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राजनीति: त्रिभाषा सूत्र की चुनौतियां

त्रिभाषा सूत्र तभी कारगर सिद्ध हो सकता है जब हिंदी भाषी क्षेत्र अन्य भारतीय भाषाओं को सम्मान देना शुरू करेंगे। इसके लिए उन्हें कम से कम एक या इससे अधिक ऐसी अन्य भारतीय भाषाओं को जानने की जरूरत है जो दूसरे प्रांत में बोली जाती हों। साथ ही, दक्षिण भारत के साथ-साथ उत्तर-पूर्व की भाषाओं की ओर भी ध्यान देने की आवश्यकता है।

Author June 27, 2019 2:09 AM
देश को एकता के सूत्र में बांधने की जद्दोजहद निरंतर होती रही है।

धर्मेंद्र प्रताप सिंह

किसी राष्ट्र या समाज के लिए धर्म, संस्कृति और भाषा बहुत ही अहम और संवेदनशील मुद्दे होते हैं। ये राष्ट्र की अस्मिता का प्रतीक माने जाते हैं। भाषा भावों की अभिव्यक्ति और विचार-विनिमय का माध्यम होती है। यही कारण है कि भाषा धर्म और संस्कृति दोनों के लिए महत्त्वपूर्ण है। इसमें कदापि संदेह नहीं कि स्वभाषा के माध्यम से ही व्यक्तित्व का पूर्ण विकास संभव है। हमारे देश में धर्म, संस्कृति, रीति-रिवाज, खानपान, रहन-सहन, वेशभूषा, भाषा, बोली आदि में भौगोलिक क्षेत्र के आधार पर भिन्नता पाई जाती है। आजादी के बाद से ही राष्ट्र भाषा के मुद्दे पर क्षेत्रीय हितों और तुच्छ स्वार्थों को लेकर तकरार होती रही है और इसका फायदा निरंतर अंग्रेजी को मिलता आ रहा है। इसका परिणाम यह हुआ कि और एक विदेशी भाषा हमारी सिरमौर बन गई। किसी भी स्वाभिमानी राष्ट्र के लिए यह चिंता का विषय होना चाहिए।

भारत में अनेक भाषाएं और बोलियां प्रचलन में होने के कारण देश को एकता के सूत्र में बांधने की जद्दोजहद निरंतर होती रही है। इसीलिए त्रिभाषा सूत्र अपनाने का सुझाव रखा गया। त्रिभाषा सूत्र भाषा शिक्षण की ऐसी नीति है जिसे सभी राज्यों से गंभीर विचार-विमर्श के उपरांत 1968 में संकल्पित किया गया था। इससे पूर्व 1963 में राजभाषा अधिनियम में यह निर्णय लिया गया था कि जब तक सभी राज्य लिखित रूप में अंग्रेजी हटाने के लिए स्वीकृति न दें, तब तक अंग्रेजी व हिंदी में कामकाज होता रहेगा। इस दिशा में 1976 का राजभाषा अधिनियम मील का पत्थर साबित हुआ, जिससे हिंदी की स्थिति थोड़ी बेहतर हुई।

नई शिक्षा नीति में त्रिभाषा सूत्र के पालन की बात करते ही राजनीतिक हलकों में इसकी प्रतिक्रिया विरोध के रूप में मिलने लगी। जबकि इसमें कोई नई बात नहीं कही गई है। इसके पहले भी यह नीति बनी थी जो लागू नहीं हो सकी। इसके अंतर्गत प्रावधान है कि प्रत्येक हिंदी भाषी प्रांत को एक दक्षिण भारतीय भाषा सीखनी होगी। अक्सर आरोप लगता रहा है कि अहिंदी भाषी प्रांत तो काफी कुछ त्रिभाषा सूत्र का पालन करते हैं, लेकिन हिंदी पट्टी के लोग इससे पूर्णतया विमुख हैं। तमिलनाडु पुन: इसका विरोध करते हुए हिंदी को अपने ऊपर थोपने की बात कह रहा है।

भाषा का संबंध मानव के हृदय पक्ष से है। अभी इसका यही समाधान दिखाई दे रहा है कि हिंदी भाषी क्षेत्रों को त्रिभाषा सूत्र अपने क्षेत्र में लागू करने का प्रयास करना चाहिए। यह बात गौर करने लायक है कि यदि हम दूसरी भाषा सीखने के लिए नहीं तैयार हैं तो अन्य हमारी भाषा को क्यों सीखेंगे? यदि हम किसी दूसरी भाषा को सीखते हैं और उसका सम्मान करते हैं तो निश्चय ही आने वाले समय में हमारी भाषा को सम्मान मिलेगा। देश की एकता और अखंडता के लिए संपूर्ण राष्ट्र में एक भाषा का होना बहुत आवश्यक है। लेकिन राज्यों के आपसी कलह की वजह से आज दिन तक यह संभव नहीं हो पाया। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने हिंदी का पक्ष इसलिए लिया, जिससे देश को एक सूत्र में पिरोया जा सके और विदेशी शासन के खिलाफ हम मजबूती से खड़े हो सकें। इसमें हमें सफलता भी मिली और लंबी पराधीनता के बाद हम स्वाधीन हुए।

