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राजनीतिः पैसे का संकट और बढ़ता प्रदूषण

इस समय प्रदूषण का संकट पूरी दुनिया के लिए जितना भयावह है, उससे कहीं ज्यादा हमारे लिए यह समस्या गंभीर चिंता का विषय इसलिए भी है कि प्रदूषण के कारण भारत में होने वाली मौतों का आंकड़ा तेजी से बढ़ रहा है। दुनिया में प्रदूषण से सबसे ज्यादा मौतों वाले देशों की सूची में भारत सबसे ऊपर है।

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सुविज्ञा जैन

देश में प्रदूषण का स्तर बढ़ता ही जा रहा है। हालत यह है कि इसे मापने का पैमाना छोटा पड़ रहा है। खासकर वायु प्रदूषण के मामले में तो पूरी दुनिया में भारत की स्थिति काफी खराब है। उत्तर भारत के कई इलाके गैस चैंबर में तब्दील होते जा रहे हैं। इसीलिए इस बार के बजट से काफी उम्मीद लगाई गई थीं कि प्रदूषण नियंत्रण के लिए बजट में कुछ बड़ा प्रावधान किया जाएगा। यह उम्मीद और ज्यादा इसलिए भी थी, क्योंकि सरकार ने पिछले साल ही राष्ट्रीय स्वच्छ हवा कार्यक्रम (एनसीएपी) शुरू किया गया था। इसका लक्ष्य यह था कि 2017 को आधार वर्ष मान कर 2024 तक पीएम-10 और पीएम-2.5 को बीस से तीस फीसद तक कम किया जाएगा। इस कार्यक्रम के तहत उन एक सौ बाईस शहरों पर काम किया जाना था, जहां प्रदूषण की तीव्रता तय मानकों से ज्यादा रहती है। कार्यक्रम चालू हुए एक साल गुजर चुका है। कार्रवाई योजना को लागू करने की कई कोशिशें हुर्इं भी, लेकिन अब तक कोई असर दिखाई नहीं दिया।

कार्रवाई योजना के अलावा भी विशेषज्ञों ने कई उपाय सुझाए थे। लेकिन ये सारे उपाय काफी खर्चीले थे। प्रदूषण का दायरा है भी इतना बड़ा कि छोटे-मोटे उपायों से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। संभवत इसीलिए इस बार के बजट में प्रदूषण और पर्यावरण के मद में रकम का प्रावधान पिछले साल की तुलना में दस गुना ज्यादा रखा गया है। हालांकि भारी-भरकम समस्या के सामने यह रकम ऊंट के मुंह में जीरे के समान ही है। फिर भी इस काम की शुरुआत के लिए काफी है, बशर्ते शुरुआत भी ढंग से हो।

पिछले साल प्रदूषण से निपटने के लिए बजट में सिर्फ चार सौ साठ करोड़ रुपए रखे गए थे। इस बार यह रकम बढ़ा कर 4400 करोड़ रुपए कर दी गई है। गौर से देखें तो प्रदूषण से निपटने के लिए पिछले साल के बजट में प्रावधान एक तरह से नगण्य ही था। इसीलिए इस बार साढ़े चार हजार करोड़ की रकम कई गुनी ज्यादा दिख रही है, लेकिन इस रकम से बड़ी मुश्किल से देश के कुछ शहरों में ही प्रदूषण निरोधी उपाय लागू किए जा सकेंगे। इसीलिए पहले से कह दिया गया है कि इस रकम का लाभ वे ही शहर उठा पाएंगे, जिनकी आबादी दस लाख से ज्यादा है। यानी प्रदूषण कम करने की शुरुआत चुनिंदा शहरों तक सीमित रहेगी। देश में दस लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों की संख्या चौरासी है। विशेषज्ञों का अनुमान यह है कि एक शहर में प्रदूषण नियंत्रण और रोकथाम के लिए औसतन साढेÞ तीन हजार करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। इस लिहाज से सालाना बजट की 4400 करोड़ रुपए की रकम दो शहरों के लिए भी काफी नहीं है। हालांकि एनसीएसी के तहत एक सौ बाईस शहर चिन्हित किए गए थे। यानी इस बार के बजट में एलान किए गए दस लाख आबादी से छोटे शहर नजर से बाहर हो गए हैं। फिर भी प्रदूषण के मोर्चे पर खर्च के लिए धन की कमी के कारण कुछ न होने से तो इतना होना भी बहुत माना जाएगा।

