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राजनीति: जल प्रबंधन की चुनौती

असमान बारिश और लचर जल प्रबंधन की वजह से भारत में साल दर साल अपनी जरूरत की तुलना में पानी कम पड़ने लगा है। आलम यह है कि इस समय भारत की साठ करोड़ आबादी पानी के मामले में अति-अभाव से लेकर गंभीर अभाव वाली स्थिति में बताई जाती है। हर साल करीब दो लाख लोग साफ पानी तक पहुंच न होने से काल के गाल में समा रहे हैं।

Author Published on: May 9, 2019 1:15 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

सुविज्ञा जैन

जल संकट हर साल गहराता जा रहा है। इस साल गर्मियां आते ही महाराष्ट्र और गुजरात से खबरें आने लगीं कि वहां के बांधों में जमा पानी काफी कम बचा है। यानी बारिश आने में बचे पांच हफ्तों में जल संकट का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है। हालांकि केंद्रीय जल आयोग हर हफ्ते बिना नागा देश के बांधों में बचे पानी का हिसाब बताता है। अब यह अलग बात है कि देश में बने पांच हजार बांध हमारी जरूरत जितना पानी रोक कर नहीं रख पाते। बढ़ती जरूरत के मुताबिक देश में जल भंडारण की क्षमता बढ़ नहीं पाई है। दरअसल, अरब घन मीटर की इकाई में पानी के आंकड़े सुनने में बहुत बड़े लगते हैं। लेकिन जल प्रबंधकों को इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि देश में रोजाना पानी की मांग तेज रफ्तार से बढ़ रही है। अगर बढ़ती जरूरतों का हिसाब लगा कर नहीं रखा गया तो किसी भी वक्त बड़े जल संकट की खबर सुनने के लिए हमें तैयार रहना चाहिए।

हमें यह भी जान लेना चाहिए कि केंद्रीय जल आयोग के हफ्तेवार आंकड़े हैं किस काम के? हर हफ्ते देश के बांधों में बचे पानी की मात्रा से हमें जानकारी क्या मिलती है? जल आयोग की दी नवीनतम जानकारी यह है कि देश के बांधों में मई के पहले हफ्ते में लगभग उतना पानी जमा है जितना पिछले साल था। साथ ही यह भी बताया गया है कि पिछले दस साल में बांधों में जितना पानी औसतन रहता आया है उतना पानी इस साल भी है। लेकिन महाराष्ट्र और गुजरात अपवाद हैं। वहां के जल संकट की गंभीरता इसलिए छुप गई कि इनक्यानवे बांधों में जल भंडारण के आंकड़ों को जोड़ कर और फिर भाग देकर जो आंकड़ा बना वह हालात को सामान्य बताता है। यह भी गौरतलब है कि यह आंकड़ा देश के सिर्फ इनक्यानवे बांधों की निगरानी से ही निकाला जाता है, जिनकी कुल भंडारण क्षमता सिर्फ एक सौ बासठ अरब घनमीटर है। जबकि देश में कुल बांधों की संख्या पांच हजार के लगभग है। हालांकि तब भी सबकी भंडारण क्षमता मिला कर भी दो सौ सत्तावन अरब घनमीटर ही है।

इनक्यानवे प्रमुख बांधों को देश के पांच क्षेत्रों में बांटा जाता है। नई रिपोर्ट के मुताबिक चिंता पश्चिमी क्षेत्र के सत्ताईस बांधों में जल स्तर को लेकर है। इसी क्षेत्र में महाराष्ट्र और गुजरात आते हैं। इस क्षेत्र के बांधों की कुल क्षमता 31.26 अरब घनमीटर है। जबकि दो मई के बुलेटिन के मुताबिक इस समय उपलब्ध जल भंडारण सिर्फ 5.22 अरब घनमीटर है। बचे पानी का आंकड़ा वहां के बांधों की कुल क्षमता का सत्रह फीसद है, जबकि पिछले साल इसी हफ्ते में यह तेईस फीसद था। अगर दस साल का औसत देखें तो इन बांधों में इस समय तक औसतन छब्बीस फीसद पानी बचा रहता था। जल प्रबंधक यह अच्छी तरह समझते हैं कि जहां इन दिनों औसतन छब्बीस फीसद पानी रहता हो, वहां इस साल उन्हीं दिनों अगर यह स्तर सिर्फ सत्रह फीसद हो तो आने वाले हफ्तों में इस क्षेत्र में क्या हालत बन सकती है।

मसला सिर्फ महाराष्ट्र और गुजरात का नहीं माना जाना चाहिए। यह तथ्य कम चिंताजनक नहीं है कि पिछले कई साल से हमारी जल भंडारण क्षमता कमोबेश जस की तस है। पिछले एक दशक से यह क्षमता दो सौ पचास अरब घनमीटर के आसपास ही बनी हुई है, जबकि इस दौरान आबादी चौदह से पंद्रह करोड़ बढ़ गई। गौरतलब है कि प्रतिव्यक्ति प्रतिवर्ष पानी की जरूरत का आंकड़ा दो हजार घनमीटर है। यानी बढ़ती आबादी के हिसाब से कल कारखाने, बिजलीघर चलाने और अनाज उगाने के लिए पानी की जरूरत बढ़ती गई। यानी केंद्रीय जल आयोग के ये आंकड़े अगर यह कहते हों कि देश के बांधों में उपलब्ध पानी सामान्य मात्रा में है तो यह बात कच्ची और अधूरी क्यों नहीं समझी जानी चाहिए।

