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राजनीति: मतभेदों में उलझता जी-7

जी-7 समूह के देश दुनिया में पूंजीवाद का प्रतीक हैं और इसमें रूस का होना या न होना भी बड़ा मुद्दा रहा है जो सदस्य देशों के बीच विरोधाभास को बढ़ाता रहा है। इस समूह के देशों की आपसी असहमतियों का आक्रामक कूटनीतिक प्रदर्शन भी चुनौतीपूर्ण रहा है। क्रीमिया पर रूस के आधिपत्य के बाद लोकतांत्रिक मूल्यों के नाम पर वर्ष 2014 में रूस को जिस तरह से समूह से बाहर का रास्ता दिखाया गया था, उसे लेकर भी आपसी मतभेद सामने आते रहे हैं।

Author नई दिल्ली | Published on: August 29, 2019 1:52 AM
जी 7 शिखर सम्मेलन में मोदी-ट्रंप की भेंट हुई।

ब्रह्मदीप अलूने

वैश्विक आर्थिक मुद्दों पर विचार और परामर्श के विकसित देशों के सबसे बड़े संगठन जी-7 का फ्रांस में शिखर सम्मेलन ऐसे समय पर आयोजित हुआ जब अमेरिका की रूस से कूटनीतिक तकरार और चीन से आर्थिक तनाव चरम पर है। दुनिया के विकसित और अग्रणी राष्ट्रों के इस समूह में जहां एक ओर आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, कूटनीतिक और राष्ट्रीय नीतियों को लेकर गहरे मतभेद सामने आ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर युद्ध, राष्ट्रवाद, दक्षिणपंथ के उभार, मुक्त बाजार के साथ अप्रवासन का विरोध और परमाणु हथियारों का जखीरा जुटाने की होड़ के बीच शांति और समग्र विकास के प्रति प्रतिबद्धता में गहरा अंतर्द्वंद दिखाई साफ नजर आ रहा है।

दरअसल, अमेरिका, फ्रांस, इटली, कनाडा, जर्मनी, जापान और इंग्लैंड जी-7 के सदस्य राष्ट्र हैं जो स्वतंत्रता, समानता, लोकतंत्र और मानवाधिकारों की रक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का इजहार करते रहे हैं। उच्च आय और विकास के उच्च पैमाने स्थापित करने वाले जी-7 के राष्ट्राध्यक्ष हर साल अलग-अलग देशों में शिखर सम्मेलन आयोजित करते हैं और आर्थिक गतिविधियों के साथ ही जलवायु परिवर्तन, गरीबी, असमानता, सुरक्षा, पर्यावरणीय संकट जैसे सामाजिक सरोकारों और वैश्विक समस्याओं से जुड़े विषयों पर भी विमर्श करते हैं। इन सबके बीच यह भी दिलचस्प है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उभार के बाद महाशक्ति अमेरिका की भूमिका वैश्विक हितों से ज्यादा अमेरिकीवाद पर केंद्रित हो गई है और इसके प्रभाव से जी-7 भी अछूता नहीं है। जी-7 समूह के देश दुनिया में पूंजीवाद का प्रतीक हैं और इसमें रूस का होना या न होना भी बड़ा मुद्दा रहा है जो सदस्य देशों के बीच विरोधाभास को बढ़ाता रहा है। इस समूह के देशों की आपसी असहमतियों का आक्रामक कूटनीतिक प्रदर्शन भी चुनौतीपूर्ण रहा है। क्रीमिया पर रूस के आधिपत्य के बाद लोकतांत्रिक मूल्यों के नाम पर वर्ष 2014 में रूस को जिस तरह से समूह से बाहर का रास्ता दिखाया गया था, उसे लेकर भी आपसी मतभेद सामने आते रहे हैं। अब ट्रंप ने जी-7 को रूस के बिना अधूरा बताया है, वहीं अन्य देश ट्रंप की नीतियों को लेकर सहज नहीं लग रहे।

जी-7 दुनिया के औद्योगिक देशों का समूह है लेकिन इन देशों में से अधिकतर अपनी बड़ी अर्थव्यवस्था के मुकाबले वैश्विक अर्थव्यवस्था में बहुत कम भागीदारी कर रहे हैं। भारत और चीन की चुनौती इस समूह के सामने बरकरार है। यूरोपीय संघ का सबसे बड़ा देश जर्मनी है और उसका मुसलिम शरणार्थियों के प्रति उदार रवैया ट्रंप के आक्रामक राष्ट्रवाद के विरोध में नजर आता है। जर्मनी के बड़े राजनेता जिकमार गैबरियल ट्रंप को शांति और समृद्धि के लिए खतरा बता चुके हैं। हाल में ट्रंप ने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की आर्थिक नीतियों की कड़ी आलोचना करते हुए आरोप लगाया था कि फ्रांस गूगल जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर कर लगाने की तैयारी कर रहा है। ट्रंप प्रशासन ने कहा था कि फ्रांस की ओर से लगाया गया कर अन्यायपूर्ण ढंग से अमेरिकी टैक कंपनियों को नुकसान पहुंचाने वाला है। वहीं, फ्रांस का कहना था कि अन्य देशों की कंपनियां उनके यहां या तो कॉर्पोरेट कर देती ही नहीं हैं या देती भी हैं तो बहुत ही कम। करों को लेकर असहमति से उत्तेजित ट्रंप ने वाईन को लेकर फ्रांस की आलोचना करने से गुरेज नहीं किया और धमकी दी की उनका देश फ्रेंच वाइन के आयात पर शुल्क लगाने पर विचार कर रहा है। अमेरिका वाइन की खपत और आयात करने वाला दुनिया का सबसे बड़ा देश है। वह जिन देशों से वाइन आयात करता है, उनमें फ्रांस भी शामिल है।

