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राजनीति: मध्य-पूर्व में कुर्दिस्तान की आहट

तुर्की में इस समय बीस फीसद कुर्द हैं। पीढ़ियों से तुर्की में कुर्दों के साथ शत्रुतापूर्ण व्यवहार होता रहा है। तुर्की में कुर्दिश नाम और उनके रिवाजों को प्रतिबंधित कर दिया गया है। इसके साथ ही कुर्दिश भाषा भी प्रतिबंधित है। यहां तक कि कुर्दिश पहचान को भी खत्म कर दिया गया है। साल 2017 में इराक में अलग कुर्दिस्तान के लिए जनमत संग्रह हुआ तो भारी तादाद में कुर्दों ने इसके पक्ष में मत डाले। इसके बाद तुर्की कुर्दों को लेकर गहरे दबाव में आ गया।

Author Published on: October 19, 2019 1:36 AM
दुनिया के सबसे खतरनाक इलाकों में शुमार इस क्षेत्र में आइएस के कई लड़ाके कुर्दों के कब्जे में हैं और तुर्की के हमलों के बाद से वे जेलों से भाग रहे हैं।

ब्रह्मदीप अलूने

बगावत और हिंसक संघर्षों से लंबे समय से जूझते देश सीरिया की आंतरिक राजनीति ने एक बार फिर करवट ली है। इस्लामिक स्टेट (आइएस) के खूनी संघर्ष से निपटने में सीरिया के मददगार रहे तुर्की के तेवर अचानक बदल गए हैं। दरअसल, कुछ दिनों पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी सेना को सीरिया की जंग से अलग करने का जैसे ही ऐलान किया, वैसे ही तुर्की ने कुर्दों को निशाना बना कर पश्चिम एशिया में नया संकट खड़ा कर दिया है। तुर्की कुर्दों के संगठन को आतंकवादी समूह मानता है और उसे अपनी संप्रभुता के लिए खतरा बताता रहा है। वहीं, अमेरिका कुर्दों को लेकर उदार रवैया दिखाता रहा है। पश्चिम एशिया की मुसलिम लड़ाकू जनजाति कुर्द अपनी बहादुरी और दिलेरी के लिए दुनिया भर में विख्यात है। इसका प्रभाव सीरिया के उत्तरी इलाकों के साथ ही तुर्की, इराक और ईरान तक है।

सीरिया के उत्तर में कुर्द ठिकानों पर तुर्की की सेना लगातार गोलाबारी कर रही है और इससे इस इलाके में रहने वाले हजारों परिवार युद्ध की मार झेल रहे हैं। दुनिया के सबसे खतरनाक इलाकों में शुमार इस क्षेत्र में आइएस के कई लड़ाके कुर्दों के कब्जे में हैं और तुर्की के हमलों के बाद से वे जेलों से भाग रहे हैं। आइएस के इन खूंखार लड़ाकों को कुर्दों ने अमेरिकी सेना की मदद से बड़ी मुश्किल से पकड़ा था। ऐसे में इनका भाग निकलना पश्चिम एशिया सहित पूरी दुनिया को खतरे में डाल सकता है। यदि ये लड़ाके फिर से संगठित हो गए तो आइएस मध्य-पूर्व में फिर से मजबूत हो जाएगा और इसके दूरगामी परिणाम बेहद खतरनाक होंगे। दूसरी ओर, तुर्की के राष्ट्रपति कुर्दों पर हमले के अमेरिका और यूरोप के विरोध को दरकिनार कर धमका रहे हैं कि यदि उन्हें हमलों से रोका गया तो वे पश्चिमी एशिया के छत्तीस लाख युद्ध प्रभावित शरणार्थियों को यूरोप में धकेल देंगे।

