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राजनीति: चिकित्सा का बीमार तंत्र

कहने के लिए गरीब का बीमा है,पर इलाज के लिए अस्पताल नहीं हैं। और यह स्थिति कोई एक-दो साल में नहीं बनी है। स्वास्थ्य क्षेत्र शुरू से उपेक्षित है। इसलिए न सिर्फ अस्पताल, बल्कि डॉक्टर और डॉक्टरी की पढ़ाई भी अपर्याप्त है। महंगी है सो अलग। इसलिए शोर चाहे जितना मचे, हाल-फिलहाल होने वाला कुछ नहीं है।

बिहार में चमकी बुखार से मरने वाले बच्चों की संख्या 100 को पार कर चुकी है। (फोटोः पीटीआई)

संजय कुमार सिंह

बिहार में इस बार एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) जिसे स्थानीय बोलचाल में चमकी बुखार भी कहते हैं, से बड़ी संख्या में बच्चों की मौत और उस पर शोर-शराबा एक मुद्दा है और मौत के कारण तथा उन्हें दूर करने की कोशिशें या उससे निपटने के सरकारी प्रयास बिल्कुल अलग मसले हैं। दो साल पहले उत्तर प्रदेश में गोरखपुर के बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज अस्पताल में बच्चों की मौत का मामला भले ही गैस सप्लाई बंद होने के कारण सुर्खियों में आया था, पर सच्चाई यही है कि ये मौतें गर्मी और लू के कारण लगभग ऐसी ही स्थितियों और लक्षणों के साथ हुई थीं। बिहार और उत्तर प्रदेश के इन इलाकों में गर्मी के दौरान मूल रूप से लू लगने से मौत के मामले आम हैं। उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री ने पहले के वर्षों में हुई मौतों का हवाला देते हुए कह दिया था कि बीआरडी मेडिकल कॉलेज में अगस्त महीने में रोजाना औसतन अठारह से बाईस बच्चों की मौत पिछले सालों में भी हो चुकी है।

हकीकत तो यह है कि मौतें गर्मी के मौसम में लू और ज्यादा तापमान के कारण ही होती हैं। ऐसे में मौजूदा संसाधनों के भीतर अगर मरीजों की संख्या कम होती है तो बच्चे बच जाते हैं और मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ने लगती है तो बचाना मुश्किल हो जाता है। कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसे में और बिहार-उत्तर प्रदेश के अस्पतालों में छपरा, मुजफ्फरपुर, गोरखपुर आदि जिलों के अलावा नेपाल के भी मरीज आते हैं। बीमारी से हालत खराब होने से पहले और सही चिकित्सा मिलने से कुछ बच्चे बच जाते हैं। कुछ इतने भाग्यशाली नहीं होते हैं कि बच सकें। इसका कारण न तो सिर्फ लीची खाना है, न ही आॅक्सीजन की सप्लाई बंद होना। इतनी सारी मौतें किसी एक कारण से हो रही होतीं तो उन्हें दूर कर दिया गया होता। पर अभी वह भी स्पष्ट नहीं है।

असल में मरने वाले बच्चे बहुत ही गरीब परिवारों के होते हैं। उनकी आवाज न सत्ता सुनती है, न मीडिया। वैसे भी, बीमारी अगर बता कर आती होती तो शायद स्थिति दूसरी होती। जो रोज खाने-पहनने जैसी जरूरतें पूरी करने में लगा है, वह बिना बीमार हुए बीमार होने की क्यों सोचे? और जब बीमार हो जाता है तो न कोई उसकी सुनने वाला होता है और न वह खुद कुछ कर सकता है। सरकारी अस्पताल और मुफ्त में मिलने वाली सुविधा के भरोसे रहने वाले लोग अपने ऐसे अधिकार के लिए भी कहां लड़ पाते हैं!

बड़ी संख्या में मौत का कारण कुपोषित बच्चों का प्रतिरक्षण कम होना है। गर्मी में लू लगने या खाली पेट लीची खा लेने से मुमकिन है, समस्या गंभीर हो जाती हो। इससे बचने के उपाय सरकार को करने हैं। लोगों को यह बताया जाना चाहिए कि बच्चे को गर्मी से बचाएं, खाली पेट न रहने दें और अगर लू लग जाए तो कौन-सी दवाई तुरंत शुरू करें, इलेक्ट्रॉल का घोल पिलाएं और जल्दी से जल्दी डॉक्टर के पास जाएं। लेकिन सरकार इतना भर भी नहीं करती। गरीब, लगभग अनपढ़ लोग अगर बच्चों को धूप में नहीं निकलने दें और पीने के पानी का पर्याप्त बंदोबस्त हो तो बहुत-से लोग लू का शिकार होने से बच सकते हैं। पर अस्पताल में ज्यादातर लोगों ने कहा कि उन्हें यह जानकारी नहीं दी गई। जानकारी नहीं दिए जाने और जरूरतमंदों तक नहीं पहुंचने के अपने कारण हैं। पर इतना तो स्पष्ट है कि इस बुनियादी और बहुत कम खर्चीले उपाय से जो बचाव हो सकता था, वह भी नहीं किया गया।

