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राजनीति: कीटनाशकों का बढ़ता खतरा

ग्रीन पीस इंडिया की रिपोर्ट बताती है कि कीटनाशक बच्चों के दिमाग को घुन की तरह खोखला कर रहे हैं।

Author नई दिल्ली | Published on: January 25, 2020 1:01 AM
ध्ययन में यह सामने आया कि देश के कई राज्यों में कीटनाशकों का इस्तेमाल सरकार द्वारा निर्धारित वैज्ञानिक मापदंडों के अनुरूप नहीं है।

ऐसा कई बार हो चुका है जब विशेषज्ञों और जांच प्रयोगशालाओं ने शीतल पेय पदार्थों में जहरीले रसायन होने की पुष्टि की है। लेकिन लगता है कि इस पर केंद्र और राज्य सरकारों ने गौर नहीं किया। यदि हम ध्यान से अंगे्रजी भाषा में कोक और पेप्सी की बोतलों पर लिखे निर्देश पढ़ें, तो उसमें साफ-साफ लिखा है- इसे बच्चों और किशोरों को पीने के लिए न दें, क्योंकि यह उनके लिए उपयुक्त नहीं है। कोक, पेप्सी या अन्य दूसरे पेयों, जिसमें पानी से बने अन्य ठंडे पेय भी शामिल हैं, की बोतलों पर ही नहीं, बल्कि दूसरे पेय पदार्थों की बोतलों पर भी इसी तरह के निर्देश लिखे होते हैं। क्या हम कभी उस पर गौर करते हैं? इतना ही नहीं, मैगी सहित जब कई अन्य खाद्य वस्तुओं में मानक से ज्यादा कीटनाशक होने का मामला सामने आया था, तब लोगों को पता चला कि वे एक बेहतरीन खाद्य की जगह जहरबुझे खाद्य का सेवन कर रहे थे। संवेदनहीनता की ऐसी घटनाएं शायद ही दुनिया में और कहीं देखने-सुनने में आएं। पिछले पंद्रह वर्षों में कई बार पेय पदार्थों और मैगी सहित दूसरे खाद्यों में जहरीले पदार्थों की मिलावट की बातें मीडिया में जोर-शोर से उछलीं, लेकिन कुछ ही महीनों में उनकी चर्चा वैसे ही आम लोगों से गायब हो गई, जैसे दूसरी चर्चित घटनाएं।

ग्रीन पीस इंडिया की रिपोर्ट बताती है कि कीटनाशक बच्चों के दिमाग को घुन की तरह खोखला कर रहे हैं। बच्चों के मानसिक विकास पर कीटनाशकों के प्रभाव के अध्ययन में यह सामने आया कि देश के कई राज्यों में कीटनाशकों का इस्तेमाल सरकार द्वारा निर्धारित वैज्ञानिक मापदंडों के अनुरूप नहीं है। कंपनियां इनका इस्तेमाल मनमानी तरीके से कर रही हैं, जिससे बच्चों पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। पानी और भोजन की शुद्धता के नाम पर रासायनिक जहरीले तत्त्वों की जो मात्रा इस्तेमाल की जा रही है, वह बच्चों के लिए ही नहीं, बल्कि बड़ों के लिए भी बेहद नुकसानदायक है।
जैसे-जैसे वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है और उत्पादन बढ़ रहा है, वैसे-वैसे खाद्यान्नों के भंडार गृहों और खेतों में चूहों और अन्य कीट-पतंगों का प्रकोप भी बढ़ता जा रहा है। इससे हर साल ग्यारह हजार करोड़ रुपए के कृषि उत्पाद, फल और मेवे नष्ट हो जाते हैं। इतनी बड़ी मात्रा में कृषि उत्पादों की बर्बादी को रोकने के लिए बहुत बड़े पैमाने पर कीनाशकों का इस्तेमाल होता है। गौरतलब है, चूहों और कीटों की रोकथाम के लिए देशी तरीकों को अपनाकर महफूज रहा जा सकता है। एक आंकड़े के मुताबिक 1950 में कृषि उत्पादों और अन्य उत्पादों को बचाने के लिए दो हजार टन कीटनाशकों का इस्तेमाल किया गया था। अब इसकी खपत बढ़ कर चौरानवे हजार टन हो गई है, यानी बहत्तर सालों में परच्यानवे हजार टन कीटनाशकों का उपयोग बढ़ा है।