बजट में पर्यावरण को अचानक थोड़ा बहुत महत्त्व मिलने पर अचरज होना स्वाभाविक है, क्योंकि देश भारी आर्थिक संकट में है। उसकी पहली चिंता देश में औद्योगिक गतिविधियां बढ़ाने को लेकर है और सारी दुनिया जानती है कि औद्योगिक गतिविधियां पर्यावरण से समझौता किए बगैर संभव नहीं हैं। इस सिलसिले में अब तक जितनी भी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाएं बनाई गई हैं, वे इसीलिए नाकाम हुर्इं क्योंकि ज्यादातर देशों ने अपने आर्थिक विकास की चिंता सबसे पहले की। यहां तक कि खुद अमेरिका तक पेरिस समझौते से अलग हो चुका है और बेहिचक एलान कर चुका है कि आर्थिक वृद्धि से बिल्कुल भी समझौता नहीं करेगा। जाहिर है, इस घटना का असर दुनिया के तमाम देशों पर पड़ रहा है। आमतौर पर यह समझा जाने लगा है कि आर्थिक हित सबसे पहले हैं और पर्यावरण या दुनिया के नागरिकों की सेहत की चिंता बाद की बात है। इसीलिए अपनी-अपनी सहूलियत के हिसाब से ज्यादातर देश प्रदूषण की समस्या से आंखें चुराते रहे हैं। लगभग सभी देश कार्बन उत्सर्जन अपने तय लक्ष्यों को कभी भी पूरा नहीं कर पाए। जलवायु परिवर्तन की चिंता को लेकर अतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में वाद-विवाद इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं।

इस समय प्रदूषण का संकट पूरी दुनिया के लिए जितना भयावह है, उससे कहीं ज्यादा हमारे लिए यह समस्या गंभीर चिंता का विषय इसलिए भी है कि प्रदूषण के कारण भारत में होने वाली मौतों का आंकड़ा तेजी से बढ़ रहा है। दुनिया में प्रदूषण से सबसे ज्यादा मौतों वाले देशों की सूची में भारत सबसे ऊपर है। ग्लोबल अलांयस ऑन हेल्थ एंड पॉल्युशान ने यह रिपोर्ट तैयार की थी, जिसमें विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ और कई सरकारी व गैर-सरकारी संस्थाएं भागीदार हैं। प्रदूषण और स्वास्थ्य पर नजर रखने वाली इस अंतरराष्ट्रीय संस्था ने इंस्टीट्यूट आॅफ हेल्थ मैट्रिक्स इवेल्यूएशन के आंकड़े इस्तेमाल करते हुए बताया है कि हर साल सभी प्रकार के प्रदूषण से पूरी दुनिया में तिरासी लाख लोग मर रहे हैं। किसी भी बीमारी या प्राकृतिक आपदा से होने वाली मौतों की तुलना में यह आंकड़ा सबसे बड़ा है। आज दुनिया में एचआइवी, टीबी और मलेरिया से होने वाली मौतों की तुलना में प्रदूषण से होने वाली मौतें तीन गुना ज्यादा हैं। युद्ध और दूसरी तरह की हिंसा में होने वाली मौतों की तुलना में यह आंकड़ा करीब पंद्रह गुना ज्यादा है। रिपोर्ट में प्रदूषण के विभिन्न रूपों का भी ब्योरा है। इससे पता चलता है कि सबसे भयावह हालत वायु प्रदूषण की है। इससे दुनिया में हर साल करीब पचास लाख लोग बेमौत मारे जा रहे हैं। हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों का आंकड़ा सत्तर लाख है। ऐसे में जरूरत फौरन युद्धस्तर पर काम करने की है।

भारत इस समय चौतरफा प्रदूषण की आपात स्थिति में है। वायु प्रदूषण चरम पर है। जल और जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधन भी व्यापक रूप से प्रदूषित हो रहे है। खासतौर पर देश में जल संसाधन जिस तरह कम पड़ता जा रहा है, उसमें सीमित जल का प्रदूषित होते जाना बड़े संकट का संकेत है। उधर, उत्पादकता बढ़ाने की होड़ में कीटनाशकों और अंधाधुंध रासायनिक खाद का इस्तेमाल पूरी खाद्य शृंखला को जहरीला बना रहा है। कुछ समय पहले ही भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण के सर्वेक्षण में देश भर से उठाए गए दूध के नमूनों में एफलोटॉक्सिन नाम का खतरनाक पदार्थ हद से ज्यादा पाया गया था। ऐसे में प्रदूषण से मौतों के मामले में भारत को शीर्ष पर रखे जाने पर हैरत नहीं होनी चाहिए।

भारत ने पेरिस समझौते के तहत अपना चालीस फीसद ऊर्जा उत्पादन गैर जीवाश्म र्इंधन से करने का लक्ष्य बनाया था। यही नहीं, इस समझौते के तहत यह तय किया गया था कि अपनी कार्बन उत्सर्जन तीव्रता सन 2005 की तुलना में 2030 तक पैंतीस फीसद तक कम करेंगे। वन क्षेत्र बढ़ाने और वृक्षारोपण जैसे कई उपायों को लागू करने पर भी भारत विभिन्न मंचों पर अपनी प्रतिबद्धता जाहिर कर चुका है, लेकिन इन कामों को करने में हमेशा ही पैसे की कमी आड़े आती रही। इस बार के बजट में वायु प्रदूषण के मद में तय चार हजार चार सौ करोड़ की रकम स्वच्छ ऊर्जा और स्वच्छ र्इंधन जैसे उपायों के लिए भले ही नाकाफी लगे, लेकिन इससे प्रदूषण पर निगरानी का काम जरूर बढ़ाया जा सकता है।

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