तुर्की का कहना है कि सीरिया से गृह युद्ध के चलते जो शरणार्थी तुर्की में रह रहे हैं, उन्हें वे सुरक्षित क्षेत्र में बसाना चाहते हैं। वह वहां बीस लाख सीरियाई शरणार्थियों के लिए एक शिविर बनाएगा। फिलहाल यह इलाका कुर्दों के पास है। कुर्द लड़ाकों की मदद कर रही सीरिया सरकार की सेना रणनीतिक रूप से अहम मानबिज शहर में दाखिल हो गई है। तुर्की इस इलाके को खाली करवा कर सुरक्षित क्षेत्र बनाने की बात कह रहा है। इस समूचे घटनाक्रम में अमेरिका की पश्चिम एशिया को लेकर पूर्व से चली आ रही अस्थायी और अस्पष्ट नीति एक बार फिर सामने आई है।

बीते कई सालों से महाशक्तियां मध्य-पूर्व को शतरंज की बिसात पर तोल कर शह और मात का खेल खेलती रही हैं। इसमें तेल की राजनीति के साथ मजहब की जोर आजमाइश को बढ़ावा दिया गया है। विश्व के संपूर्ण उपलब्ध तेल का लगभग छियासठ प्रतिशत ईरान की खाड़ी के आसपास के इलाकों, मुख्य रूप से कुवैत, ईरान और सऊदी अरब में पाया जाता है। सोवियत संघ और अमेरिका तो तेल के मामले में आत्मनिर्भर हैं, लेकिन यदि यूरोप को इस इलाके से तेल मिलना बंद हो जाए तो उसके अधिकांश उद्योग धंधे बंद हो जाएंगे और इस प्रकार यूरोपीय महाद्वीप की औद्योगिक और सामरिक क्षमता बर्बाद हो जाएगी। यही कारण है कि पश्चिमी देश मध्य-पूर्व पर अपना नियंत्रण बनाए रखना चाहते हैं।

ईरान को रोकने के लिए अरब राष्ट्रवाद को तोड़ने की जरूरत थी और इसी का परिणाम हुआ कि वर्तमान में मध्य-पूर्व शिया-सुन्नी के संघर्ष का अखाड़ा बन गया है। शिया बहुल ईरान की इस्लामिक क्रांति से नाराज अमेरिका ने सुन्नी राष्ट्रवाद की कट्टरता को उभारने में अभूतपूर्व योगदान दिया। इसका असर मध्य-पूर्व के एक महत्त्वपूर्ण देश सीरिया पर भी पड़ा। सीरिया में बहुसंख्यक सुन्नी हैं, जबकि वहां के राष्ट्रपति असद शिया हैं और ईरान समर्थित माने जाते हैं। सीरिया के पूर्व में इराक और उत्तर में तुर्की है। चौहत्तर फीसद सुन्नी आबादी वाले सीरिया में सत्ता अल्पसंख्यक शिया संप्रदाय के बशर अल असद के हाथों में है। उन्हें रूस, अपने पारंपरिक सहयोगी ईरान और ईरान के समर्थन वाले लेबनानी चरमपंथी गुट हिजबुल्ला से मजबूत कूटनीतिक और सैन्य सहयोग मिलता रहा है।

फिर 2011 में जब मशहूर ‘अरब स्प्रिंग’ विरोध प्रदर्शनों ने ट्यूनीशिया और मिस्र में सत्तापलट कर दिया था तो अमेरिका ने इसे असद को सत्ता से बेदखल करने के स्वर्णिम अवसर के रूप में देखा। सीरिया की सत्ता से असद को हटाने के प्रयास में अमेरिका के मददगार वहां कई विद्रोही संगठन बन गए और इसी बीच आइएस इस इलाके में मजबूती से अपनी पैठ बनाने में सफल हो गया। साल 2013 में अलकायदा से अलग होकर आइएस अस्तित्व में आया और इससे मध्य-पूर्व में संघर्ष का एक नया सिलसिला शुरू हो गया। आइएस ने अमेरिकी योजनाओं के विपरीत ईसाइयों और उदार मुसलमानों के खिलाफ जेहाद की घोषणा कर मध्य-पूर्व के राजनीतिक संघर्ष की दिशा बदल दी।

