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राजनीति: अंधविश्वास का दंश

भारतीय जनमानस को समझना होगा कि अंधविश्वासों को खत्म करने की जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की नहीं है।

Author Updated: November 14, 2019 2:04 AM
पिछले साल उत्तर प्रदेश राज्य के सीतापुर जिले के कुसेपा दहेली गांव में एक दंपति ने एक तांत्रिक की सलाह पर अपनी ही बच्ची की बलि चढ़ा दी थी।

यह विडंबना है कि जागरूकता और शिक्षा के प्रचार-प्रसार के बावजूद हमारा समाज अंधविश्वास के दुष्प्रभाव से मुक्त नहीं हो पा रहा है। समाज में आज भी अंधविश्वास की जड़ें गहरे तक जमी हैं। कुछ समय पहले बिहार में भागलपुर जिले के पीरपैंथी थाना क्षेत्र में एक व्यक्ति ने तांत्रिक के कहने पर अपनी पत्नी की सूनी कोख भरने के लिए अपने ही ग्यारह वर्षीय भतीजे की बलि चढ़ा दी। गौर करें तो अंधविश्वास के कारण बलि चढ़ाने की यह कोई पहली घटना नहीं है।

पिछले साल उत्तर प्रदेश राज्य के सीतापुर जिले के कुसेपा दहेली गांव में एक दंपति ने एक तांत्रिक की सलाह पर अपनी ही बच्ची की बलि चढ़ा दी थी। सिर्फ इस आस में कि ऐसा करने से उसकी समस्याएं छू-मंतर हो जाएंगी और वह सुखपूर्ण जीवन व्यतीत कर सकेगा। इस तरह की घटनाएं आए दिन सुर्खियां बनती रहती हैं। भारतीय समाज में अंधविश्वास इस कदर व्याप्त है कि दो वर्ष पूर्व महिलाओं की चोटी काटने का एक डरावना किस्सा मथुरा और आगरा में खूब चर्चित रहा था। यह तो अच्छा रहा कि दोनों शहरों में जिला प्रशासन ने इन घटनाओं को गंभीरता से लिया और लोगों को आगाह किया कि वे इस तरह की अफवाहों पर ध्यान न दें।

देश में आए दिन इस तरह की अफवाहें जोर पकड़ती रहती हैं और इनकी आड़ में अपराध को अंजाम दिया जाता है। ये घटनाएं रेखांकित करती हैं कि हम विकास के चाहे कितने भी दावे क्यों न कर लें, लेकिन असल में हमारा समाज अभी अंधविश्वास में डूबा हुआ है। सच तो यह है कि अंधविश्वास मिटाने की जितनी पहल हो रही हैं, उतनी ही ताकत से अंधविश्वास की जड़ें और गहरी होती जा रही हैं। अंधविश्वास की आड़ में न केवल बलि देने की कुप्रथा कायम है, बल्कि डायन के नाम पर महिलाओं की नृशंस हत्या भी जारी है।

पश्चिम बंगाल के मालदा में एक महिला के डायन होने को लेकर अफवाह फैली और हत्यारी भीड़ ने उसकी दोनों आंखें निकाल कर उसे मौत के घाट उतार दिया था। हत्या से पहले उस महिला के साथ सामूहिक बलात्कार भी किया गया था। पिछले साल ही झारखंड की राजधानी रांची के पास मांडर ब्लॉक के कंजिया मरई टोली गांव की पांच महिलाओं की डायन के शक में हत्या कर दी गई थी। झारखंड के देवघर जिले के पाथरघटिया गांव में पांच महिलाओं को डायन के नाम पर निर्वस्त्र कर घुमाया गया और सिमडेगा जिले के शिकरियातंद गांव में एक अधेड़ महिला को डायन के नाम पर उसके पड़ोसियों ने पीट-पीटकर मार डाला।

ऐसी घटनाएं कमोबेश देश के सभी राज्यों से देखने-सुनने को मिलती रहती हैं। लेकिन दुख की बात यह है कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए राज्य सरकारों की ओर से कठोर कदम नहीं उठाए जाते। अंधविश्वास की ऐसी निर्मम घटनाएं उन्हीं राज्यों और क्षेत्रों में देखी जा रही हैं जहां विकास और शिक्षा की लौ पूरी तरह पहुंच नहीं सकी है। अमूमन इन क्षेत्रों में रहने वाले लोग शैक्षिक रूप से तो पिछड़े हैं ही, साथ ही यहां स्वास्थ्य सेवाएं भी नदारद हैं। इसी का परिणाम होता है कि वे अपनी बीमारी और अस्वस्थता के अलावा संतान न होने का मूल कारण समझने के बजाय इसे भूत-प्रेत और डायनों का प्रभाव मानते हैं और फिर डायन की आड़ में महिलाओं की हत्या और नरबलि जैसे कदम उठा लेते हैं।

