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राजनीति: रोबोट युग में रोजगार की चुनौती

अगले एक दशक तक रोबोट दो करोड़ लोगों की नौकरियां छीन सकते हैं। रिपोर्ट के अनुसार ये रोबोट न केवल शहरी क्षेत्रों, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी रोजगार के लिए नई चुनौती होंगे। भारत में 2030 तक दस में से सात नौकरियों पर रोबोट असर दिखा सकते हैं। ऐसे में नई पीढ़ी को रोबोट से मुकाबला करने योग्य बनाना होगा।

Author July 9, 2019 1:30 AM
नौकरी के नाम पर युवाओं को कम वार्षिक पैकेज का प्रस्ताव दिया जाता है।

जयंतीलाल भंडारी

भारत में आबादी तेज रफ्तार से बढ़ रही है। इसके साथ ही बेरोजगारों की तादाद में भी भयानक इजाफा हुआ है। पिछले महीने संयुक्त राष्ट्र ने वैश्विक आबादी पर जो रिपोर्ट प्रकाशित की है, उसमें कहा गया है कि वर्ष 2027 तक भारत की आबादी दुनिया में सर्वाधिक होकर डेढ़ अरब से भी ऊपर निकल जाएगी। अभी भारत की आबादी एक सौ सैंतीस करोड़ है, वहीं चीन की आबादी एक सौ तियालीस करोड़ है। ऐसे में वर्ष 2027 तक चीन को पीछे छोड़ भारत दुनिया का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश बन जाएगा। इन आंकड़ों के साथ जो चिंताएं जुड़ी हुई हैं, वे परेशान करने वाली हैं। ऐसे में भारत के समक्ष जनसंख्या के भारी दबाव के कारण गरीबी, रोजगार, आवास, खाद्यान्न, कुपोषण, जन स्वास्थ्य एवं शहरीकरण की विभिन्न समस्याएं और अधिक चिंताजनक रूप में दिखाई देंगी। इसलिए जरूरी है कि इन आसन्न चुनौतियों पर गंभीरतापूर्वक विचार हो और देश जनसंख्या नियंत्रण के लिए उपयुक्त रणनीति के साथ आगे बढ़े।

संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया के विभिन्न देशों की जनसंख्या से संबंधित जो रिपोर्ट हाल में जारी की है, उसके अनुसार पूरी दुनिया की आबादी वर्ष 2050 तक बढ़ कर नौ सौ सत्तर करोड़ हो जाएगी। दुनिया की आधी से ज्यादा जनसंख्या वृद्धि नौ देशों में होगी जिनमें भारत, नाइजीरिया, पाकिस्तान, कांगो, इथियोपिया, तंजानिया, इंडोनेशिया, मिस्र और अमेरिका हैं। दुनिया के अन्य सभी देशों की तुलना में भारत को जनसंख्या समस्या के सबसे भीषण रूप का सामना करना होगा। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि भारत की आबादी आने वाले कई वर्षों तक बढ़ती रहेगी। निश्चित रूप से सात साल बाद जब भारत दुनिया का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश होगा तो चुनौतियां और अधिक गंभीर रूप धारण कर चुकी होंगी। दुनिया की कुल जनसंख्या में भारत की हिस्सेदारी करीब अठारह फीसद हो गई है। जबकि पृथ्वी के धरातल का मात्र 2.4 फीसद हिस्सा भारत के पास है। चूंकि भारत में संसाधनों को विकसित करने की रफ्तार जनसंख्या वृद्धि की दर से कम है, इसलिए जनसंख्या का संसाधनों पर दबाव बढ़ने से देश में आर्थिक-सामाजिक समस्याओं का दुष्प्रभाव और बढ़ेगा। निस्संदेह शहरों के आवास परिदृश्य पर चुनौतियां ज्यादा बढ़ेंगी। अभी देश के शहरों में दो करोड़ मकानों की कमी है। यह कमी और विकराल रूप लेते हुए दिखाई देगी। और ज्यादा संख्या में लोग या तो जर्जर मकानों में या फिर झुग्गी-झोपड़ी में जीवन गुजारते हुए दिखाई देंगे। बढ़ती आबादी से कृषि संसाधनों का बंटवारा बढ़ जाएगा और भारत में खाद्यान्नों की उत्पादन वृद्धि के बावजूद मांग की तुलना में पर्याप्त पूर्ति न होने का संकट दिखाई दे सकता है।

देश की बढ़ती हुई जनसंख्या की दृष्टि से शिक्षण संसाधनों की भारी कमी दिखाई देगी। देश में बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि जारी रहेगी और विकास परिदृश्य पर गांव और ज्यादा पिछड़े हुए दिखेंगे। रोजगार, शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं के लिए गांवों से लोगों का बड़ी संख्या में शहरों की ओर पलायन बढ़ेगा। पर्यावरण पर दबाव बहुत बढ़ जाएगा। शहरों में जन स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं दयनीय स्थिति में होती जाएंगी। इतना ही नहीं, देश में बढ़ती बेरोजगारी के बीच रोबोट का आगमन नई रोजगार चिंताओं को बढ़ाएगा।

