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राजनीति: अमीरी-गरीबी की बढ़ती खाई

देश में आर्थिक असमानता दूर करने के लिए कमजोर वर्ग के सशक्तिकरण के लिए अधिक प्रयास करने होंगे।

Author नई दिल्ली | Published on: February 3, 2020 12:20 AM
इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि देश में बढ़ती आर्थिक असमानता को कम करना सरकारों के लिए सबसे बड़ी आर्थिक-सामाजिक चुनौती है।

हाल में मानवाधिकारों की पैरवी करने वाले संगठन आॅक्सफेम ने विश्व आर्थिक मंच की बैठक से पहले आर्थिक असमानता पर एक रिपोर्ट जारी की। इसमें बताया गया है कि दुनिया के साथ-साथ भारत में भी आर्थिक असमानता बढ़ी है। भारत में तिरसठ अरबपतियों के पास देश के आम बजट की राशि से भी अधिक संपत्ति है। इतना ही नहीं, इन अमीरों के पास सत्तर फीसद गरीब आबादी यानी करीब पनचानवे करोड़ लोगों की तुलना में चार गुना से ज्यादा धन-संपत्ति है।

इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि देश में बढ़ती आर्थिक असमानता को कम करना सरकारों के लिए सबसे बड़ी आर्थिक-सामाजिक चुनौती है। ऐसे में इस समय देश और पूरी दुनिया में, भारत में घटती हुई गरीबी के बावजूद बढ़ती आर्थिक असमानता से संबंधित संयुक्त राष्ट्र की गरीबी सूचकांक रिपोर्ट-2019 को लेकर काफी चर्चा है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि हालांकि भारत में गरीबी घट रही है, पर भारत अभी भी दुनिया में सबसे अधिक आर्थिक असमानता वाले देशों में शामिल है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2006-2016 के बीच दस विकासशील देशों के समूह में भारत ने सबसे तेजी से गरीबी कम करने में सफलता पाई है। इन दस सालों में देश के सत्ताईस करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर आए हैं। इस सूचकांक के आठ पैमानों पर गरीबी को आंका गया है, जिनमें पोषण की कमी, शिशु मृत्यु दर में कमी, रसोई गैस के इस्तेमाल, स्वच्छता, पीने का पानी, बिजली की कमी, घरों की कमी तथा संपत्तियों का अभाव को शामिल किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के कुल गरीबों में से करीब आधे गरीब यानी उन्नीस करोड़ साठ लाख लोग देश के चार राज्यों बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश में रहते हैं।

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में जहां भारत में गरीबी तेजी से घटने की बात कही गई है, वहीं आॅक्सफेम इंडिया की आर्थिक असमानता रिपोर्ट-2019 में कहा गया है कि भारत में 1991 से शुरू हुए उदारीकरण के बाद आर्थिक असमानता और अधिक भयावह होती जा रही है। सबसे चौंकाने वाला तथ्य तो यह है कि भारत में अरबपतियों की कुल संपत्ति देश की जीडीपी की पंद्रह फीसद के बराबर हो गई है। जबकि पांच वर्ष पहले यह दस फीसद थी। इसी तरह वैश्विक वित्तीय सेवा कंपनी क्रेडिट सुइस के एक ताजा अध्ययन में कहा गया है कि दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ रही भारतीय अर्थ व्यवस्था में अमीर-गरीब के बीच खाई बढ़ती जा रही है। अति धनाढ्य लोगों की संख्या के हिसाब से भारत का दुनिया में छठा स्थान है। भले भारत में पिछले एक दशक में गरीबी कम हुई है, लेकिन अभी भी आर्थिक और सामाजिक असमानता के विभिन्न मापदंडों में पीछे होने के कारण भारत के करोड़ों लोग खुशहाली में पीछे हैं। खुशहाली को लेकर तैयार की गई वैश्विक रिपोर्ट बता रही है कि आर्थिक-सामाजिक खुशहाली के मुद्दे पर भारत बहुत पीछे है और भारत में आर्थिक असमानता का भयावह चेहरा है।

भारत में बढ़ती आर्थिक असमानता को दूर करने के लिए देश और दुनिया के अर्थ विशेषज्ञ दो तरह के सुझाव दे रहे हैं। एक गरीबों की मुठ्ठियों तक कारपोरेट मदद कारगर रूप से पहुंचाई जाए, और दूसरा यह कि गरीबों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए गरीबों के कल्याण के लिए बनाई गई सरकारी योजनाओं को कारगर तरीके से लागू किया जाए। हाल ही में प्रकाशित ‘भारत में कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व’ (सीएसआर) रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2018-19 में सीएसआर के तहत बारह हजार करोड़ रुपए से ज्यादा राशि खर्च की गई। यह खर्च 2017-18 में 10128 करोड़ रुपए, वर्ष 2016-17 में 9064 करोड़ रुपए वर्ष 2015-16 में 8489 करोड़ रुपए और वर्ष 2014-15 में 6552 करोड़ रुपए थी। अर्थ विशेषज्ञों का कहना है कि जब भारत में सीएसआर व्यय रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया है, तब देश के सामाजिक कल्याण के मद्देनजर सीएसआर के रूप में कारपोरेट मदद गरीबों तक पहुंचनी चाहिए।