मुख्य रूप से इसका कारण सरकारी या राजनीतिक स्तर पर स्वास्थ्य को दी जाने वाली प्राथमिकता है। प्राथमिकता नहीं दी जाती है, यह तो साफ है और इस कारण बजट नहीं है और जब पैसे ही नहीं हैं तो कोई काम हो भी कैसे। इस तरह सब कुछ पैसे पर आकर रुक जाता है। अगर मीडिया में शोर न हो तो सरकार पर कोई राजनीतिक प्रभाव नहीं पड़ना है, इसलिए सरकार वोट बटोरू काम में लगी रहती है और खर्च भी ऐसे ही काम में किए जाते हैं। वरना कोई कारण नहीं है कि 2014 में जो घोषणाएं हुई थीं, वे 2019 तक पूरी न हों और फिर उन्हें ही दोहरा देना सरकारी काम की इतिश्री है। बिना बजट के सरकार के लिए काम करना मुश्किल और खबरें रोकना अपेक्षाकृत आसान है। और इसीलिए यह बीमारी वर्षों से चली आ रही है।

बिहार में प्रति व्यक्ति बजट, डॉक्टर, अस्पताल के बेड और आइसीयू (सघन चिकित्सा इकाई) की संख्या भी चौंकाने वाली है। इसका असर यह है कि डॉक्टर और दूसरे कर्मचारी तो छोड़िए, दवाई की दुकानें तक पर्याप्त नहीं हैं। जो हैं उनके खुलने-बंद होने का समय निर्धारित है। इस कारण आपातस्थिति में बहुत साधारण-सी दवा भी उपलब्ध नहीं होती है और गरीब आदमी दुकान खुलने और दवा मिलने का इंतजार करता है, लेकिन तब तक मरीज की हालत ज्यादा बिगड़ चुकी होती है। भारत में 11082 मरीजों के लिए औसतन सिर्फ एक डॉक्टर उपलब्ध है, 1844 मरीजों पर औसतन एक बेड और 55591 की आबादी पर एक सरकारी अस्पताल है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के अनुसार एक हजार की आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिए। यानी एक डॉक्टर पर दस गुने से भी ज्यादा बोझ। भारत का औसत इतना खराब है और बिहार तथा उत्तर प्रदेश की हालत इससे भी ज्यादा खराब है।

‘द लैंसेट’ की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और गुणवत्ता के मामले में एक सौ पनच्यानबे देशों की सूची में भारत एक सौ पैंतालीसवें स्थान पर है। वर्ष 1990 में हम एक सौ तिरपनवें पायदान पर थे। ताजा सूची 2016 के अध्ययन पर आधारित है। एक तरफ तो यह वास्तविक स्थिति है और दूसरी तरफ सरकार को वोट भी लेना होता है। इसलिए उसने कुछ करने के मुकाबले लोगों का बीमा करा देने का आसान रास्ता चुना और ‘आयुष्मान भारत’ नाम की स्वास्थ्य योजना लागू कर दी। कहने के लिए गरीब का बीमा है, पर इलाज के लिए अस्पताल नहीं है। और यह स्थिति कोई एक-दो साल में नहीं बनी है। स्वास्थ्य क्षेत्र शुरू से उपेक्षित है। इसलिए न सिर्फ अस्पताल, बल्कि डॉक्टर और डॉक्टरी की पढ़ाई भी अपर्याप्त है। महंगी है सो अलग। इसलिए शोर चाहे जितना मचे, हाल फिलहाल होने वाला कुछ नहीं है। एक तरफ अगर राज्य सरकार ने मुजफ्फरपुर में नया अस्पताल बनाने, बिस्तरों की संख्या बढ़ाने और तीमारदारों के लिए धर्मशाला भी बनवाने की घोषणा की है तो तथ्य यह है कि स्वास्थ्य पर बजट पिछले साल के मुकाबले एक हजार करोड़ रुपए कम हो गया है। ऐसे में योजना कैसे पूरी होगी और पहले भी पूरी नहीं हुई है, ये दोनों ही तथ्य चिंताजनक हैं और आश्वासनों की हकीकत बताते हैं।

ऐसा नहीं है कि मौतें कभी-कभी ही होती हैं। सच तो यह है कि स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार 2002 से 2018 के बीच करीब सात हजार बच्चों में एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम पाया गया और इसकी वजह से दो हजार बच्चों की मौत हो चुकी है। मुजफ्फरपुर में दिमागी बुखार का सबसे पहला मामला साल 1995 में सामने आया था और तब से लेकर आज तक इस पर काबू नहीं पाया जा सका है। इंसेफेलाइटिस की समस्या सिर्फ बिहार में नहीं है। उत्तर प्रदेश और बंगाल भी इससे प्रभावित हैं। इसकी बड़ी वजह कुपोषण है। ऐसे में इस समस्या को अकेले राज्य सरकारों पर नहीं छोड़ा जा सकता। इससे निपटने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर काम करने की जरूरत है।

 

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