राजभाषा अधिनियम, 1976 में भाषायी आधार पर भारतीय राज्यों को क, ख और ग क्षेत्रों में बांटा गया है। ‘क’ क्षेत्र के अंतर्गत बिहार, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, अंडमान निकोबार और दिल्ली आता है। ‘ख’ क्षेत्र में गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, चंडीगढ़, दमनदीव और दादर नगर हवेली रखे गए हैं। शेष राज्य- आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम, बंगाल, कर्नाटक, केरल, गोवा, नगालैंड, ओड़िशा, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, तमिलनाडु, तेलंगाना और त्रिपुरा ‘ग’ क्षेत्र के अंतर्गत शामिल किए गए हैं। राजभाषा अधिनियम के आधार पर ‘क’ क्षेत्र में आने वाले प्रांतों में कोई भी पत्र व्यवहार हिंदी में किया जाएगा और यदि किसी कारणवश अंग्रेजी में भेजा जाता है तो उसका हिंदी अनुवाद भी आवश्यक होगा। ‘ख’ क्षेत्र में पत्र व्यवहार सामान्यत: हिंदी में होगा। यदि कोई पत्र अंग्रेजी में भेजा जाएगा तो उसका हिंदी अनुवाद भेजना होगा। ‘ग’ क्षेत्र में पत्र अंग्रेजी में भेजा जाएगा और यदि कोई पत्र हिंदी में भेजा जाता है तो उसका अंग्रेजी अनुवाद भेजना आवश्यक है। संविधान के अनुच्छेद 351 में हिंदी के प्रचार-प्रसार की जिम्मेदारी केंद्र सरकार को दी गई है।

हिंदी पट्टी में त्रिभाषा सूत्र को अपनाना आसान नहीं है। कारण यह है कि हिंदी पट्टी तीसरी भाषा के रूप में किसको अपनाए, जबकि संविधान में बाईस भाषाओं जगह मिली हुई है। इनमें से किसी एक भाषा को चुनना उनके लिए बहुत बड़ी चुनौती है। इसके अतिरिक्त सरकार को तीसरी भाषा सिखाने के लिए शिक्षण संस्थाओं में नए योग्य शिक्षकों की नियुक्ति करनी पड़ेगी, जो निकट भविष्य में संभव नहीं है। दूसरा उपाय यह है कि तकनीक के माध्यम से व्यापक स्तर पर भाषा सिखाने का काम हो। लेकिन हिंदी पट्टी तकनीक के मामले में भी बहुत पीछे है जो हम सभी के समक्ष कड़ी चुनौती है।

त्रिभाषा सूत्र में मातृभाषा को सबसे ऊपर रखना भी समस्या है। हिंदी भाषी क्षेत्र में मातृभाषा की बात आते ही वे उप-बोलियां अपना सिर उठाने लगती हैं जिनके पांव पर हिंदी का अस्तित्व टिकता है। प्रश्न यह भी है कि मातृभाषा के अंतर्गत भोजपुरी, अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी, राजस्थानी, मेवाती, बांगरू आदि में से किसे पढ़ाया जाएगा? इनमें से कई ऐसी बोलियां हैं जिनका पाठ्यक्रम तक उपलब्ध हो पाना मुश्किल है। जो विद्वतजन हिंदी को भाषा न मान कर उप-बोलियों का समुच्चय मानते हुए इसे अनदेखा करते हैं, उन्हें चीन से सीखने की जरूरत है जहां की भाषा मंदारिन में सत्तर उप-भाषाएं शामिल हैं। यदि चीन और जापान अपनी भाषा को लेकर प्रगति के पथ पर अग्रसर हो सकते हैं तो भारत के समक्ष ऐसी समस्या क्यों आ रही है? इस तथ्य पर तब तक विचार किए जाने की आवश्यकता है जब तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकल आता।

हिंदी देश में सर्वाधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है और वैश्विक स्तर पर इसकी पहचान बन चुकी है। लेकिन जहां तक सरकारी नौकरियों का सवाल आता है तो गैर हिंदी भाषी प्रांत अपने को सुरक्षित करने के लिए हिंदी का विरोध करते हुए अंग्रेजी का पक्ष लेते हैं जो देश की एकता और अखंडता के लिए सबसे ज्यादा घातक है। पिछले बहत्तर वर्षों से हम इस बात को नहीं समझ पा रहे हैं। इससे कोई भी असहमत नहीं हो सकता कि बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए।

आज का दौर भूमंडलीकरण का है। पूरी दुनिया में साठ हजार के आस-पास भाषाएं अस्तित्व में हैं और ऐसा माना जा रहा है कि आने वाले समय में नब्बे फीसद भाषाएं लुप्त हो जाएंगी। भाषाओं के संकट के दौर में हिंदी अपने को बचाने में कामयाब रहेगी। यह हिंदी के लिए खुशी की बात हो सकती है। लेकिन प्रत्येक पढ़े-लिखे वर्ग का यह दायित्व बन जाता है कि वह अपनी मातृभाषा को आने वाली पीढ़ी के लिए सहेज कर रखे। ऐसे में यदि क्षेत्रीय और अहिंदी प्रांत की भाषाएं अपने अस्तित्व की चिंता कर रही हैं तो इसमें क्या गलत है? त्रिभाषा सूत्र तभी कारगर सिद्ध हो सकता है जब हिंदी भाषी क्षेत्र अन्य भारतीय भाषाओं को सम्मान देना शुरू करेंगे। इसके लिए उन्हें कम से कम एक या इससे अधिक ऐसी अन्य भारतीय भाषाओं को जानने की जरूरत है जो दूसरे प्रांत में बोली जाती हों। साथ ही, दक्षिण भारत के साथ-साथ उत्तर-पूर्व की भाषाओं की ओर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। दृढ़ इच्छाशक्ति और ईमानदार प्रयास ही इसे सफल बनाया जा सकता है। यदि इसे रोजगार से जोड़ा जाए तो बेहतर परिणाम की उम्मीद कर सकते हैं।

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