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राजनीति: नया गठजोड़ और चुनौतियां

सऊदी अरब को कतर-तुर्की-ईरान के त्रिगुट से परेशानी भी है और नाराजगी भी, क्योंकि इन तीन देशों ने मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे इस्लामिक देशों को भी सऊदी अरब के गुट के खिलाफ लामबंद कर दिया है। हालांकि इंडोनेशिया को सऊदी अरब ने अपने व्यापारिक रिश्तों और निवेश का हवाला देकर कुछ हद तक मना लिया है, लेकिन मलेशिया पूरी तरह से इस्लामिक देशों के नए समूह को लेकर सक्रिय है।

Author Published on: January 16, 2020 1:51 AM
इस्लामिक देशों के नए गुट के गठन से सऊदी अरब डरा हुआ है।

संजीव पांडेय

पिछले महीने मलेशिया में इस्लामिक देशों के सम्मेलन से सऊदी अरब के साथ-साथ चीन और अमेरिका सहित कई बड़ी ताकतों की नींद उड़ गई है। मलेशिया में हुए इस सम्मेलन में सऊदी अरब के तीन घोर विरोधी देशों- कतर, ईरान और तुर्की की सक्रियता ने उसके समक्ष एक चुनौती पेश कर दी है। हालांकि इस बैठक में इस्लामिक दुनिया से संबंधित कई महत्त्वपूर्ण मुद्दों से दूरी बनाई गई, लेकिन सऊदी अरब को साफ संकेत भेजा गया कि उसके नेतृत्व वाले इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआइसी) के कामकाज से कई देश खुश नहीं हैं। इस सम्मेलन का असर अब दिखने लगा है। इसके बाद ही ईरान के सैन्य कमांडर कासिम सुलेमानी अमेरिकी हमले में मारे गए। उधर, पाकिस्तान इस बैठक के बाद नए ‘इस्लामिक ब्लॉक’ का भय दिखा कर सबसे ज्यादा लाभ उठाने के लिए सक्रिय हो गया है। पाकिस्तान अपनी कुछ शर्तों पर सऊदी अरब से बातचीत कर रहा है। भारत की चिंता यह है कि नए इस्लामिक गुट के दबाव में सऊदी अरब के साथ बढ़ रही दोस्ती प्रभावित हो सकती है।

फिलहाल इस्लामिक देशों की आपसी राजनीति पर इस सम्मेलन का असर पड़ना लाजिमी है। इस्लामिक देशों के नए गुट के गठन से सऊदी अरब डरा हुआ है। यह समूह भविष्य में ओआइसी के लिए चुनौती बन कर खड़ा होगा। ओआइसी का गठन 1959 में हुआ था। इस संगठन पर सऊदी अरब सबसे ज्यादा हावी है। लेकिन अब कई इस्लामिक देश दबी जुबान में सऊदी अरब के दबदबे के खिलाफ बोलने लगे हैं। ऐसे कई देशों का कहना है कि सऊदी अरब और उसके कुछ खास सहयोगी देश व्यापारिक हितों के लोभ में दुनिया भर के मुसलमानों की समस्या को ओआइसी के मंच से नहीं उठने नहीं देते हैं। हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं है कि सऊदी अरब समेत कई इस्लामिक देशों के व्यापारिक हित चीन और भारत के तेल बाजार से जुड़े हैं। चीन और भारत सऊदी अरब के लिए बड़े तेल बाजार हैं। चीन अकेले प्रतिदिन पंद्रह लाख बैरल तेल सऊदी अरब से आयात करता है। भारत प्रतिदिन चालीस लाख बैरल तेल का आयात करता है, जिसका बड़ा हिस्सा सऊदी अरब से आता है। ऐसे में दुनिया के दो बड़े तेल बाजार सऊदी अरब किसी कीमत पर नहीं खोना चाहेगा।

दरअसल, इस समय पश्चिम से लेकर मध्य एशिया तक तुर्की और ईरान के अपने हित हैं। ईरान का विरोध सुन्नी सऊदी अरब के साथ ऐतिहासिक है। वहीं, तुर्की सऊदी अरब के राजपरिवार को हमेशा चुनौती देता रहा है। तुर्की अफ्रीका से लेकर एशियाई इस्लामिक देशों की गुपचुप मदद करता आया है। दूसरी ओर, तुर्की कुछ इस्लामिक देशों के राजपरिवारों से हमेशा नाराज चलता आया है। कतर को भी राजपरिवारों द्वारा शासित कुछ इस्लामिक देश शक की नजर से देखते हैं। उन्हें शक यह है कि कतर भी मुसलिम ब्रदरहुड को मदद देता है। कतर से सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के राजपरिवारों की नाराजगी इसी कारण है। सऊदी अरब के पत्रकार जमाल खाशोगी की तुर्की में हत्या के बाद सऊदी अरब और तुर्की के संबंध खासे खराब हो गए हैं। तुर्की के इसके लिए सीधे सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान को आरोपी मानता है।

