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राजनीति: बचाना होगा पहाड़ों को

अब दुर्गम पहाड़ियों में पीढ़ियों से रहते आ रहे वहां के निवासी भी स्थायी वास से कतराने लगे हैं।

Author नई दिल्ली | Updated: January 24, 2020 12:52 AM
जैव विविधता के सर्वाधिक संकटग्रस्त आधे क्षेत्र पहाड़ों में ही हैं।

अंतरराष्ट्रीय पर्वत वर्ष मनाने की शुरुआत 11 दिसंबर, 2002 को न्यूयार्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय से की गई थी। साल समाप्त होते-होते 20 दिसंबर 2002 को संयुक्त राष्ट्र की आम सभा से यह भी प्रस्ताव पारित हो गया था कि 11 दिसंबर से हर साल अंतरराष्ट्रीय पर्वत दिवस मनाया जाएगा। इसके बाद अगले साल यानी 2003 में पहला अंतरराष्ट्रीय पर्वत दिवस मनाया गया था। इससे पहले पूरे विश्व में पर्वतों और पर्वतवासियों के प्रति चेतना जगाने के लिए 1992 में संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण एवं विकास के रियो सम्मेलन में पहली बार यह महत्त्वपूर्ण प्रस्तावना की गई थी कि भविष्य में पर्वतों का विकास सतत विकास की नीति-रीति के अंतर्गत हो। पर्वतों की सहज भंगुर संवेदनशील पारिस्थिकीय प्रणालियों और पर्वतीय परिवेश के निवासियों की सामाजिक जीवनयापन की स्थितियों को केंद्र में रख कर ऐसा टिकाऊ विकास कैसे किया जाए, इसका विवरण सतत विकास के एजेंडा-21 के तेरहवें अध्याय में वर्णित है, जो आज भी प्रासंगिक है।

हर साल अंतरराष्ट्रीय पर्वत दिवस पर जल और खाद्य आपूर्ति में पर्वतों की भूमिका की स्वाभाविक चर्चा के साथ-साथ यह भी रेखांकित किया जाता है कि विश्व की बारह फीसद आबादी को पर्वतों से सीधा जीवन समर्थक आधार मिलता है, पर्वतीय सामग्रियों, संसाधनों और सेवाओं से दुनिया की लगभग आधी आबादी लाभान्वित होती है और पर्वत समूह विश्व की जल मीनारें होने के साथ-साथ वायु चक्रों, जल व मृदा चक्रों को भी प्रभावित करते हैं। अत: जलवायु परिवर्तन का जो असर पहाड़ों में आएगा, उससे पर्वतों में बसने वाले एक अरब से ज्यादा लोग तो प्रभावित होंगे ही, दुनिया की आधी जनसंख्या भी इसके असर से अछूती नहीं रहेगी। उल्लेखनीय यह भी है कि विश्व को जलवायु बदलाव और उसके प्रभावों के शुरुआती संकेत विश्व के पर्वतों से ही मिले हैं।

पिछले साल 31 अक्तूबर को उच्च पर्वतीय शिखर सम्मेलन के अंत में विश्व मौसम विज्ञान संगठन का भी बयान था कि जलवायु परिवर्तन और विकास के कारण उच्च पर्वतीय इलाकों पर गहराते संकटों को टालने के लिए तुरंत ही वैश्विक कार्यवाही की आवश्यकता है। यहां संकटों का मुख्य संदर्भ पहाड़ों में पिघलती बर्फ और अन्य जल संबंधी खतरों से है। सभी अंतरराष्ट्रीय पर्वत दिवसों पर सार रूप में राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और वैश्विक मंचों से यही आवाज उठती रही है कि पहाड़ हमारे लिए जरूरी हैं और उन पर तुरंत आवश्यक ध्यान दिए जाने की जरूरत है। अगर पर्वत जरूरी हैं तो उन्हें बचाए रखने के लिए उनकी देखरेख और संरक्षण करना भी हमारी जिम्मेदारी है। दुनिया में पर्वतीय क्षेत्रों में करीब एक अरब लोग रहते हैं। जैव विविधता के सर्वाधिक संकटग्रस्त आधे क्षेत्र पहाड़ों में ही हैं। पहाड़ों का टूटना, दरकना, जलस्रोतों का सूखना, हिमनदों का पिघलना ऐसी मानवजनित गलत विकास नीतियों के साथ-साथ अतिरेकी मौसमी घटनाओं के परिणाम हैं।

अंतरराष्ट्रीय पर्वत दिवसों पर हर साल एक मुद्दा विशेष होता है। साल 2017 का विषय पर्वतीय यथार्थों को व्यक्त करता हुआ था: दबाव में पर्वत जलवायु, भुखमरी और पलायन। इसके बाद 2018 का सूत्र विचार पहाड़ों की अपरिहार्यता पर केंद्रित था। अर्थात पहाड़ों का होना महत्त्व रखता है। इस विषय के माध्यम से युवाओं को आपदा जोखिम कम करने, जैव विविधता, जल उपलब्धता, खाद्यान्न और जनजातीय लोगों के लिए पर्वतों का महत्त्व बताना था। पिछले साल यानी 2019 के अंतरराष्ट्रीय पर्वत दिवस का विषय सूत्र- ‘युवाओं के लिए पर्वत का महत्त्व’ रखा गया। निस्संदेह युवा अपने लिए पर्वतों के महत्त्व को जान कर उन पर्वतीय संसाधनों के संरक्षक की जिम्मेदारी निभाने के लिए भी संवेदनशील बन सकते हैं जो जलवायु परिवर्तन के कारण संकट में हैं। परंतु परिवारों के पलायन के साथ युवाओं का पहाड़ों में टिका रहना भी आसान नहीं रह गया है।