शैक्षिक रूप से पिछड़े और आदिवासी बहुल राज्य झारखंड की ही बात करें तो यहां अंधविश्वास की जड़ें काफी गहरी हैं और उसका सर्वाधिक खमियाजा महिलाओं को भुगतना पड़ रहा है। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों पर गौर करें तो यहां पिछले बीस वर्षों में तेरह सौ से अधिक महिलाओं की डायन के नाम पर हत्या हुई है। डायन कुप्रथा पर काम कर रही स्वयंसेवी संस्थाओं की मानें तो गांव वाले ही महिलाओं को डायन के रूप में चिह्नित करते हैं और फिर मौत की नींद सुला देते हैं। अपराधी इसलिए पकड़ में नहीं आते कि इन घटनाओं में पूरा गांव शामिल होता है और अपराधी की पहचान नहीं हो पाती।

आधुनिकता और नई से नई तकनीक से लैस होने के बावजूद हमारा समाज कितना पिछड़ा और अंधविश्वास से ग्रस्त है, इन घटनाओं से आसानी से समझा जा सकता है। कुछ साल पहले देहरादून की एक गैर सरकारी संस्था ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि देश में तकरीबन हर साल दो सौ से अधिक महिलाओं की हत्या डायन के नाम पर होती है। ऐसे निर्दयतापूर्ण कृत्य सिर्फ झारखंड राज्य में नहीं, बल्कि विकसित कहे जाने वाले राज्यों में भी होते हैं। उदाहरण के तौर पर, आंध्रप्रदेश में हर साल तीस से ज्यादा महिलाओं को डायन बता कर मार दिया जाता है।

इस मामले में हरियाणा और ओड़ीशा का रिकार्ड भी कम नहीं है। इन दोनों राज्यों में पच्चीस से तीस और चौबीस से अट्ठाईस महिलाओं की हत्या सिर्फ अंधविश्वास और जादू-टोने के नाम पर की जाती है। पिछले डेढ़ दशक में देश में डायन के नाम पर लगभग ढाई हजार से ज्यादा महिलाओं की हत्या हो चुकी है। जहां एक ओर देश में महिलाएं पंचायतों से लेकर संसद और विधानसभाओं में अहम सहभागी बन रही हैं और नित नई बुलंदियों को चूम रही हैं, वहीं डायन के नाम पर महिलाओं की निर्ममतापूर्वक हत्याओं का सिलसिला शर्म से सिर झुका देता है। समाज के ठेकेदार डायन के नाम पर उन्हें निर्वस्त्र घुमाने के साथ-साथ सामूहिक बलात्कार कर रहे हैं।

इस तरह की घटनाएं कानून और प्रशासन के लिए चिंता की बात होनी चाहिए। कई बार ऐसा भी देखा जाता है कि पुलिस की मौजूदगी में ही महिलाओं को डायन बता कर उनके साथ बदसलूकी की जाती है। प्रशासन इन घटनाओं को गंभीरता से तब लेता है जब मीडिया या स्वयंसेवी संस्थाएं इस तरह की घटनाओं का खुलासा करती हैं और उन्हें सामने लाती हैं। हालात तब और बदतर हो जाते हैं जब पिछड़े और आदिवासी क्षेत्रों में लगने वाली पंचायतें बैखौफ होकर अपने फैसले सुनाते हुए किसी भी महिला को डायन करार दे देती हैं और समाज का पढ़ा लिखा तबका उनका विरोध करने के बजाए उन्हें अपना मौन समर्थन देता नजर आता है।

इन घटनाओं के पीछे सामाजिक रूढ़िवादिता तो बड़ा कारण है ही, साथ ही कानून के अनुपालन में कमी भी एक महत्त्वपूर्ण कारण है। ऐसी महिलाओं को भी डायन करार देकर मौत के घाट उतारा जा रहा है जिनके परिजन नहीं हैं और उनके पास संपत्ति है। अगर कहा जाए कि डायन की आड़ में संपत्ति हड़पने और नरबलि के पीछे दुश्मनी साधने का खेल चल रहा है, तो यह गलत नहीं होगा। ऐसी स्थिति में समाज में व्याप्त इन कुरीतियों और अंधविश्वासों के खिलाफ जनजागरण चलाने की जरूरत है। साथ ही इन घटनाओं को अंजाम देने वालों की पहचान कर उन्हें दंडित किया जाना चाहिए।

भारतीय जनमानस को समझना होगा कि अंधविश्वासों को खत्म करने की जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की नहीं है। इन्हें उखाड़ फेंकने के लिए समाज को भी आगे आना होगा। उन क्षेत्रों की पहचान करनी होगी जहां ऐसी घटनाएं ज्यादा हो रही हैं। उन वजहों को भी तलाशना होगा जिनके कारण इन घटनाओं को प्रोत्साहन मिल रहा है। कम पढ़े-लिखे लोग अक्सर गंभीर बीमारियों से निपटने के लिए अस्पतालों में जाने के बजाए ओझा-तांत्रिकों की शरण लेते हैं और ये तांत्रिक उनके अज्ञान का फायदा उठाते हुए आर्थिक शोषण तो करते ही हैं, उन्हें अपराध करने के लिए भी उकसाते हैं। बेहतर होगा कि सरकार और स्वयंसेवी संस्थाएं पिछड़े और सुविधाहीन क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करें।

अरविंद कुमार सिंह

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