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राजनीति: विचार का माथा कभी झुकने नहीं दिया

मैं सन् 2008 में राज्यसभा में आया। रेल बजट पर बोलने का उन्होंने अवसर दिया। मैं जब बोला तो मेरी सीट पर आकर कहा कि अच्छा और तर्कयुक्त बोले, बधाई! वे ‘कमल सन्देश’ का संपादकीय नियमित पढ़ते थे। वे मार्गदर्शन भी देते थे। सदन के भीतर हम जैसे लोगों को उन्होंने उंगली पकड़कर सिखाया कि आप जब बोलते हो तो भारत देखता है और भारत भाजपा के बारे में सोचता है।

Author Published on: August 26, 2019 1:44 AM
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प्रभात झा

जो आया है उसे तो जाना ही है। क्योंकि जब कोई जाता है तभी धरा पर कोई आता है। शास्त्र साफ शब्दों में कहता है कि जीवन का सोलहवां संस्कार मृत्यु है। लेकिन मौत इतनी निर्दयी होगी, ऐसा पता नहीं था। ‘अरुण’ तो अभी अपने अरुणोदय से देश को अपने विचार को आलोकित ही कर रहा था कि मौत ने उसका घर देख लिया। मौत तुझे ऐसा नहीं करना था। अरुण जेटली ने अपने जीवन की लकीर स्वयं खींची। उन्होंने विचारों की प्रतिबद्धता की परीक्षा सन् 1975 में ही शत-प्रतिशत अंक से पास कर ली थी। इंदिरा गांधी ने सन् 1975 में देश में आपातकाल लगा दिया। उस दौरान अरुण जेटली सिर्फ 23 वर्ष के थे। लेकिन आजादी की दूसरी लोकतंत्र की लड़ाई में वे विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता के रूप में एक सेनानी थे। उन्हें जेल में डाल दिया गया। वे बड़े घराने के बेटे थे। लेकिन उन्होंने अपने विचारों के माथा को ऊंचा रखने के लिए इंदिराजी के सामने अपना माथा नहीं झुकाया। 19 महीने जेल में रहे। विचारों के प्रति प्रतिबद्धता का ऐसा अनुपम उदाहरण और कहीं नहीं मिल सकता।

उनके लक्ष्य तय हुआ करते थे। वे मित्र में इत्र की तलाश नहीं करते थे। उन्होंने सदैव मित्रता निभाई। यही कारण है कि बहरीन की धरती पर हजारों भारतीयों के बीच में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने दोस्त को पुकारा और कहा, ‘मेरा दोस्त अरुण चला गया’। आज आपको सब कुछ मिल सकता है और मिल भी जाता है। पर एक अच्छा दोस्त मिलना कठिन हो गया है। राजनैतिक जीवन में तो दोस्त मिलना ही दुर्लभ है। क्योंकि यहां तो स्वार्थ का मेल-मिलाप होता है।

पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अरुण जेटली की दोस्ती की मिसाल भारत में हमेशा दी जाएगी। विचारों का लगाव था। यही कारण है कि श्रीमती संगीता जेटली को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फोन किया तो श्रीमती जेटली ने कहा, ‘आप अपने कर्तव्य पथ पर रहें और कार्य पूरा करके आएं।’ श्रीमती जेटली का संदेश यह भी दर्शाता है कि अरुण जेटली ने अपने परिवार को भी विचारों और कर्तव्य पथ से जोड़कर रखा था। अरुण जेटली बेबाक थे। वे प्रसिद्ध अधिवक्ता और कुशल वक्ता थे। वे ऐसे प्रवक्ता थे, जिन्हें सुनने के लिए लोग टीवी पर आतुर रहते थे।

सन्् 2003 में दल का निर्णय हुआ कि मुझे दिल्ली आना है। मैं, प्रकाश जावडेकर और श्याम जाजू दिल्ली आए। हम लोगों के रहने की व्यवस्था नहीं थी। तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष कुशाभाऊ ठाकरे एक दिन अरुणजी के पास आए और कहा कि दो कार्यकर्ता महाराष्ट्र से और एक मध्य प्रदेश से, हमने दिल्ली में दल के कार्य के लिए बुलाया है। उनके रहने की व्यवस्था करनी है। जेटलीजी ने छूटते ही कहा, ‘ठाकरे जी आपका आदेश। मैं तो अपने नौ नंबर अशोका रोड में रहता नहीं हूं। तीनों की व्यवस्था यहीं कर देते हैं।’ इसके बाद हम तीनों वहां रहने लगे।

