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राजनीति: अरावली का संकट

अरावली पहाड़ियों को नष्ट करने के दुष्परिणाम हमारे सामने हैं। जिन क्षेत्रों से अरावली शृंखलाओं का विनाश हुआ उन क्षेत्रों में प्राकृतिक असंतुलन, पर्यावरण प्रदूषण, ऋतु-चक्र में बदलाव, जैविक विविधता की समाप्ति, इंसान में प्रकृति से मैत्री भाव का ह्रास, पाताल में रासायनिक विषैले तत्त्वों की वृद्धि, तेजी से गिरता भूजल स्तर, दुर्लभ वनस्पतियों का विनाश और मानवीय संवेदना में लगातार ह्रास जैसी गंभीर समस्याएं देखने को मिल रही हैं।

Author March 15, 2019 3:40 AM
अरावली की पहाड़ियां (फोटो सोर्स : indian express)

अखिलेश आर्येंदु

आठ मार्च को उच्चतम न्यायालय ने हरियाणा सरकार को अरावली वन क्षेत्र में किसी भी तरह की गतिविधियों के प्रति सचेत करते हुए चेतावनी दी कि अगर उसने निर्माण की अनुमति देने के लिए कानून में संशोधन कर अरावली की पहाड़ियों या वन क्षेत्र को कोई भी नुकसान पहुंचाया तो वह मुसीबत में होगी। गौरतलब है हरियाणा सरकार ने 27 फरवरी को कानून में संशोधन कर हजारों एकड़ भूमि क्षेत्र गैर वानिकी और रियल इस्टेट की गतिविधियों के लिए खोल दिया था। इसे लेकर पर्यावरण संरक्षकों में हलचल मच गई थी। अरावली पहाड़ियों के उजाड़ को रोकने के लिए पहला आदेश 7 मई 1992 को जारी किया गया था। राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली क्षेत्र में फैली अरावली की पहाड़ियों को खनन गतिविधियों से जो नुकसान पहुंचाया गया उससे कई तरह की समस्याएं पैदा हुई हैं। इससे कई दुर्लभ औषधियों-वनस्पतियों, जंगली जीव-जंतु और पक्षियों का तो अस्तित्व ही समाप्त हो गया।

अरावली के अस्तित्व को लेकर कुछ वर्षों से मीडिया, कोर्ट और पर्यावरण संरक्षकों में बहस छिड़ी हुई है। सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका था कि राजस्थान सरकार का कर्तव्य बनता है कि वह कई दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण अरावली की पहाड़ियों की सुरक्षा सुनिश्चित करे और अवैध खनन पर तुरंत रोक लगाए। राजस्थान के उन्नीस जिलों में अरावली की पर्वत शृंखलाएं हैं जिनसे संपूर्ण क्षेत्र की जैविक विविधता बरकरार रही है। सुप्रीम कोर्ट ने वैध-अवैध दोनों तरीकों से खनन पर रोक लगाने के आदेश दिए थे। न्यायालय का कहना था कि रसूखदार खनन माफिया ने अरावली को ऐसा नुकसान पहुंचाया है जिसकी भरपाई कभी नहीं की जा सकती है। मौजूदा पीढ़ी के साथ ही आने वाली पीढ़ी को भी इस आत्मघाती कार्य का खमियाजा भुगतना पड़ेगा।

 

अड़तीस अरावली पहाड़ियों का अस्तित्व ही अवैध खनन के चलते समाप्त हो गया है। राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली क्षेत्र में फैली इन पहाड़ियों पर पिछले चार दशकों से अवैध खनन जारी है। अरावली पहाड़ियों का अस्सी फीसद हिस्सा राजस्थान में आता है। इसी तरह हरियाणा के गुड़गांव, फरीदाबाद, महेंद्रगढ़, मेवात और रेवाड़ी इलाके में ये फैली हुई हैं। दिल्ली व एनसीआर क्षेत्र के कई किलोमीटर में ये फैली हुई हैं जहां सालों से बजरी और पत्थर खोदने का अवैध कारोबार चल रहा है। वन विभाग की मंजूरी के चलते भी इन क्षेत्रों में वैध-अवैध खनन, निर्माण और पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने जैसे कार्यों से पहाड़ियों को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया गया। गौरतलब है कि अरावली में पत्थर खनन के लिए कुछ विशेष तरह के मापदंड तय किए गए थे, जिनमें जहां से जितना पत्थर निकाला जाए वहां मिट्टी से इसकी भरपूर भरपाई की जाने की शर्त थी। लेकिन चिंता की बात यह है कि पहाड़ियों को खोदा तो गया, लेकिन वहां जो गहरे गड्ढे हुए उनमें आवश्यकता के अनुसार मिट्टी नहीं डाली गई।

