर चार लड़कियों में से एक बच्ची घर के लिए पैसे कमाती है। हर दस में से एक लड़की घर में छोटे बच्चों का खयाल रखती है। नतीजतन, आज भी ऐसी लड़कियों की तादाद काफी है जो मुश्किल से प्राथमिक स्कूल तक ही जा पाती हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक चौदह साल की उम्र से पहले ही दो-तिहाई बच्चियां स्कूल छोड़ देती हैं और आज भी सिर्फ अट्ठावन प्रतिशत बच्चियां उच्च प्राथमिक स्तर तक जा पाती हैं। सवाल यह है कि कम उम्र में ही ऐसी जिम्मेदारियों का बोझ बच्चियों के हिस्से क्यों? आखिर शिक्षित होने और सबल बनने के मोर्चे पर बेटियां कब तक जूझती रहेंगीं? वह भी तब जबकि हमारे देश में स्त्रियों के जीवन से जुड़ी कई समस्याओं की वजह उनका शिक्षित न होना ही रहा है।

शिक्षा, जीवन में बदलाव और बेहतरी का सर्वोत्तम माध्यम है। सोच बदलने से लेकर सजग और सशक्त व्यक्तित्व गढ़ने तक शिक्षा की महती भूमिका है। भारत जैसे देश में तो महिलाओं की शिक्षा के आंकड़ों की अहमियत और बढ़ जाती है, जहां आधी आबादी को शिक्षित होने का बुनियादी हक पाने के लिए भी अनगिनत उलझनों से जूझना पड़ता है। स्कूल जाने और उच्च शिक्षा पाने तक, कितने ही पड़ावों पर भेदभाव भरा व्यवहार बच्चियों के हिस्से आता है। घर-परिवार के कामकाज का दायित्व भी उनकी पढ़ाई में बड़ी रुकावट बनता है। घर की कमजोर आर्थिक स्थिति, सामाजिक असुरक्षा के चलते कम उम्र में शादी या छोटे भाई-बहनों की संभाल-देखभाल। ऐसे कई आम कारण बेटियों की शिक्षा की खास अड़चन बन जाते हैं।

हमारे सामाजिक ढांचे में आज भी ऐसी जिम्मेदारियां और बंधन बिना सोचे-समझे बेटियों के हिस्से में डाल दिए जाते हैं। घर के कमजोर आर्थिक हालात के कारण सबसे पहले बेटियों की ही पढ़ाई छूटती है। ‘क्राई’ के अध्ययन के मुताबिक इक्कीस फीसद बच्चियों को पैसे की कमी की वजह से स्कूल छोड़ना पड़ा। गौरतलब है कि हमारे यहां स्कूल जाने वाली बच्चियों में से 49.4 फीसद उन परिवारों से हैं, जिनकी आय पांच हजार रुपए प्रति माह या उससे कम है। ऐसे घरों में अधिकतर अभिभावक मेहनत-मजदूरी या खेती कर परिवार चलाते हैं। इसीलिए बेटियों को छोटे भाई-बहनों की देखभाल और दूसरे घरेलू कामों में लगा देते हैं।

यह रिपोर्ट बताती है कि गुजरात में स्कूल छोड़ने वाली बच्चियों में से 95.4 प्रतिशत, हरियाणा में 81.7, आंध्र प्रदेश में 72.7 और बिहार में 60 फीसदी अभिभावक बच्चियों को घर के कामों में व्यस्त कर देते हैं। यही नहीं, देश भर में स्कूल छोड़ने वाली लड़कियों में से 55.1 प्रतिशत लड़कियों को छोटे भाई-बहनों का खयाल रखने के लिए स्कूल से दूरी बनानी पड़ती है। आंध्र प्रदेश में 69.7 फीसदी, गुजरात में 67.7 प्रतिशत, हरियाणा में 33.3 प्रतिशत और बिहार में 31.5 प्रतिशत लड़कियां इसी वजह से स्कूल छोड़ देती हैं। बचपन में ही बच्चों को संभालने का दायित्व उन्हें घर की चारदिवारी तक समेट देता है। यह वाकई चिंतनीय है कि घर-परिवार के ऐसे हालात बेटियों को स्कूल से दूर कर देते हैं, जिनकी जिम्मेदारी उनके हिस्से होनी ही नहीं चाहिए।

दुखद है कि पारिवारिक हालात के साथ ही हमारा सामाजिक ढांचा भी बेटियों की शिक्षा में बाधा बनता है। जो परिवार आर्थिक रूप से सक्षम होते हैं, वे भी कहीं न कहीं बेटियों की पढ़ाई से ज्यादा उनके विवाह को लेकर चिंतित रहते हैं। गांवों-कस्बों में आज भी सामाजिक रूप से लड़कियों पर जल्द से जल्द घर बसाने का दबाव होता है। खासकर गरीब परिवारों के अभिभावक उनकी शादी कर एक बड़ी जिम्मेदारी से मुक्त होने के बारे में सोचते हैं। ‘क्राई’ की इस रिपोर्ट में बिहार के आंकड़ों के मुताबिक स्कूल छोड़ने वाली सभी बच्चियों में से बीस फीसद बच्चियों के माता-पिता उनकी शादी जल्दी कराने को इच्छुक हैं। साथ ही