आर्थिक मामलों में शोध करने वाली संस्था आॅक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स ने एक रिपोर्ट में कहा है कि अगले एक दशक तक रोबोट दो करोड़ लोगों की नौकरियां छीन सकते हैं। रिपोर्ट के अनुसार ये रोबोट न केवल शहरी, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी रोजगार के लिए नई चुनौती होंगे। भारत में 2030 तक दस में से सात नौकरियों पर रोबोट असर दिखा सकते हैं। ऐसे में नई पीढ़ी को रोबोट से मुकाबला करने योग्य बनाना होगा।

जनसंख्या वृद्धि दर को उपयुक्त रूप से नियंत्रित करने की कोशिश नहीं की गई तो संसाधनों की कमी के कारण जीवनस्तर में भारी गिरावट शुरू हो जाएगी। परिणामस्वरूप भारत के लोग ऊंची विकास दर के बावजूद अच्छा जीवनस्तर हासिल नहीं कर पाएंगे। यद्यपि भारत दुनिया का पहला देश है, जिसने अपनी जनसंख्या नीति बनाई थी, लेकिन देश की जनसंख्या वृद्धि दर उम्मीद के अनुरूप नियंत्रित नहीं हुई है। बढ़ती हुई जनसंख्या ने विकास के परिणामों को बहुत कुछ बेअसर किया है। मूलभूत सुविधाएं घटती गई हैं। स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार के मोर्चे पर चुनौतियां बढ़ती गई हैं। ऐसे में इस समय देश और दुनिया के अधिकांश अर्थ विशेषज्ञ राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग के उस कथन को आवश्यक मान रहे हैं जिसमें कहा गया है कि जनसंख्या नियंत्रण का मामला सिर्फ लोगों की इच्छा के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है। जनसंख्या नियंत्रण के अभियान को फिर से रफ्तार देने की जरूरत है। जरूरी है कि भारत में जन-जागरूकता के विभिन्न माध्यमों का इस्तेमाल कर नियंत्रित जनसंख्या और छोटे परिवार के फायदे समझाए जाएं।

अगर बढ़ती आबादी की समस्या ने निजात पानी है तो हमें आदर्श जनसंख्या की नई रणनीति अपनानी होगी। जनसंख्या विशेषज्ञों का मत है कि भारत में जहां जनसंख्या विस्फोट को रोकना जरूरी है, वहीं चीन को सामने रखते हुए जनसंख्या में ऐसी कमी से भी बचना होगा कि भविष्य में विकास की प्रक्रिया और संसाधनों का दोहन मुश्किल हो जाए। यदि हम चीन की ओर देखें तो पाते हैं कि चीन के इतिहास की प्रमुख घातक भूलों में 1979 में अपनाई गई एक दंपति एक बच्चे की नीति भी है। चालीस साल पहले चीन ने बढ़ती आबादी को कानूनी तरीके से नियंत्रित करने की कोशिश की थी। जनसंख्या वृद्धि पर कठोर प्रतिबंध लगाते समय भविष्य में श्रमिकों की कमी संबंधी मुद्दा नजरअंदाज हो गया था। यद्यपि चीन में जनसंख्या घटने से कई आर्थिक-सामाजिक मुश्किलों में कमी आई और सुनियोजित विकास भी हुआ। लेकिन अब चीन की अर्थव्यवस्था में घटते हुए श्रम बल से उत्पादन और विकास दर घटने का सिलसिला दिखाई दे रहा है। चीन उत्पादन और विकास के मोर्चे पर युवा श्रम बल में कमी से होने वाली आर्थिक हानि का अनुभव कर रहा है। यही कारण है कि 29 अक्तूबर 2015 को चीन ने जनसंख्या और विकास के मॉडल में अपनी भूल को सुधारा है और किसी दंपति के लिए एक से अधिक बच्चे के लिए अनुमति दी जाने लगी है।

ऐसे में अब भारत को विकास के मद्देनजर आदर्श जनसंख्या की नई रणनीति के तहत ध्यान देना होगा कि 2050 तक लगभग पचपन देशों की आबादी एक फीसद तक घटने का अनुमान है। ऐसे में भारत चीन की तरह एक दंपति एक बच्चे की नीति को कठोरता से न अपनाए, किंतु एक बार फिर से देश को ‘हम दो हमारे दो’ के नारे को मूर्तरूप देने की डगर पर आगे बढ़ना होगा। यह भी जरूरी होगा कि सरकार अब स्मार्ट शहरों के निर्माण के साथ-साथ शहरीकरण की बढ़ती चुनौतियों से निपटने की स्पष्ट रणनीति बनाए। जिस तरह चीन ने पिछले कुछ समय में ऐसा आर्थिक तंत्र खड़ा किया है जिसमें उसने अधिक आबादी को अपनी कामयाबी का आधार बनाया, उसी के मद्देनजर भारत में भी ऐसा तंत्र जरूरी होगा। देश में रोजगार बढ़ाने के लिए कई स्तरों पर प्रयास करने होंगे। रोबोट के बढ़ते उपयोग से उत्पन्न रोजगार चिंताओं के बीच देश और दुनिया की जरूरतों के मुताबिक देश की युवा आबादी को कौशल प्रशिक्षण से सुसज्जित करके कार्यक्षम बनाने की नई रणनीति के साथ कदम बढ़ाने होंगे।

 

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