अब जब यह अंदेशा खड़ा हो गया है कि अल नीनो प्रभाव के कारण इस साल पानी कम गिरने का अंदेशा है तो संकट की नई घंटी बजती दिख रही है। इतना ही नहीं, इस साल पृथ्वी दिवस पर जताई गई जलवायु परिवर्तन की चिंता खतरे की दूसरी घंटी है। इसीलिए बढ़ते वैश्विक तापमान को पानी की उपलब्धता के नजरिए से भी देखने की जरूरत है। शोध अध्ययनों में निकल कर आ रहा है कि आश्चर्यजनक रूप से पृथ्वी लगातार गर्म हो रही है। सन 1880 से लेकर 2003 तक के आंकड़ों से पता चला था कि पृथ्वी औसतन हर दस साल में 0.05 डिग्री सेल्सियस यानी एक डिग्री सेल्सियस के बीसवें हिस्से की रफ्तार से गर्म हुई। लेकिन सिर्फ 1975 से लेकर 2003 तक के अंतराल में पृथ्वी के गरम होने की रफ्तार प्रति दस साल 0.22 डिग्री सेल्सियस हो गई। पहले की तुलना में यह रफ्तार साढ़े चार गुनी बढ़ गई। इस लिहाज से पचास साल में पृथ्वी का औसत तापमान 0.9 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। पर्यावरण विज्ञानियों के मुताबिक यह एक ऐसा बदलाव है जो जीव जगत के लिए खतरे की घंटी तो है ही, उसके साथ-साथ जलचक्र में बदलाव की चेतावनी भी है।

जलवायु संकट से वर्षा चक्र गड़बड़ा रहा है। वर्षा अवधि पर असर पड़ रहा है। अलग-अलग क्षेत्रों में वर्षा की असमानता बढ़ती जा रही है। जब तापमान बढ़ता है तो ज्यादा पानी भाप बन कर उड़ता है। समुद्री इलाके में अचानक दाब परिवर्तन होने से चक्रवात और तूफान पैदा होते हैं। तूफानों से कई इलाकों में अचानक ज्यादा पानी बरस जाता है जिससे बाढ़ और दूसरी तबाहियां झेलनी पड़ती हैं। जहां कम बारिश होती है उन क्षेत्रों को सूखे और पानी की किल्लत से जूझना पड़ता है।

वैसे तो आजकल आपूर्ति के मामले में पूरे विश्व में जल संकट है, लेकिन भारत के लिए यह मुश्किल ज्यादा बड़ी है। असमान बारिश और लचर जल प्रबंधन की वजह से भारत में साल दर साल अपनी जरूरत की तुलना में पानी कम पड़ने लगा है। आलम यह है कि इस समय भारत की साठ करोड़ आबादी पानी के मामले में अति-अभाव से लेकर गंभीर अभाव वाली स्थिति में बताई जाती है। हर साल करीब दो लाख लोग साफ पानी तक पहुंच न होने से काल के गाल में समा रहे हैं।

कोई कह सकता है कि पानी के संकट को इस तरह से देखना या दिखाना अतिरंजित है। बेशक अभी हमें पानी की कमी से एकमुश्त हादसे की उतनी बुरी खबरें मिल नहीं रही हैं। दरअसल, यह हालत उतनी भयावह इसलिए नहीं दिख रही है कि हमने भूजल पर निर्भरता ज्यादा बढ़ा ली है। यह खतरे की तीसरी घंटी है। कई शोध बताते हैं कि इस समय हर साल बड़ी तेज़ी से भूजल का स्तर नीचे गिर रहा है। सनद रहे कि भूजल असीमित नहीं है। नीति आयोग की ‘वाटर कंपोजिट इंडेक्स’ रिपोर्ट के मुताबिक भी भूजल खत्म हो रहा है। दूसरे देशों से अपनी तुलना करें तो दुनियाभर में जमीन से उलीचे जा रहे कुल भूजल का एक चौथाई हिस्सा सिर्फ भारत में निकाला जा रहा है। जबकि पूरी दुनिया को बारिश से जितना पानी मिलता है उसका सिर्फ चार फीसद हमारे हिस्से में आता है। सरकारी सर्वेक्षणों के मुताबिक सन 2020 तक 21 महानगरों में भूजल खत्म हो जाएगा। जल संकट सीधे जनता से जुड़ा मुद्दा है। देश के हाल फिलहाल के राजनीतिक माहौल में जल संचयन की क्षमता बढ़ाने, बांधों की मरम्मत, जलाशयों की गाद निकालने, भूजल संरक्षण जैसे गंभीर मुद्दे कम से कम चुनावी मुद्दों की सूची में तो आ ही जाने चाहिए थे। हम उस दौर में हैं जब जल संकट पर गंभीरता से सोचने का यह आखिरी मौका है।

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