सऊदी अरब को कतर-तुर्की-ईरान के त्रिगुट से परेशानी भी है और नाराजगी भी, क्योंकि इन तीन देशों ने मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे इस्लामिक देशों को भी सऊदी अरब के गुट के खिलाफ लामबंद कर दिया है। हालांकि इंडोनेशिया को सऊदी अरब ने अपने व्यापारिक रिश्तों और निवेश का हवाला देकर कुछ हद तक मना लिया है, लेकिन मलेशिया पूरी तरह से इस्लामिक देशों के नए समूह को लेकर सक्रिय है। यही कारण है कि मलेशिया में आयोजित बैठक के बाद सऊदी अरब को यह अंदाज हो गया है कि उसके नेतृत्व को अरब जगत में भविष्य में और भारी चुनौती मिलेगी।

सऊदी अरब ने मलेशिया में आयोजित इस्लामिक देशों की बैठक को विफल करने की पूरी कोशिश की थी। उसे इसमें आंशिक सफलता तब मिली, जब उसने पाकिस्तान को बैठक में शामिल नहीं होने के लिए राजी कर लिया। पश्चिम एशिया और मध्य एशिया की भू-राजनीति में पाकिस्तान की दखलदांजी लंबे समय से रही है। इसका मुख्य कारण पाकिस्तान की सैन्य ताकत है। मलेशिया की बैठक में शामिल नहीं होने के लिए पाकिस्तान सऊदी अरब के आग्रह को मान गया। हालांकि विशेषज्ञों को आश्चर्य इस बात पर है कि कश्मीर के मुद्दे पर पिछले कुछ समय में पाकिस्तान के साथ खुल कर मलेशिया और तुर्की आए हैं। यही नहीं, पाकिस्तान लगातार दबी जुबान से कहता रहा है कि सऊदी अरब वैश्विक मुसलिम हितों की बलि चढ़ा रहा है, क्योंकि उसके व्यापारिक हित भारत जैसे मुल्कों के साथ जुड़े है। बताया जाता है कि मलेशिया में आयोजित होने वाले बैठक के पीछे पाकिस्तान का भी दिमाग था। पिछले साल सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के दौरान मलेशिया, पाकिस्तान और तुर्की के बीच इस्लामिक देशों की बैठक आयोजित करने के लिए सहमति बनी थी। लेकिन बैठक के आयोजन के ठीक पहले पाकिस्तान सऊदी अरब के दबाव में बैठक में शामिल होने से पीछे हट गया। पाकिस्तान बैठक से क्यों पीछे हटा, इसका खुलासा तुर्की के राष्ट्रपति तैयब एर्दोगन ने किया। एर्दोगन के मुताबिक सऊदी अरब ने पाकिस्तान को आर्थिक सहयोग बंद करने और उसके यहां रह रहे चालीस लाख पाकिस्तानी कामगारों को वापस भेजने की धमकी दी थी। सऊदी अरब में कार्यरत पाकिस्तानी कामगारों से पाकिस्तान को अरबों डॉलर सालाना की आय होती है। यही नहीं, सऊदी अरब ने पाकिस्तान को यह भी धमकी दी थी कि वह स्टेट बैंक आॅफ पाकिस्तान में मौजूद अपने अरबों डॉलर निकाल लेगा।

लेकिन मलेशिया बैठक के मामले में पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ एक सौदा किया। पाकिस्तान की नाराजगी यह थी कि सऊदी अरब भारत के साथ अपने व्यापारिक हितों की आड़ में कश्मीर के मसले पर पाकिस्तान के साथ नहीं खड़ा हुआ। सऊदी अरब ने पाकिस्तान की इस नाराजगी को दूर किया है। पाकिस्तान गए सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैजल ने पाकिस्तान से वादा किया है कि जल्द ही कश्मीर को लेकर ओआइसी के विदेश मंत्रियों की बैठक बुलाई जाएगी। पाकिस्तान इसे अपनी जीत के तौर पर देख रहा है। हालांकि पाकिस्तान कश्मीर को लेकर तो हमेशा उग्र रहा है, लेकिन चीन में उइगुर मुसलमानों के उत्पीड़न पर चुप्पी साधे रहता है। इसके पीछे कारण यह है कि पाकिस्तान में बन रहे चीन-पाक आर्थिक गलियारे में चीन ने साठ अरब डॉलर का निवेश किया है। लेकिन सिर्फ पाकिस्तान के स्वार्थ की क्यों बात करें? सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश चीन के तेल बाजार को खोना नहीं चाहते हैं। दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक देश इस समय चीन है।

मलेशिया की बैठक और ईरानी सैन्य कमांडर कासिम सुलेमानी की मौत को जोड़ कर भी देखा जा रहा है। दरअसल, मलेशिया में इस्लामिक देशों की बैठक से इजराइल जैसे देश भी परेशान हैं। पिछले कुछ वर्षों में इजराइल और सऊदी अरब के रिश्ते बेहतर हुए हैं। इस कारण इजराइल कतई नहीं चाहेगा कि इस्लामिक देशों का कोई नया गुट खड़ा हो और उसकी परेशानी बढ़ा दे। सऊदी अरब के खिलाफ इजराइल अब उग्र नहीं है। सऊदी अरब पर कई इस्लामिक देश लगातार आरोप लगा रहे हैं कि फिलस्तीन के मसले पर सऊदी अरब और इजराइल के बीच अंदरखाने समझौता हो गया है। यह भी एक सच्चाई है कि कासिम सुलेमानी और हमास के संबंध काफी मधुर रहे हैं और सुलेमानी ने हमास की खूब मदद की है।

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