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राजनीति: सिमटती खेती, उजड़ता किसान

दिल्ली से सटे जिलों- गाजियाबाद, बागपत, गौतम बु़द्ध नगर जिले से बीते तीन दशकों से खेत उजड़ने का जो सिलसिला शुरू हुआ, उससे भले ही कुछ लोगों के पास पैसा आ गया हो, लेकिन वह अपने साथ कई ऐसी बुराइयां व अपराध लाया कि गांवों की संस्कृति, संस्कार और सभ्यता सभी कुछ नष्ट होते चले गए। जिनके खेत थे, उन्हें तो कार, मकान और मौज-मस्ती के लिए पैसे मिल गए, लेकिन उनके खेतों में काम करने वाले बेरोजगार हो गए।

Author June 3, 2019 1:25 AM
भारत में 60 फीसदी से अधिक बच्चे खेती या इससे अन्य गतिविधियों में काम करते हैं।

पंकज चतुर्वेदी

जलवायु परिवर्तन के चलते मौसम का गड़बड़ाता मिजाज खेती के लिए बड़ा संकट बन गया है। इससे केवल देश को अन्न उपलब्ध कराने की क्षमता ही नहीं, कृषि पर लोगों की निर्भरता भी घटी है। इस कारण खेती के काम में लगे लोग रोजगार की तलाश में पलायन कर रहे हैं। कहीं विकास के नाम पर तो कहीं शहरीकरण की चपेट में खेत सिमट रहे हैं। खेती में फायदा न देख कर उससे विमुख हो रहे लोगों की संख्या साल-दर-साल तेजी से बढ़ रही है। राज्यों के हिसाब से देखें तो सबसे बुरा हाल उत्तर प्रदेश का है। यह दुखद है कि राज्य का किसान दिल्ली या ऐसे ही अन्य महानगरों में दूसरों की चाकरी करे, गांव की खुली हवा-पानी छोड़ कर महानगर की झुग्गियों में बसे और यह मानने को मजबूर हो जाए कि उसका श्रम किसी पूंजीपति के पास गिरवी रख दिया गया है।
हालांकि पूरे देश में ही खेतों के बंटवारे, खेती की बढ़ती लागत, फसल के वाजिब दाम के सुनिश्चित न होने, सिंचाई की माकूल व्यवस्था के अभाव जैसी समस्याओं के कारण खेती पिछड़ रही है।

परिवारों के बंटवारे से जैसे ही जोत छोटी होती है तो खेती में मशीन व तकनीक के उपयोग की लागत बढ़ जाती है। इसी के चलते किसान खेती से बाहर निकल कर वैकल्पिक रोजगार की तलाश में खेत बेच कर बड़े शहरों की राह पकड़ता है। देश में किसानों की कुल संख्या लगभग पंद्रह करोड़ है। पांच साल पहले यह संख्या करीब चौदह करोड़ थी। लेकिन इसमें लघु और सीमांत किसानों की संख्या छियासी फीसद है। वहीं उत्तर प्रदेश में लघु और सीमांत किसान तिरानवे फीसद हैं जिन्हें खेती के बदौलत दो जून की रोटी मिलना मुश्किल हो रहा है। बुंदेलखंड जैसे इलाकों में हर तीन-चार साल में अल्प वर्षा तो खेती की दुश्मन है ही, आवारा पशु एक नई समस्या के रूप में उभरे हैं। एक तो छोटा-सा खेत, वह भी प्रकृति की कृपा पर आश्रित और उसमें भी गायों का रेवड़ घुस गया तो किसान बर्बादी अपनी ही आंखें के सामने देखता रह जाता है। यदि मवेशी को भगाएं और वह दूसरे के खेत में चले गए तो उससे फौजदारी तय है। ऐसे में बुंदेलखंड से दिल्ली आने वाली ट्रेन व बसें हर समय गारा-गुम्मा का मजूरी करने वालों से अटी रहती हैं।

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में करीब ढाई करोड़ हेक्टेयर भूमि है जिसमें से शुद्ध बुआई वाला (यानी जहां खेती होती है) रकबा एककरोड़ अड़सठ लाख बारह हजार हेक्टेयर है जो कुल जमीन का करीब सत्तर फीसद बैठता है। जाहिर है, राज्य के निवासियों की रोजी-रोटी का सबसे बड़ा जरिया खेती ही है। राज्य में कोई ढाई फीसद जमीन उसर या खेती के अयोग्य भी है। प्रदेश के तिरपन प्रतिशत लोग किसान हैं और कोई बीस फीसद खेतिहर मजदूर। यानी लगभग तीन-चौथाई आबादी इसी जमीन से अपना अन्न जुटाती है। एक बात और गौर करने लायक है कि 1970-1990 के दो दशकों के दौरान राज्य में कुल बोया गया क्षेत्रफल एक सौ तिहत्तर लाख हेक्टेयर स्थिर रहने के बाद अब लगातार कम हो रहा है। ऐसोचेम का कहना है कि हाल के वर्षों में कृषि के मामले में उत्तर प्रदेश की सालाना विकास दर (सीएजीआर) महज 2.9 फीसद है, जो राष्ट्रीय फीसद 3.7 से बेहद कम व निराशाजनक है। विकास के नाम पर सोना उगलने वाली जमीन की दुर्दशा इस आंकड़े से आंसू बहाती दिखती है कि उत्तर प्रदेश में सालाना अड़तालीस हजार हेक्टेयर खेती की जमीन कंक्रीट द्वारा निगली जा रही है। सन 2013 की कृषि नीति में राज्य शासन ने खेती की विकास दर 5.3 फीसद तक ले जाने का लक्ष्य तय किया था। इसके लिए अनुबंध खेती, बीटी बीज जैसे प्रयोग भी शुरू किए गए, लेकिन जमीन पर कुछ दिखा नहीं, क्योंकि यह सब तभी संभव है जब खेती लायक जमीन को सड़क, शहर जैसे निर्माण कार्यों से बचाया जा सके।