भारत में सीएसआर खर्च हर साल बढ़ता जा रहा है। लेकिन साथ ही कुछ चिंताएं भी हैं। एक, भारत में गरीबी, भुखमरी और कुपोषण से पीड़ित करोड़ों लोगों तक सीएसआर की राशि नहीं के बराबर पहुंच रही है। दो, बड़ी संख्या में कंपनियां सीएसआर के उद्देश्य के अनुरूप खर्च नहीं कर रही हैं। तीन, कंपनियां सीएसआर पर बड़ा खर्च महाराष्ट्र और गुजरात जैसे विकसित प्रदेशों में ही कर रही हैं। दूसरी ओर बिहार, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मेघालय आदि राज्यों में सीएसआर खर्च बहुत कम है। चूंकि आर्थिक असमानता इन सभी राज्यों में सर्वाधिक है, अतएव इन राज्यों तक सीएसआर खर्च बढ़ा कर आर्थिक असमानता में कमी आई जा सकती है।

उल्लेखनीय है कि पांच सौ करोड़ रुपए या इससे ज्यादा की पूंजी या पांच करोड़ रुपए या इससे ज्यादा मुनाफे वाली कंपनियों को पिछले तीन साल के अपने औसत मुनाफे का दो फीसद हिस्सा हर साल सीएसआर के तहत उन निर्धारित गतिविधियों पर खर्च करना होता है, जो समाज के पिछड़े या वंचित लोगों के कल्याण के लिए जरूरी हों। सीएसआर के तहत इन कंपनियों को भूख, गरीबी और कुपोषण पर नियंत्रण, कौशल प्रशिक्षण, शिक्षा को बढ़ावा, पर्यावरण संरक्षण, खेलकूद प्रोत्साहन, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, तंग बस्तियों के विकास आदि पर खर्च करना होता है। सीएसआर किसी तरह का दान नहीं है। दरअसल, यह सामाजिक जिम्मेदारियों के साथ कारोबार करने की व्यवस्था है। कारपोरेट जगत की जिम्मेदारी है कि वह स्थानीय समुदाय और समाज के विभिन्न वर्गों के बेहतर जीवन के लिए सकारात्मक भूमिका निभाए। खासतौर से देश में अभी भी भूख और कुपोषण से लड़ने की जो चुनौती है, उससे निपटने के लिए तात्कालिक रूप से सीएसआर व्यय राहतकारी भूमिका निभा सकता है।

देश में आर्थिक असमानता दूर करने के लिए कमजोर वर्ग के सशक्तिकरण के लिए अधिक प्रयास करने होंगे। खासतौर से खेती और किसानों को लाभान्वित करने पर विशेष ध्यान देना होगा। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) और प्रधानमंत्री कृषि सम्मान निधि (पीएम किसान) के लिए अतिरिक्त धन आवंटित करना होगा। निश्चित रूप से कृषि क्षेत्र की जरूरतों को पूरा करने के लिए सरकार को उच्च प्राथमिकता देना होगी। ऐसे नए उद्यमों को प्रोत्साहन देना होगा जो कृषि उत्पादों को लाभदायक कीमत दिलाने में मदद करने के साथ उपभोक्ताओं को ये उत्पाद मुनासिब दाम पर पहुंचाने में मदद करें।

उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार आर्थिक असमानता रिपोर्ट और संयुक्त राष्ट्र की गरीबी रिपोर्ट को ध्यान में रखते हुए आर्थिक असमानता कम करने की दिशा में तेजी से काम करेगी। इसके लिए जरूरी है कि गरीबों के लिए बनी तमाम कल्याणकारी योजनाओं को कारगर तरीके से लागू किया जाए, सीएसआर खर्च की राशि गरीबों तक पहुंचे। तभी भारत दुनिया के गरीबी सूचकांक से बाहर निकल पाएगा। गरीबी मिटेगी और आमद के साधन बढ़ेंगे तो आर्थिक असमानता भी दूर होगी। हालांकि यह कोई आसान और एक दिन का काम नहीं है, इसमें सालों लगेंगे। लेकिन आर्थिक असमानता को खत्म करना मुश्किल जरूर है, पर कोई असंभव काम नहीं है। इसके लिए सरकारों को ईमानदारी से काम करने और राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाने की जरूरत है। दुनिया के कई देशों ने इसमें कामयाबी हासिल की भी है।

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