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राजनीति: खतरा बनता प्लास्टिक कबाड़

आधुनिक युग में मानव की तरक्की में प्लास्टिक ने अमूल्य योगदान दिया है। इसलिए कबाड़ के रूप में जो प्लास्टिक अपशिष्ट बचता है, उसका पुनर्चक्रण करना जरूरी है। यदि भारत में कचरा प्रबंधन सुनियोजित तरीके से हो और कचरे के पुनर्चक्रण उद्योगों की शृंखला खड़ी हो जाए तो इस समस्या का निदान संभव है। इससे रोजगार के नए रास्ते भी खुलेंगे।

Author July 5, 2019 1:42 AM
प्लास्टिक पर्यावरण को काफी नुकसाना पहुंचा रहा है।

प्रमोद भार्गव

यह एक चौंकाने वाला तथ्य है कि हम एक साल में प्लास्टिक के छोटे-छोटे पचास हजार कण खा जाते हैं। माइक्रो प्लास्टिक यानी इंसान द्वारा ईजाद किए प्लास्टिक के छोटे-छोटे टुकड़े इस समय पूरी दुनिया में अकेले ऐसे कण हैं जो धरती, आकाश और पानी सब जगह मौजूद हैं। इनके अनेक रूप हैं। सिंथेटिक कपड़ों से निकले टुकड़े, कान साफ करने की सलाइयों के टुकड़े, कार के टायर और रोजमर्रा में काम आने वाली वस्तुओं से निकले टुकड़े। एक ताजा शोध के मुताबिक, किसी इंसान के शरीर में प्लास्टिक के कितने कण जाएंगे, यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह किस वातावरण में रहता है और क्या खाता है। कनाडा के वैज्ञानिकों ने शोध के दौरान माइक्रो प्लास्टिक की मौजूदगी के बारे में सैकड़ों आंकड़ों का विश्लेषण किया और इसकी तुलना अमेरिकी नागरिकों की खानपान शैली से की। नतीजे में पाया कि एक वयस्क इंसान एक साल में माइक्रो-प्लास्टिक के करीब बावन हजार कण ग्रहण कर लेता है। ये भोजन-पानी के अलावा सांस लेने के जरिए भी शरीर में चले जाते हैं। केवल सांस के जरिए 1.21 लाख माइक्रो प्लास्टिक के कण शरीर में जा सकते हैं। यानी हर दिन बड़ी संख्या में प्लास्टिक मानव शरीर में पहुंच रहा है।

मानव जीवन शैली का अनिवार्य हिस्सा बन चुका प्लास्टिक पर्यावरणीय संकट के साथ मनुष्य के जीवन के लिए बड़ा खतरा बन कर उभरा है। हिमालय से लेकर धरती का हर जलस्रोत इसके प्रभाव से प्रदूषित है। वैज्ञानिकों का तो यहां तक दावा है कि अंतरिक्ष में कबाड़ के रूप में जो करोड़ों टुकड़े इधर-उधर भटक रहे हैं, उनमें बड़ी संख्या प्लास्टिक के कल-पुर्जों की है। समुद्रों पर नए शोधों से सामने आया है कि अकेले आर्कटिक सागर में बारह सौ टन के बीच प्लास्टिक हो सकता है। दुनियाभर के समुद्रों में पचास फीसद कचरा केवल कान की सफाई के लिए इस्तेमाल की जाने वाली कॉटन-ईअर बड का होता है। इन अध्ययनों से पता चला है कि 2050 आते-आते समुद्रों में मछलियों की तुलना में प्लास्टिक कहीं ज्यादा होगा। भारत के समुद्रीय क्षेत्रों में तो प्लास्टिक का इतना अधिक मलबा जमा हो गया है कि समुद्री जीव-जंतुओं के जीवन पर संकट खड़ा होने लगा है।

एक अनुमान के मुताबिक हर साल 31.1 करोड़ टन प्लास्टिक का उत्पादन किया जाता है। यही वजह है कि समूचा ब्रह्मांड प्लास्टिक कचरे की चपेट में है। पेट में पॉलिथिन जमा हो जाने के कारण मरने वाले पशुधन की मौत की खबरें भी आए दिन आती रहती हैं। यह समस्या भारत की ही नहीं, पूरी दुनिया की है। यह बात अलग है कि हमारे यहां ज्यादा और खुलेआम दिखाई देती है। एक तो इसलिए कि स्वच्छता अभियान कई रूपों में चलाए जाने के बावजूद प्लास्टिक की थैलियों में भरा कचरा शहरों, कस्बे और गांवों की बस्तियों के नुक्कड़ों पर जमा मिल जाता है। यही बचा-खुचा कचरा नालियों से होता हुआ नदी, नालों, तालाबों से बहता हुआ समुद्र में पहुंच जाता है। समुद्रों के बिगड़ते पर्यावरण का यह बड़ा कारण है। माना जा रहा है कि समुद्र की तलहटी में पांच खरब प्लास्टिक के टुकड़े जमा हैं। यही वजह है कि व्हेलों और मछलियों के उदर में भी ये टुकड़े पाए जाने लगे हैं। सबसे ज्यादा प्लास्टिक ग्रीनलैंड के पास स्थित समुद्र में मौजूद है। यही टुकड़े मांसाहार और पेयजल के जरिए मनुष्य के पेट में चले जाते हैं।