वह हम सभी से पूछते रहते थे कि कोई दिक्कत तो नहीं। एक दिन उन्होंने मुझे बुलाया और कहा कि आज तुम मेरे घर चलोगे। मैं हतप्रभ रह गया। वे अपनी गाड़ी में शाम को ले गए। उन्होंने अनेक बातें की और मुझसे कहा, ‘मुझे एक संघ के अधिकारी ने कहा है कि तुम अपने संपर्क से पार्टी में दूसरी पीढ़ी को आगे लाओ, उनको गढ़ने का काम करो।’ उन्होंने उस दिन मुझसे पूछा कि सामान्य कार्यकर्ता मेरे बारे में क्या सोचते हैं। मैंने कहा कि सभी आपके बारे में अच्छा सोचते हैं। उन्होंने कहा, ‘तुम सोचते होंगे, पर मैं बताता हूं कि मेरे बारे में लोग क्या सोचते हैं। मैं घमंडी हूं। मैं सभी लोगों से मिलता नहीं हूं। मैं आरामतलब हूं।’ बाद में उन्होंने कहा कि तुम्हारी भाभी से पूछो। भाभीजी को बुलाया। परिचय कराया। फिर भाभीजी ने कहा कि आपके भाई साहब जेटली जी वैसे नहीं हैं, जैसा लोग सोचते हैं। वे सिर्फ खाने के शौकीन हैं। उनकी सरलता और महानता को मैंने करीब से देखा।

मैं सन् 2008 में राज्यसभा में आया। रेल बजट पर बोलने का उन्होंने अवसर दिया। मैं जब बोला तो मेरी सीट पर आकर कहा कि अच्छा और तर्कयुक्त बोले, बधाई! वे ‘कमल सन्देश’ का संपादकीय नियमित पढ़ते थे। वे मार्गदर्शन भी देते थे। सदन के भीतर हम जैसे लोगों को उन्होंने उंगली पकड़कर सिखाया कि आप जब बोलते हो तो भारत देखता है और भारत भाजपा के बारे में सोचता है। अरुण जेटली का दिल्ली, पंजाब और चंडीगढ़ से बहुत लगाव था। आज जो भाजपा की द्वितीय पंक्ति की टीम है, उसे गढ़ने में उनका बहुत बड़ा हाथ है। वे संसद के दोनों सदनों के गौरव थे। पूरे सदन को उनके भाषण का इंतजार रहता था। वे राज्यसभा में विपक्ष के नेता बने। उन्होंने उस दायित्व को कर्त्तव्यपूर्वक निभाया। देशहित में अनेक ऐसे खुलासे किए, जो यूपीए सरकार के लिए गले की हड्डी बन गए।

भाजपा या एनडीए सरकार या मोदीजी की सरकार जब भी विपक्ष के घेरे में आई तो अरुण जेटली ने सदैव अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह को तोड़ा। वे सेंट्रल हाल की शान थे। वर्षों तक 9, अशोका रोड में पत्रकारों के सदैव प्रिय रहे अरुण जेटली। उन्हें दल में संकटमोचक कहा जाता रहा। उनके सभी दलों में मित्र थे। देश में हजारों लोग ऐसे थे, जो संघ और भाजपा के समर्थक तो थे, पर स्वयंसेवक या कार्यकर्ता नहीं थे। उन सभी को सदैव जोड़े रखने का काम अरुण जेटली करते थे। अरुण जेटली एक व्यक्ति का नाम अक्सर लेते थे। वे थे राजकुमार भाटिया। अरुणजी कहते थे कि मुझे विद्यार्थी परिषद में लाने वाला और विश्वविद्यालय का चुनाव लड़ाने वाले राजकुमारजी ही थे। मैं इन्हीं के कारण परिषद से जुड़ा। वे व्यक्तियों के आकलन में कभी धोखा नहीं खाते थे। राजनीति में अवसरवादी उन्हें पसंद नहीं थे। विश्व से लेकर भारत की राजनीति, भाजपा सहित सभी दलों के नेताओं की उन्हें जानकारी रहती थी। विचारों, अपने जीवन में मूल्यों और नैतिकता के प्रति ईमानदार व्यक्ति का नाम अरुण जेटली था, यह हम गर्व से कह सकते हैं।

हमें उनके साथ एक नहीं अनेक राज्यों में मीडिया का काम करने का मौका मिला। उनके न्यूज सेंस के सभी कायल थे। अनेक पत्रकार उनसे मार्गदर्शन लेने आते थे। वे सबके साथ मित्रता रखते थे। दिल्ली में जब उन्होंने कार्य शुरू किया और आगे बढ़ते गए तो दिल्ली का एक ऐसा वर्ग जो अपने को ‘एकेडेमिक’ मानता था, वह भी कहने लगा कि अब भाजपा में भी अकादमिक लोगों के आने की शुरुआत हो गई। वे अपने कर्मों और विचारों की प्रतिबद्धता से आगे आए। वे भ्रष्टाचारी और चाटुकारों से सदैव सतर्क रहते थे। अरुणजी हम सबको छोड़कर चले गए। वे काया से जरूर चले गए है पर उनकी विचारों की छाया में भाजपा ही नहीं, देश की आने वाली पीढ़ी सदैव पल्लवित होती रहेगी।
(लेखक राज्यसभा सांसद हैं)

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