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राजनीति: बेहाल किसान के सवाल

आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि देश में कृषि मजदूरों की संख्या बढ़ी है। खेती करने वाले किसान ही खेतिहर मजदूर बन रहे हैं। इस स्थिति के लिए सिर्फ फसलों का उचित मूल्य न मिलना एकमात्र कारण नहीं है। इसके लिए विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) के नाम पर कृषि योग्य जमीन का अधिग्रहण, सिंचाई एवं उर्वरक की अनुपलब्धता और बिजली का अभाव भी है।

Author July 4, 2019 1:30 AM
बुंदेलखंड के चित्रकूट संभाग में किसानों पर 60.3 करोड़ रुपये बकाया राशि। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

अरविंद कुमार सिंह

कृषि क्षेत्र के विकास के लिए केंद्र सरकार ने आने वाले पांच वर्षों में पच्चीस लाख करोड़ रुपए के निवेश का खाका तैयार कर लिया है। सरकार की मंशा इस निवेश के जरिए सिंचाई के साधन, मंडियों की स्थापना, पोल्ट्री, डेयरी व अन्य उत्पादों के कोल्ड स्टोरेज, ढुलाई और मंडी के ढांचे को मजबूत करना है। अगर यह योजना मूर्त रूप लेती है तो निस्संदेह किसानों की आमद बढ़ेगी और कृषि में नुकसान का जोखिम कम होगा। यह तथ्य है कि देश में कृषि और किसानों की हालत बदतर है और कृषि में ढांचागत सुधार की गति सुस्त होने से कृषि कार्य घाटे का सौदा बना हुआ है। कृषि और किसानों की हालत तभी सुधरेगी जब बुनियादी सुविधाओं में निवेश हो और हर खेत को पानी मिले। इसके अलावा कानूनी सुधार में भूमि पट्टेदारी कानून, ठेके पर खेती, बाजार सुधार और आवश्यक वस्तु अधिनियम में बदलाव जैसे कदम उठाए जाएं। इसके अलावा कृषि उपज के रखरखाव, प्रोसेसिंग और लाभकारी मूल्य दिलाने की दिशा में ठोस पहल हो।

किसानों की आमद बढ़ाने और उन्हें हर तरह के जोखिम से बचाने की दिशा में सरकार ने काम शुरू कर दिया है। ग्रामीण भंडारण योजना के तहत किसानों को उनके गांव के आसपास ही भंडारण की सुविधा उपलब्ध कराने की योजना है। कृषि के अन्य क्षेत्रों को सहकारिता से जोड़ने के लिए दस हजार नए किसान उत्पाद संघ बनाने का लक्ष्य तय किया है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के तहत साढ़े चौदह करोड़ किसानों के खाते में छह हजार रुपए जमा कराए जा रहे हैं। पिछले साल केंद्र सरकार ने खरीफ फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) लागत के मुकाबले डेढ़ गुना कर दिया था। इस एमएसपी में मजदूरी, बैलों अथवा मशीनों पर आने वाला खर्च, पट्टे पर ली गई जमीन का किराया, बीज, खाद और सिंचाई खर्च भी जोड़ा गया। लेकिन यहां समझना होगा कि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि का फायदा तभी मिलेगा जब उनकी फसल बिक्री के लिए सरकारी क्रय केंद्रों तक पहुंच पाएगी और सरकार ईमानदारी से इसे खरीदेगी। अभी तक के आंकड़े बताते हैं कि किसान अपनी कुल फसल का सरकारी क्रय केंद्रों पर सिर्फ पच्चीस से तीस फीसद बेच पाता है और बाकी फसल औने-पौने दामों में गांव-कस्बों के व्यापारियों को बेचने को मजबूर होता है।

सरकार ने अनाज भंडारण की क्षमता पूरी तरह विकसित नहीं की है। ऐसे में सरकार के लिए किसानों की संपूर्ण फसल को खरीदना आसान भी नहीं है। सरकारी भंडारण गृहों की एक निश्चित क्षमता है। इसलिए आवश्यक है कि सरकार भंडारण क्षमता में वृद्धि करे। स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट में भी किसानों की दशा सुधारने के लिए कुछ इसी तरह के उपाय सुझाए गए हैं। यह रिपोर्ट तेरह साल पहले यानी 2006 में आई थी। इसमें कहा गया है कि किसानों के लिए न्यूनतम शुद्ध आय सुनिश्चित करते हुए उनकी आय में वृद्धि को कृषि की प्रगति का मापदंड बनाया जाए। ग्रामीण भारत में समुदाय आधारित खाद्य, जल और ऊर्जा सुरक्षा व्यवस्था को विकसित किया जाए। कृषि पाठ्यक्रम और शिक्षण पद्धतियों को पुनर्गठित किया जाए। कृषक परिवारों के लिए अतिरिक्त रोजगार और आय जुटाने के लिए कृषि को छोटे-छोटे कुटीर उद्योगों से जोड़ा जाए। सरकार को इन सुझावों पर ईमानदारी से विचार करते हुए उन्हें लागू करना होगा।