समुद्र में प्लास्टिक की भयावह मौजूदगी की चौंकाने वाली रिपोर्ट ‘यूके नेशनल रिसोर्स डिफेंस काउंसिल’ ने भी जारी की है। इस रिपोर्ट के मुताबिक हर साल दुनिया भर के सागरों में चौदह लाख टन प्लास्टिक घुल रहा है। सिर्फ इंग्लैंड के आसपास समुद्रों में पचास लाख करोड़ प्लास्टिक के टुकड़े मिले हैं। ये समुद्री सतह को वजनी बना कर इसका तापमान बढ़ा रहे हैं। समुद्र में मौजूद इस प्रदूषण के समाधान की दिशा में पहल करते हुए इंग्लैंड की संसद ने पूरे देश में निजी इस्तेमाल वाले उत्पादों (पर्सनल केयर प्रोडक्ट) के प्रयोग पर प्रतिबंध का प्रस्ताव पारित किया है। इसमें खासतौर से उस कपास-सलाई का जिक्र है, जो कान की सफाई में इस्तेमाल होती है। ताजा अध्ययनों से जो जानकारी सामने आई है, उसमें दावा किया गया है कि दुनिया के समुद्रों में कुल कचरे का पचास फीसद हिस्सा इन्हीं कपास-सलाइयों का है। इंग्लैंड के अलावा न्यूजीलैंड और इटली में भी कपास-सलाई को प्रतिबंधित करने की तैयारी शुरू हो गई है।

प्रदूषण से जुड़े अध्ययन यह तो आगाह कर रहे हैं कि प्लास्टिक कबाड़ समुद्र द्वारा पैदा किया हुआ नहीं है। यह हमने पैदा किया है, जो विभिन्न जल-धाराओं में बहता हुआ नदियों से होता हुआ समुद्रों में पहुंचा है। इसलिए अगर इनमें प्लास्टिक कम करना है तो हमें धरती पर इसका इस्तेमाल कम करना होगा। जल प्रदूषण दरअसल हमारी धरती के ही प्रदूषण का विस्तार है, किंतु यह हमारे जीवन के लिए धरती के प्रदूषण से कहीं ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है। माइक्रो प्लास्टिक को लेकर आई रिपोर्ट की गंभीरता को इस बात से समझा जा सकता है कि अगर कोई इंसान सिर्फ बोतलबंद पानी पीता है तो भी एक साल में उसके शरीर में नब्बे हजार प्लास्टिक के टुकड़े पहुंच सकते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि एक सौ तीस माइक्रोमीटर से छोटे प्लास्टिक के कणों में यह क्षमता है कि वह मानव ऊतकों को विस्थापित करके शरीर के उस हिस्से की प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर कर देता है।

प्लास्टिक के इन टुकड़ों के मनुष्य पर प्रभाव से बचने का प्रमुख उपाय यही है कि उपयोग में लाने के बाद प्लास्टिक को इकट्ठा कर उसे पुनर्चक्रित किया जाए। विश्व आर्थिक संगठन के अनुसार दुनियाभर में जितना प्लास्टिक बनाया जा रहा है, उसमें से केवल चौदह फीसद को पुनर्चक्रित करना संभव हुआ है। भारत सरकार का केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय महानगरों में प्लास्टिक कचरे का पुनर्चक्ररण कर बिजली और र्इंधन बनाने में लगा है। साथ ही प्लास्टिक के चूर्ण से शहरों और गांवों में सड़कें बनाने में सफलता मिल रही है।

आधुनिक युग में मानव की तरक्की में प्लास्टिक ने अमूल्य योगदान दिया है। इसलिए कबाड़ के रूप में जो प्लास्टिक अपशिष्ट बचता है, उसका पुनर्चक्रण करना जरूरी है। यदि भारत में कचरा प्रबंधन सुनियोजित तरीके से हो और कचरे के पुनर्चक्रण उद्योगों की शृंखला खड़ी हो जाए तो इस समस्या का निदान संभव है। इससे रोजगार के नए रास्ते भी खुलेंगे। भारत में जो प्लास्टिक कचरा पैदा होता है, उसमें से चालीस का फीसद पुनर्चक्रण नहीं हो पा रहा है। प्लास्टिक की विलक्षणता यह भी है कि इसे पांच से भी अधिक बार पुनर्चक्रित किया जा सकता है। इस प्रक्रिया के दौरान इससे वैक्टो आॅयल भी सह-उत्पाद के रूप में निकलता है, इसे डीजल वाहनों में र्इंधन के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।

अमेरिका, ब्रिटेन, आॅस्ट्रेलिया और जापान समेत अनेक देश इस कचरे से र्इंधन बना रहे हैं। आॅस्ट्रेलियाई पायलेट रॉसेल ने तोे इसी र्इंधन को विमान में डाल कर सत्रह हजार किलोमीटर की यात्रा करके विश्व-कीर्तिमान स्थापित किया है। इस यात्रा के लिए पांच टन बेकार प्लास्टिक को विशेष तकनीक द्वारा गला कर एक हजार गैलन में तब्दील किया गया। फिर एकल इंजन वाले विमान द्वारा सिडनी से आरंभ हुआ सफर एशिया, मध्य एशिया और यूरोप को नापते हुए छह दिन में लंदन पहुंच कर समाप्त हुआ। भारत में भी प्लास्टिक से र्इंधन बनाने का सिलसिला शुरू हो गया है। लेकिन अभी प्रारंभिक अवस्था में है।

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