वृक्ष धरती के आभूषण हैं तो पहाड़ धरती के रक्षक। ये मानव को आंधी-तूफान और अन्य मौसमी व भौगोलिक संकटों से बचाने का कार्य भी करते हैं। लेकिन इंसान ने धन-संपत्ति के लोभ में पड़ कर इस महत्त्वपूर्ण विषय पर ध्यान ही नहीं दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि दुनियाभर में बर्फीले आंधी-तूफान, भूकम्प, सुनामी, वैश्विक तापमान, नई-नई बीमारियां, ऋतुचक्र में असंतुलन, रेगिस्तानी क्षेत्र का लगातार विस्तार जैसी नई-नई समस्याएं पैदा हो गर्इं। सबसे ज्यादा समस्याएं एशिया के देशों में पिछले चार दशकों में देखने में आई हैं। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूनेप) की रपट के मुताबिक दुनिया के सौ देशों में उपजाऊ या हरियाली वाली जमीन रेत के ढेर में बदलती जा रही है। यह खतरा बहुत बड़ा है जिसका असर दुनिया की एक अरब आबादी पर प्रत्यक्ष दिखाई पड़ने लगा है। यह खतरा पहले से रेगिस्तान वाले क्षेत्रों से इतर है। इस वक्त सबसे अधिक रेगिस्तान एशियाई देशों में हैं। दूसरी ओर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का शोध कहता है कि थार का रेगिस्तान अब राजस्थान से निकल कर कई राज्यों में विस्तारित हो गया है। जो धूल पाकिस्तान व उससे लगे क्षेत्रों से उड़ती है उससे सुरक्षा का काम अरावली की पहाड़ियां ही करती आई हैं। पिछले चार दशकों में दिल्ली और एनसीआर में धूल भरी आंधी, तूफान और बेमौसम बरसात का जो सिलसिला शुरू हुआ है उसका सबसे बड़ा कारण अरावली की पहाड़ियों का खत्म होना है।

भारत के उन सभी क्षेत्रों में समस्याएं और संकट लगातार बढ़ रहे हैं जहां विकास के नाम पर जल, जंगल और जमीन को आनन-फानन में समाप्त किया गया या किया जा रहा है। बंजर, रेगिस्तान, सूखे और दलदली क्षेत्रों का बढ़ना, नदियों के किनारे से लगातार अवैध खनन का बढ़ते जाना, पहाड़ों को काट कर नए निर्माण करते जाना जैसे अनेक कार्य हैं जिनसे जैविक विविधता को खतरा उत्पन्न हो गया है। जैविक विविधता को बनाए रखने के लिए कुछ भी नहीं किया जा रहा है, लेकिन इसको तहस-नहस करने के लिए रात-दिन विध्वंसकारी कार्य किए जा रहे हैं। अरावली पहाड़ियों को नष्ट करने के जो दुष्परिणाम सामने आए हैं वे हमारे सामने हैं। जिन क्षेत्रों से अरावली शृंखलाओं का विनाश हुआ उन क्षेत्रों में प्राकृतिक असंतुलन, पर्यावरण प्रदूषण, ऋतु-चक्र में बदलाव, जैविक विविधता की समाप्ति, इंसान में प्रकृति से मैत्री भाव का ह्रास, पाताल में रासायनिक विषैले तत्त्वों की वृद्धि, तेजी से गिरता भूजल स्तर, दुर्लभ वनस्पतियों का विनाश और मानवीय संवेदना में लगातार ह्रास जैसी गंभीर समस्याएं देखने को मिल रही हैं।

भारतीय समाज में प्रकृति की पूजा और सुरक्षा के प्रति असंवेदनशीलता, प्रकृति से छेड़छाड़ और प्रकृति से असहजता का व्यवहार पिछले चार-पांच दशकों में अधिक देखने को मिला है। जंगल, जमीन, जल, पहाड़, समुद्र, नदी, झीलें, बावड़ियां, पोखर, तालाब, ताल, तलैया, नहर और कुंओं के प्रति एक मैत्रीपूर्ण व्यवहार ही नहीं रहा है। वनस्पतियों, औषधियों, विशेष तरह के वृक्षों, कुंओं और नदियों की सुरक्षा के प्रति हर संवेदना खत्म हो गई है। इसका ही परिणाम है कि अरावली सहित अन्य पहाड़ियों को धन के लोभ के कारण काट-काट कर हमेशा के लिए खत्म कर दिया गया। यह प्रवृत्ति हमारी उस संवेदनशीलता के ठीक उलट है जिसमें प्रकृति के प्रति मैत्री, बंधुत्व, पारिवारिक रिश्ता, सुरक्षा और सहजता के भाव को सबसे उत्कृष्ट समझा जाता था।

पहाड़ जिस मानव सभ्यता के आधार और मित्र रहे हैं, उनके साथ दुश्मन से भी बदतर व्यवहार निश्चित ही भारतीय समाज की दुर्दशा का द्योतक है। हमें अरावली की पहाड़ियों के प्रति ही नहीं, बल्कि नदियों, झीलों, समुद्रों, जंगलों और तालाबों के प्रति संवेदनशीलता को बढ़ाने की जरूरत है। वरना जिस तरह से प्राकृतिक संसाधनों के विनाश के कारण मानव सभ्यता के अस्तित्व पर खतरा मंडराता दिखाई पड़ रहा है, कुछ इसी तरह का खतरा पहाड़ों के उजड़ते जाने के कारण पैदा हो चुका है। हम उस खतरे से कितने वाकिफ हैं, हम प्राकृतिक विवधता के प्रति कितने संवेदनशील और जागृत हैं, इस पर सच्चे मन से समीक्षा करने की जरूरत है।

अरावली का करोड़ों वर्षों का इतिहास केवल चार दशकों के विनाशकारी कार्यों से बदल गया है। यह हमारी संस्कृति का विध्वंसकारी रूप है। हम पर्वत-समुद्र-नदी आदि को अपने पूज्यों में शामिल करते रहे हैं और हम उनकी उसी तरह से सुरक्षा, पूजा और उनके प्रति अपने स्वधर्म का पालन करते रहे हैं जैसे अपने माता-पिता और बड़ों के प्रति करते थे। हमारा चिंतन कभी विनाश का नहीं बल्कि विकास, प्रगति, उत्थान और मर्यादा पालन का रहा है। लेकिन आजादी के बाद हम केवल परिवार व समाज में ही अमर्यादित नहीं हुए, बल्कि प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के प्रति भी अमर्यादित हुए हैं। इसी का नतीजा आज अरावली भुगत रही है।

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