गुजरात में 3.9, आंध्र प्रदेश में 21.2 और हरियाणा में 11.7 प्रतिशत माता-पिता बच्चियों की शादी करना चाहते हैं। कहना गलत नहीं होगा कि इसकी एक बड़ी वजह असुरक्षा के हालात भी हैं। दूरदराज के इलाकों में स्कूल आती-जाती लड़कियों पर अभद्र टिप्पणियां, उनसे छेड़छाड़ और बलात्कार की घटनाएं भी आए दिन होती रहती हैं। ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जिनमें बच्चियों के खिलाफ बर्बर अपराध हुए। इन घटनाओं की बड़ी वजह घर से स्कूल तक पहुंचने के लिए यातायात की उचित और सुरक्षित व्यवस्था का नहीं होना है। देश भर में स्कूल छोड़ने वाली लड़कियों में से 25.2 फीसदी लड़कियां स्कूल दूर होने की वजह से स्कूल छोड़ देती हैं। कोई अनहोनी होने का भय लड़कियों के स्कूल तक पहुंचने की हिम्मत और जरूरत पर भारी पड़ता है। सामाजिक असुरक्षा और भय के चलते कम उम्र में ही उन्हें शादी के बंधन में बांध दिया जाता है।

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे- 4 (2015-16) के मुताबिक आज भी देश में बाल विवाह की औसत दर 11.9 फीसदी है। यह एक कड़वा सच है कि असुरक्षा का भय और सामाजिक दबाव अभिभावकों का भी मनोबल तोड़ता है, जिसके चलते परिवेश में पहले से ही मौजूद दोयम दर्जे की सोच को और बढ़ावा मिलता है । नतीजतन, बेटियों की शिक्षा की राह और कठिन हो जाती है। जबकि पढ़-लिख कर अपने सपने साकार करने का अधिकार मिलना बेटियों के भावी जीवन की बेहतरी के लिए ही नहीं, संपूर्ण व्यक्तित्व विकास के लिए भी जरूरी है। शिक्षित बेटियां अपने अधिकारों को लेकर भी सजग बन पाती हैं। बतौर नागरिक एक चेतनासंपन्न इंसान बनती हैं। इसमें कोई दो राय ही नहीं कि महिलाओं के जीवन का दंश रही कुरीतियों और भेदभाव का स्थायी हल उनका शिक्षित होना ही है। एक सर्वश्रेष्ठ समाज तब बनता है, जब मांएं पढ़ी-लिखी, जागरूक और समझदार होती हैं।

हालांकि बीते कुछ बरसों में महिला साक्षरता के आंकडेÞ भी बदले हैं और उच्च शिक्षा में उनकी भागीदारी का ग्राफ भी बढ़ा है। हर क्षेत्र में शिक्षित और आत्मनिर्भर बेटियों के बढ़ते आंकड़ों ने देश की अर्थव्यवस्था में भी उनकी भूमिका और भागीदारी सुनिश्चित की है। सुखद है कि मौजूदा समय में बेटियां शिक्षित हो रही हैं और आत्मनिर्भर भी। तकरीबन हर क्षेत्र में अपना दखल भी रखती हैं। पर बुनियादी स्तर पर उन्हें आज भी ऐसे कई मोर्चों पर लड़ाई लड़नी पड़ रही है, जो सामाजिक-पारिवारिक ढांचे में बदलाव आए बिना नहीं जीती जा सकती। इस बदलाव में हर परिवार की भूमिका तो अहम है ही, समग्र रूप से समाज की भागीदारी भी जरूरी है। इससे ज्यादा अफसोसनाक बात क्या होगी कि बेटियों की शिक्षा अपने ही घर के हालात से जूझते हुए हाशिये पर चली जाए।

बड़ों की जिम्मेदारियां निभाने के फेर में उन्हें शिक्षित होकर सम्मान और पहचान पाने का हक भी न मिले, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने का सपना पूरा न हो पाए। इसीलिए बच्चियों के सर्वांगीण विकास के लिए जरूरी है कि घर के भीतर उन्हें ऐसे दायित्वों से मुक्त रखा जाए जो उनकी जिम्मेदारी नहीं है। साथ ही समाज में भी समानता और सुरक्षा का माहौल बने, शैक्षणिक संस्थाओं में बुनियादी सुविधाओं का इंतजाम किया जाए, ताकि बच्चियों की शिक्षा में कोई रुकावट न आए। गौरतलब है कि महिलाओं के स्वास्थ्य, शिक्षा और आर्थिक भागीदारी के पैमानों पर भारत आज भी काफी पीछे है। जबकि बेटियों का शिक्षित और आत्मनिर्भर बनना समूचे समाज की दशा और दिशा तय करता है।

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