किसानों की और भी कई बड़ी मांगें हैं। सबसे बड़ी तो मांग कर्जमाफी की है। आंकड़ों पर गौर करें तो देश के नौ करोड़ किसान परिवारों में से बावन फीसद कर्ज में डूबे हैं। हर किसान पर औसतन सैंतालीस हजार रुपए कर्ज है। आंध्रप्रदेश में तिरानवे फीसद, उत्तर प्रदेश में चवालीस फीसद, बिहार में बयालीस फीसद, झारखंड में अट्ठाईस फीसद, हरियाणा में बयालीस फीसद, पंजाब में तिरपन फीसद और पश्चिम बंगाल में साढ़े इक्यावन फीसद किसान परिवार कर्ज में डूबे हैं। किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य न मिलने के कारण ही उनकी दशा दयनीय है और वे किसान से मजदूर बनने को विवश हैं। एक आंकड़े के मुताबिक 2001 में देश में बारह करोड़ तिहत्तर लाख किसान थे, जिनकी संख्या आज घट कर ग्यारह करोड़ से भी कम रह गई है। माना जा रहा है कि प्रकृति पर आधारित कृषि, देश के विभिन्न हिस्सों में बाढ़ और सूखे का प्रकोप, प्राकृतिक आपदा से फसलों की तबाही, उपज का उचित मूल्य न मिलना और कर्ज के बोझ के कारण ही किसान खेती छोड़ने को मजबूर हैं।

आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि देश में कृषि मजदूरों की संख्या बढ़ी है। खेती करने वाले किसान ही खेतिहर मजदूर बन रहे हैं। इस स्थिति के लिए सिर्फ फसलों का उचित मूल्य न मिलना एकमात्र कारण नहीं है। इसके लिए विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) के नाम पर कृषि योग्य जमीन का अधिग्रहण, सिंचाई एवं उर्वरक की अनुपलब्धता और बिजली का अभाव भी है। लेकिन अच्छी बात यह है कि केंद्र सरकार उर्वरकों की प्रचुर उपलब्धता सुनिश्चित करने के साथ-साथ सिंचाई और पर्याप्त बिजली मिले, इस पर भी काम कर रही है। एक आंकड़े के मुताबिक सेज के नाम पर देश में 1990 से 2005 के बीच बीस लाख हेक्टेयर कृषि भूमि कम हुई है। इकॉनामिक सर्वे आॅफ इंडिया की रिपोर्ट बताती है कि देश में उदारीकरण की नीतियां लागू होने के बाद 1990 से लेकर 2005 के बीच लगभग साठ लाख हेक्टेयर खेती की जमीन का अधिग्रहण हुआ है और इसमें से अधिकांश का उपयोग गैर-कृषि कार्यों में हो रहा है। नतीजा, कृषि अर्थव्यवस्था चौपट होने के कगार पर पहुंच चुकी है। ध्यान देना होगा कि एक हजार हेक्टेयर खेती की जमीन कम होने पर सौ किसानों और सात सौ साठ खेतिहर मजदूरों की आजीविका छिनती है। आज देश में प्रति व्यक्ति कृषि भूमि की उपलब्धता 0.18 हेक्टेयर रह गई है। बयासी फीसद किसान लघु एवं सीमांत किसानों की श्रेणी में आ गए हैं और उनके पास कृषि भूमि दो हेक्टेयर या उससे भी कम रह गई है। अपनी जमीन गंवाने के बाद किसानों के पास जीविका का कोई साधन नहीं रह गया है और वे खानाबदोशों की तरह जीवन गुजार रहे हैं।

विस्थापित किए गए किसानों के लिए सरकार को चाहिए कि ठोस पुनर्वास नीति बनाए। साथ ही, उन्हें रोजी-रोजगार से जोड़ने के लिए कोई कारगर तरीका अपनाए। यहां यह भी गौर करना होगा कि पिछले तीन दशक में कृषि पर निर्भरता बढ़ी है लेकिन गैर-कृषि क्षेत्र में रोजगार के अवसरों का आनुपातिक फैलाव नहीं हुआ है। दूसरी ओर, खेती के विकास में क्षेत्रवार विषमता का बढ़ना, प्राकृतिक बाधाओं से पार पाने में विफलता, भूजल का खतरनाक स्तर तक पहुंचना और हरित क्रांति वाले इलाकों में पैदावार में कमी के अलावा फसलों और बाजार की दूरी न घटने, कृषि में मशीनीकरण और आधुनिक तकनीकी के अभाव कारण भी किसानों की दुर्दशा हुई है।

किसान क्रेडिट कार्ड और फसलों की बीमा योजनाओं के अलावा राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, गुणवत्तापूर्ण बीज के उत्पादन और वितरण, राष्ट्रीय बागवानी मिशन जैसी अनगिनत योजनाओं से भी किसानों को राहत नहीं मिली है। बेहतर होगा कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि के साथ-साथ कृषि और किसानों की दशा सुधारने के लिए अन्य प्रभावी उपायों की पड़ताल करे। सरकार को चाहिए कि वह कृषि के साथ-साथ पशुपालन को भी बढ़ावा दे क्योंकि इससे किसानों की आमदनी में इजाफा होगा जिससे उनकी समृद्धि बढ़ेगी। यहां समझना होगा कि किसान बढ़ेगा तभी देश बढ़ेगा।

 

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