उत्तर प्रदेश की सालाना राज्य आय का 31.8 फीसद खेती से आता है। हालांकि यह प्रतिशत सन 1971 में सत्तावन, सन 1981 में पचास और 1991 में इकतालीस था। इससे साफ है कि लोगों से खेती दूर हो रही है। खेती ज्यादा फायदे का पेशा नहीं रहा या फिर दीगर कारणों से लोगों का इससे मोहभ्ांग हो रहा है। दिल्ली से सटे जिलों- गाजियाबाद, बागपत, गौतम बु़द्ध नगर जिले से बीते तीन दशकों से खेत उजड़ने का जो सिलसिला शुरू हुआ, उससे भले ही कुछ लोगों के पास पैसा आ गया हो, लेकिन वह अपने साथ कई ऐसी बुराइयां और अपराध लाया कि गांवों की संस्कृति, संस्कार और सभ्यता सभी कुछ नष्ट होते चले गए। जिनके खेत थे, उन्हें तो कार, मकान और मौज-मस्ती के लिए पैसे मिल गए, लेकिन उनके खेतों में काम करने वाले बेरोजगार हो चले गए। उनके लिए करीबी महानगर दिल्ली में आ कर रिक्शा चलाने या छोटी-मोटी नौकरी करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। जो गांव में आधा पेट रह कर भी खुश थे, वे आज दिल्ली में न तो खुद खुश हैं और न ही दूसरों की खुशी के लिए कुछ कर पा रहे हैं।

राज्य में बड़े या मझौले उद्योगों को स्थापित करने में कई समस्याएं हैं। बिजली व पानी की कमी, कानून-व्यवस्था की जर्जर स्थिति, राजनीतिक इच्छा-शक्ति का अभाव। ऐसे में खेती पर जीवकोपार्जन व रोजगार का जोर बढ़ जाता है। इस कटु सत्य से बेखबर सरकार पक्के निर्माण, सड़कों में अपना भविष्य तलाश रही है। यदि हाल ऐसा ही रहा तो आने वाले पांच सालों में राज्य की कोई तीन लाख हेक्टेयर जमीन से खेतों का नामोनिशान मिट जाएगा। किसान को भले ही देर से सही, यह समझ में आ रहा है कि शहर व आधुनिक सुख-सुविधाओं की बातें मृग-मरिचिका हैं और एक बार जमीन हाथ से जाने के बाद मिट्टी भी मुट्ठी में नहीं रह जाती है।

प्रदेश के चहुंमुखी विकास के लिए कारखाने, बिजली परियोजनाएं और सड़कें सभी कुछ जरूरी हैं। लेकिन यह भी तो देखा जाए कि अन्नपूर्णा धरती को उजाड़ कर इन्हें पाना कहां तक व्यावहारिक व फायदेमंद है। सनद रहे, राज्य की कोई ग्यारह फीसद भूमि या तो ऊसर है या फिर खेती में काम नहीं आती है। यह बात जरूर है कि ऐसे इलाकों में मूलभूत सुविधाएं जुटाने में जेब कुछ ज्यादा ढीली करनी होगी। काश ऐसे इलाकों में नई परियोजना, कारखानों आदि को लगाने के बारे में सोचा जाए। इससे एक तो नए इलाके विकसित होंगे, दूसरा खेत बचे रहेंगे, तीसरा विकास ‘बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय’ वाला होगा। वैसे सरकार विश्व बैंक से बंजर जमीन के सुधार के नाम पर 1332 करोड़ का कर्ज भी ले चुकी है। ऐसे में यह विडंबना ही है कि एक तरफ से तो अरबों का कर्ज लेकर सवा लाख हेक्टेयर जमीन को खेती के लायक बनाने के कागजी घोड़े दौड़ रही है, दूसरी ओर निर्माण गतिविधियों को बढ़ावा देकर अच्छे-खासे खेतों को ऊसर बनाया जा रहा है। किसानों के लिए नकली बीज व खाद की भी समस्या भी काफी गंभीर है। सिंचाई के लिए बिजली का टोटा है। कृषि मंडियां दलालों का अड्डा बनी हैं और गन्ना, आलू जैसी फसलों के वाजिब दाम मिलना या सही समय पर कीमत मिलना लगभग असंभव जैसा हो गया है। जाहिर है कि ऐसी घिसी-पिटी व्यवस्था में नई पीढ़ी खेती नहीं छोड़ेगी तो करेगी क्या।

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