मध्य पूर्व को लेकर भी यूरोप और अमेरिका के मतभेद जगजाहिर हैं। ईरान संकट पर फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों चाह रहे हैं कि परमाणु करार टूटे नहीं। मैक्रों को जर्मनी और ब्रिटेन का भी समर्थन हासिल है। ये देश चाहते हैं कि ईरान और अमेरिका के बीच रिश्ते सुधरें जिससे इलाके में तनाव कम हो। ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध से जापान और फ्रांस जैसे देश प्रभावित हुए हैं। फ्रांस चाहता है कि ईरान पर लगी अमेरिकी पाबंदी में ढील दी जाए जिससे तेल आयात का रास्ता साफ हो। इसके अलावा ब्रेग्जिट को लेकर ब्रिटेन और अमेरिका के संबंध खराब हो चुके हैं। ट्रंप की बयानबाजी ने ब्रिटेन की आंतरिक राजनीति को प्रभावित किया है। ट्रंप ने ब्रिटेन से व्यापार को लेकर जहां बातचीत की बात कही, वहीं हाल में ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने कहा है कि अगर अमेरिका ब्रिटेन के साथ व्यापार सौदा चाहता है तो उसे ब्रिटिश व्यापार पर से प्रतिबंध हटाना होगा। जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान जॉनसन ने स्वीकार किया कि अमेरिका में ब्रिटिश व्यवसायों के लिए बहुत बाधाएं हैं। ब्रिटेन की कंपनियों के लिए अमेरिकी बाजार में बड़े पैमाने पर अवसर की संभावनाएं देखते हुए जॉनसन अमेरिकी नीतियों में सुधार के हिमायती है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि रक्षा क्षेत्र में यूरोप में सबसे ज्यादा खर्च करने वाले ब्रिटेन ने अमेरिका समर्थित नाटो को हमेशा समर्थन दिया है। ब्रिटेन में कई अमेरिकी सैन्य अड्डे बने हुए हैं और दोनों देशों की सेना गृह युद्ध और आतंकवाद से प्रभावित कई देशों में सैनिक कारर्वाई में साझीदार भी रही है। इसके बाद भी आर्थिक हितों को लेकर दोनों देश आमने-सामने हैं। जाहिर है, न्यूयार्क और लंदन दुनिया के दो बड़े वित्तीय केंद्र भले हों लेकिन अमेरिका और ब्रिटेन के बीच व्यापार में सहयोग का भविष्य इतना आसान नहीं दिखता।

यूरोप की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था इटली के चीन से रिश्ते भी अमेरिका को नागवार गुजर रहे हैं। इस साल मार्च में बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट को लेकर इटली और चीन के बीच बंदरगाह, पुल और बड़े बिजली संयंत्र लगाने को लेकर हुए समझौते को भी ट्रंप के लिए झटका माना गया। रोम में आयोजित एक समारोह में प्रधानमंत्री गिउसेप कोंटे और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मौजूदगी में दोनों देशों के अधिकारियों ने उनतीस अलग-अलग समझौतों पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते के साथ इटली बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट से जुड़ने वाला जी-7 समूह का पहला देश बन गया। चीन की इस परियोजना से अमेरिका ने दूरी बना रखी है। जहां तक जापान का सवाल है, अमेरिका और जापान के बीच व्यापारिक टकराव देखने को मिलता रहा है। येन और डॉलर की प्रतिद्वंद्विता दोनों देशों के आपसी संबंधों को चुनौतीपूर्ण बना रही है। इस साल ट्रंप ने जापान की यात्रा कर यह दावा किया था कि हम अमेरिका के निर्यात की बाधाएं और व्यापार असंतुलन को दूर करना चाहते हैं और हमारे संबंधों में पारस्परिकता सुनिश्चित करना चाहते हैं। ट्रंप ऊंची कर दरों की वजह से अमेरिका को होने वाले अरबों डालर के नुकसान के लिए जापान की आलोचना कर चुके हैं। इसी तरह जी-7 के एक और बड़े देश कनाडा के साथ भी अमेरिकी संबंध बद से बदतर देखे गए हैं। पिछले साल ट्रंप ने कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो को ‘बेईमान और कमजोर’ तक कह दिया था।

बहरहाल दुनिया में अमेरिका की अर्थव्यवस्था का महत्त्व बरकरार है और उसके सहयोग के बिना साझा हितों की कल्पना नहीं की जा सकती। जाहिर है, ट्रंप को नियंत्रित और संतुलित रख ही जी-7 अपने उद्देश्यों में कामयाब हो सकता है लेकिन यह इतना आसान नहीं है। जी-7 के अन्य देश अमेरिका से उदार नीति की अपेक्षा करते हैं, जबकि ट्रंप ‘अमेरिकी फर्स्ट’ के लिए कृत संकल्पित हैं।

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