अब तो शायद ही कोई ऐसी चीज हो, जिसको सुरक्षित रखने के लिए कीटनाशकों का उपयोग न किया जाता हो। अपवाद के रूप में जैविक खेती के उत्पादों को छोड़ दिया जाए तो, पीने और खाने की हर वस्तु में कीटनाशक मिलाए जाते हैं। आज देश का सारा पर्यावरण कीटनाशकों के इस्तेमाल से जहरीला हो गया है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के फार्माकोलॉजी विभाग के एक अध्ययन के अनुसार घरों में मच्छर और कॉकरोच मारने के लिए छिड़के जाने वाले कीटनाशकों का चौदह वर्ष से कम उम्र के बच्चों पर असर बहुत घातक असर पड़ता है। कहने का मतलब यह है कि घर में ही बच्चे जाने-अनजाने में कीटनाशकों की चपेट में आते जा रहे हैं। बिडंबना तो यह है कि शिक्षित घरों में भी इसके प्रति कोई खास जागरूकता नहीं है। घरों में मंहगे-चमकीले सेब, केले, आम, बैंगन, भिंडी, लौकी, नेनुआ जैसी इस्तेमाल होने वाली तमाम सब्जियों में कीटनाशकों का इस्तेमाल, एक नहीं, दो-तीन स्तरीय होने लगा है। खेत में जहां इनका उपयोग फसल बढ़ाने के लिए किया जाता है, वहीं रोगों से बचाव के लिए भी इन्हें इस्तेमाल किया जाता है। फिर इन्हें चमकदार बनाने के लिए फोलिडज नामक रसायन में डुबोया जाता है। सोचा जा सकता है कि इन तीन स्तरों पर कीटनाशकों और रसायनों के इस्तेमाल से जीवन, पर्यावरण, जैव विविधता और जिस जमीन पर इन्हें उगाया जाता है, उन पर कितना असर पड़ता होगा? एक आंकड़े के मुताबिक 2013-14 में देश में नब्बे लाख हेक्टेयर से अधिक जमीन में कीटनाशक छिड़के गए थे, 2017-18 में चौरानवे लाख हेक्टेयर जमीन में इनका इस्तेमाल किया गया। इसके अलावा बागवानी और औषधीय खेती में भी कीटनाशकों का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है, जिससे कोई भी फल पूरी तरह जहरीले रसायनों से सुरक्षित नहीं रह गया है।

उत्तर प्रद्रेश, बिहार, पंजाब, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे अनेक राज्यों में टमाटर की अनेक किस्मों की फसलें उगाई जाती हैं। इन किस्मों में रश्मि और रूपाली प्रमुख हैं। खाने में इनका स्वाद भी अच्छा होता है। लेकिन इन पर हेल्योशिस आर्मिजरा नामक कीड़ा इन्हें बहुत नुकसान पहुंचाता है, यह टमाटर में सुराख कर देता है। इस कीड़े की रोकथाम के लिए बाजार में कई तरह की दवाएं मौजूद हैं, जिनमें रेपलीन, चैलेंजर, रोगर हाल्ट प्रमुख हैं। इनका छिड़काव कई चरणों में किया जाता है। दो साल पहले पश्चिम बंगाल, पंजाब, महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण के राज्यों में कपास की फसल पर सफेद मक्खियों के लाइलाज हमले का मुख्य कारण इन पर अंधाधुंध कीटनाशक छिड़के गए हैं। इससे जहां जमीन में जहर घुलता जा रहा है, वहीं जीवन, पर्यावरण, जैविक विविधता को भी नुकसान पहुंच रहा है।

एक शोध के मुताबिक जिन क्षेत्रों की फसलों में कीटनाशक दवाओं का प्रयोग अधिक किया जाता है, वहां पिछले पचास सालों में कई वनस्पतियां और कीट-पतंगे हमेशा के लिए खत्म हो गए हैं। देश में कई ऐसे इलाके हैं, जहां कीटनाशकों की गंध के कारण सारा वातावरण जहरीला बनता जा रहा है और सांस, त्वचा, दिल और दिमाग संबंधी तमाम बीमारियां आमतौर पर होने लगी हैं। विशेषकर हरियाणा, पंजाब, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और दिल्ली में कई इलाके पर्यावरण के नजरिए से पूरी तरह खराब हो गए हैं। देश के जानेमाने वैज्ञानिक, पर्यावरणविद् और चिकित्सकों के अनुसार कीटनाशकों से छिड़काव किए गए टमाटर, बैंगन और सेब आदि खाने से किडनी, छाती, स्नायुतंत्र, पाचन अंग और मस्तिष्क पर बुरा असर पड़ने लगा है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि हम कीटनाशकों के मकड़जाल में किस तरह फंसते जा रहे हैं।

चिंता की बात यह है कि विज्ञापनों के मकड़जाल में किसान और उद्योगजगत ही नहीं, उन परिवारों के लोग भी हैं जो स्वयं को तो वैज्ञानिक सोच का कहते हैं, लेकिन जब पानी और आहार की शुद्धता की बात आती है, तो वे इस पर समझौता कर लेते हैं। दिल्ली, मुंबई या अन्य शहरों में कितने ऐसे लोग हैं जो शीतल पेय, बोतलबंद पानी, बोतलबंद दूध, फलों के रस और अन्य तरह की वस्तुओं के पैक पर लिखे निर्देश को पूरी तरह पढ़ते हैं और पढ़कर उसे अमल में भी लाते हैं। आज तो स्थिति यह हो गई है कि परिवार के परिवार कीटनाशकों के असर के कारण कई गम्भीर बीमारियों के चपेट में आ गए हैं।

अब समस्या यह है कि यदि कीटनाशकों का इस्तेमाल न करें तो फसलों और फलों के उत्पादन पर फर्क पड़ता है और यदि करें तो कई समस्याए व रोग बढ़ रहे हैं। फिर बीच का रास्ता क्या है? वैज्ञानिकों के अनुसार देश में इसका समाधान जैविक खेती और जैविक बागवानी है। लेकिन इसे पूरे देश को अपनाने की जरूरत है। जब तक देशभर में जैविक खेती की वरीयता नहीं दी जाएगी, तब तक कीटनाशकों से होने वाली समस्याओं से निजात नहीं पाई जा सकती।

अखिलेश आर्येंदु

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