अब दुर्गम पहाड़ियों में पीढ़ियों से रहते आ रहे वहां के निवासी भी स्थायी वास से कतराने लगे हैं। जैव विविधता के सर्वाधिक संकटग्रस्त आधे क्षेत्र पहाड़ों में ही हैं। युवा पलायन के कारण स्थानीय ज्ञान धरोहरों में अब अनुभवों और संवेदनाओं से नया जुड़ाव मुश्किल होता चला जाएगा। किंतु जानकारी, ज्ञान में वृद्धि पीढ़ियों के आवास, अधिवास और लगाव से होती है। स्थानीय लोगों को जैव विविधता का ज्ञान, मार्गों का ज्ञान, आपदाओं का ज्ञान, उनसे बचने या उनको झेल कर उबरने का ज्ञान, औषधियों का ज्ञान, स्थानीय खेती, पशुपालन, आवास निर्माण, औषधियों का ज्ञान जो पीढ़ियों से समृद्ध होता आ रहा है, जैसे अनुभव होते हैं जो उन्हें पहाड़ के कठिन जीवन से संघर्ष करना सिखाते हैं। इसी के बूते दुर्गम पहाड़ी इलाकों में रहने वाले लोग बाहरी दुनिया से लगभग अलग-थलग पड़ जाने के बाद भी आपदाओं से निपटने और उनसे उबरने की ताकत रखते हैं।

वर्तमान पर्वतीय यथार्थ युवाओं के लिए कितना विडंबना भरा है, इसका आभास पहाड़ों पर शोध करने वाली संस्था- आइसीमोड के तत्कालीन महानिदेशक के 2018 के अंतरराष्ट्रीय पर्वत दिवस पर दिए गए इस संदेश से मिल जाता है कि ‘पर्वत पानी के लिए जरूरी हैं, किंतु ग्लेशियर पीछे खिसक रहे हैं और सोते-जलस्रोत सूख रहे हैं। पहाड़ पर्यटन के लिए महत्त्वपूर्ण हैं, पर अधिकांश समुदाय उनसे लाभान्वित नहीं होते हैं। वे आपदाओं के जोखिम कम करने में प्रासंगिक हैं, पर स्वयं अनुपात से कहीं ज्यादा जोखिमों का सामना करते हैं। वे भोजन, खाद्यान्न के लिए महत्त्वपूर्ण हैं, पर उनमें भूमंडल के कुछ सबसे ज्यादा भूखे लोगों का रहना होता है। वे जनजातीय लोगों के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण हैं, किंतु उनमें से अधिकांश को वहां हाशिये में डाल दिया गया है। वे जैव विविधता के लिए महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन वहां उनकी कई जातियां, प्रजातियां और उनके अधिवास जोखिम में हैं। वे युवाओं के लिए महत्त्वपूर्ण है, किन्तु कई नौजवान अपने पर्वतीय गांवों को छोड़ कर शहरों की भाग रहे हैं।’

पर्वतीय क्षेत्रों में जो लोग अब भी रह रहे हैं, उनका एक बड़ा तबका सबसे ज्यादा गरीबी की मार झेलने वाला है। ये लोग गंभीर खाद्य असुरक्षा में जीने को मजबूर हैं। वन्य जीव और मानव के बीच के टकराव से ग्रामवासियों के पशुपालन, खेती को गंभीर खतरा खड़ा हो गया है और जंगली जानवर का खतरा हमेशा मंडराता रहता है। फिर प्राकृतिक आपदाएं भी पीछा नहीं छोड़तीं। गर्मी, बारिश और ठंड में बर्फबारी से भूस्खलन और हिमखंडों का गिरना हमेशा का संकट बन गया है। ऐसे में स्वयं पर्वत भी क्षरित व संकट ग्रस्त हो रहे हैं।

जमीनी यथार्थ यह है कि पर्वतों में भौगोलिक कठिनाइयों के बीच भी पीढ़ियों से पहाड़ों में रहने वाले परिवार भी अब गहराते पर्यावरणीय कुप्रभावों और जलवायु परिवर्तन कीआघातजनित समस्याओं से बचने के आसान तरीके खोजने में लगे हैं। इसके लिए सबसे आसान विकल्प अपने-अपने गांव छोड़ कर दूसरे सुरक्षित ठिकानों की तलाश में पलायन है। ऐसे में 2019 में सबसे ज्यादा ध्यान पर्वतों में युवाओं के लिए बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी सुविधाओं पर दिया जाना चाहिए, ताकि लोग पलायन को मजबूर न हों। इसके अलावा पर्वतीय क्षेत्रों के विकास के लिए दूरगामी रणनीति बनाने की जरूरत है। पर्यटन का विकास हो, लेकिन प्रकृति और पर्यावरण की कीमत पर नहीं, इसका खासतौर से खयाल रखना होगा।

पहाड़ी क्षेत्रों में ऐसे रोजगार पैदा करने की जरूरत है जो कृषि से इतर हों और अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाएं। इसके लिए युवाओं सहित हर वर्ग की भागीदारी को बढ़ाने की जरूरत है, ताकि लोग पलायन के बारे में सोचने को मजबूर न हों। लोगों में इस चेतना का विकास करना होगा कि पहाड़ों को बचाना जरूरी है, पहाड़ बचेंगे, तभी प्रकृति भी बच पाएगी और दुनिया आज जिन प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर रही है, उन्हें रोकने में मदद मिल सकेगी।

वीरेंद्र कुमार पैन्यूली

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