आइएस ने इस इलाके के तेल कुओं पर अपना कब्जा जमा कर महाशक्तियों के सामने चुनौती पेश कर दी और इसके बाद पश्चिमी देशों, अमेरिका, रूस, तुर्की जैसे देशों ने आइएस को मिल कर खत्म करने में अपनी भूमिका निभाई। लंबे समय से इस युद्धग्रस्त इलाके से आइएस समाप्त होने की कगार पर आया तो अब एक बार फिर तुर्की ने कुर्दों के खिलाफ मोर्चा खोल कर नए संकट को जन्म दे दिया है। कभी विरोधी रहे कुर्द सीरिया की असद सरकार से मिल कर तुर्की का प्रतिरोध कर रहे हैं। वहीं अब रूस भी कुर्दों के समर्थन में आ गया है।

तुर्की से कुर्दों का विरोध पारंपरिक माना जाता है और कुर्द तुर्की को अपने दुश्मन की तरह देखते हैं। पहले विश्व युद्ध में ऑटोमन साम्राज्य की हार के बाद पश्चिमी सहयोगी देशों ने 1920 में संधि कर कुर्दों के लिए अलग देश बनाने की बात कही थी। 1923 में तुर्की के नेता मुस्तफा कमाल पाशा ने इस संधि को खारिज कर दिया था। तुर्की की सेना ने 1920 और 1930 के दशक में कुर्दिश उभार को कुचल दिया था। तब से कुर्दों और तुर्की के बीच दुश्मनी और गहरा गई। तुर्की में इस समय बीस फीसद कुर्द हैं। पीढ़ियों से तुर्की में कुर्दों के साथ शत्रुतापूर्ण व्यवहार होता रहा है। तुर्की में कुर्दिश नाम और उनके रिवाजों को प्रतिबंधित कर दिया गया है। इसके साथ ही कुर्दिश भाषा भी प्रतिबंधित है।

यहां तक कि कुर्दिश पहचान को भी खत्म कर दिया गया है। साल 2017 में इराक में अलग कुर्दिस्तान के लिए जनमत संग्रह हुआ तो भारी तादाद में कुर्दों ने इसके पक्ष में मत डाले। इसके बाद तुर्की कुर्दों को लेकर गहरे दबाव में आ गया। उसे डर है कि इस इलाके में कुर्दिस्तान के बनने से उसके देश में बसने वाले कुर्द विद्रोह कर कुर्दिस्तान में मिलने की मांग करेंगे और इससे तुर्की की संप्रभुता पर नया संकट खड़ा हो सकता है।

यूरोप के एकमात्र मुसलिम बहुल देश तुर्की के राष्ट्रपति की मुसलिम शरणार्थियों के नाम पर दी जा रही धमकियों से यूरोप, रूस और अमेरिका चिंतित हैं। ऐसे में सीरिया में संतुलन, ईरान को दबाने और इराक सहित अन्य खाड़ी देशों पर अपना प्रभाव जमाए रखने के लिए मुमकिन है कि आने वाले समय में अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र अलग कुर्दिस्तान की मांग को मान लें। ऐसा होने पर मध्य-पूर्व का भूगोल एक बार फिर बदल जाएगा और दक्षिणी-पूर्वी तुर्की, उत्तरी-पूर्वी सीरिया, उत्तरी इराक, उत्तर-पूर्वी ईरान और दक्षिण-पश्चिमी आर्मेनिया को मिला कर कुर्दिस्तान अस्तित्व में आ सकता है। कुर्दिस्तान सऊदी अरब और ईरान के प्रभुत्व को खत्म करने का पश्चिमी हथियार बन सकता है और बदलते वैश्विक परिदृश्य में इसकी संभावनाएं बलवती हो गई हैं।

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