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राजनीति: बुजुर्ग आबादी और चुनौतियां

बदलती सामाजिक व्यवस्था के कारण और घरों के सिकुड़ने से जहां परिवार छोटे हुए हैं, वहीं परिवारों में बुजुर्गों की भूमिका भी कम हुई है। पहले बुजुर्ग परिवार का महत्त्वपूर्ण अंग होते थे। नई पीढ़ी उनसे सामाजिक मूल्यों की विरासत का पाठ पढ़ती-सीखती थी। लेकिन अब बच्चे मोबाइल या टीवी में उलझे रहते हैं। उनके पास बुजुर्गों से बात करने का समय नहीं होता। बड़े शहरों में परिवार चलाने के लिए अगर पति-पत्नी दोनों कामकाजी होते हैं, तो घर के बुजुर्गों से बात किए हफ्तों भी बीत जाते हैं।

Author August 3, 2019 1:43 AM
बुजुर्गों की आबादी बच्चों के मुकाबले दोगुनी होगी।

मनीषा सिंह

बढ़ती आबादी समस्या है या इसे मानव पूंजी अथवा संसाधन के रूप में देखा जाए, इस बहस का जवाब शायद ही कभी मिले। यह बहस खासतौर से इसलिए उठी है कि आबादी से जुड़ी जो गंभीर समस्याएं सामने आ रही हैं, उनका कोई युक्तिसंगत समाधान फिलहाल विशेषज्ञों को भी नहीं सूझ रहा है। कुछ समय पहले संयुक्त राष्ट्र के जनसांख्यिकी विशेषज्ञों ने सामाजिक परिप्रेक्ष्य में एक चेतावनी बूढ़ी होती आबादी को लेकर दी है। संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट में तुलनात्मक आंकड़े देकर बताया गया है कि दुनिया में यह पहला अवसर है जब बूढ़े लोगों की आबादी पांच साल से कम उम्र के बच्चों के मुकाबले ज्यादा हो गई है। इस आंकड़े के अनुसार वर्ष 2018 के अंत में पैंसठ साल से ज्यादा उम्र के बुजुर्गों की आबादी सत्तर करोड़ से ज्यादा थी, जबकि चार साल के बच्चों की तादाद अड़सठ करोड़ है। मोटे तौर पर कह सकते हैं कि दुनिया एक ऐसे मुहाने पर है जहां पोते-पोतियों के मुकाबले दादा-दादी या नाना-नानी की संख्या ज्यादा हो गई है। संयुक्त राष्ट्र का यह आकलन भी है कि अगर बदलाव की मौजूदा दर जारी रहती है, तो वर्ष 2050 में शून्य से चार साल के हर बच्चे पर दो बुजुर्ग होंगे यानी बुजुर्गों की आबादी बच्चों के मुकाबले दोगुनी होगी।

ये बदलाव दो मुख्य वजहों से हुए हैं। पहली बात यह है कि बढ़ती स्वास्थ्य सुविधाओं से जीवन प्रत्याशा भी बढ़ी है, जिससे बुजुर्ग आबादी में इजाफा हो रहा है। कई विकसित देशों में सेवानिवृत्ति के बाद बुजुर्गों की देखभाल के विशेष सामाजिक सुरक्षा प्रबंध किए गए हैं, जिससे उन्हें जीवन-यापन के लिए किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। इस तरह स्वास्थ्य और आर्थिक समस्याओं से चिंतामुक्त जीवन के कारण बुजुर्ग लंबा जीवन जीने लगे हैं। यह एक सार्थक बदलाव है। लेकिन इसके समांतर दूसरी उल्लेखनीय बात यह है कि कामकाज और नौकरियों के बढ़ते दबाव और तनाव के कारण युवा कम बच्चे पैदा कर रहे हैं।

चीन के अलावा यह भले ही किसी देश की घोषित नीति न हो, लेकिन अब ज्यादातर देशों में एकल बच्चे के परिवार का चलन बढ़ रहा है। ऐसा परिवर्तन ब्रिटेन जैसे देश में भी हो रहा है जहां मध्यवर्गीय परिवार संतान के लालन-पालन में लगने वाले संसाधनों के अभाव की वजह से एक से ज्यादा बच्चे को प्राथमिकता नहीं दे रहे हैं। इसके पीछे बच्चों की परवरिश में लगने वाले समय और खर्च की समस्या भी है, जिस कारण युवा दंपत्ति अब ज्यादा बच्चे पैदा नहीं कर रहे हैं। इससे बुजुर्गों और बच्चों के अनुपात में असंतुलन आ रहा है। लेकिन यह असंतुलन असल में एक बड़े खतरे का संकेत भी है। खतरा उल्टे पिरामिड जैसी सामाजिक संरचना वाले देशों की भरमार हो जाने का है, जिसमें बुजुर्ग ज्यादा और बच्चे कम होंगे।

वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में जनसांख्यिकी मामलों के विशेषज्ञ क्रिस्टोफर मरे ने एक शोध में बताया है कि जब दुनिया में बच्चे कम और बुजुर्ग ज्यादा होंगे, तो ऐसे वक्त में वैश्विक समाज को बचाए रखना मुश्किल होगा। खास बात यह है कि दुनिया के करीब आधे देशों में अभी ही आबादी के मौजूदा आकार को कायम रखने के लिए पर्याप्त बच्चे नहीं हैं। विश्व बैंक ने भी इस हकीकत को स्वीकार किया है। विश्व बैंक के अनुसार 1960 में दुनिया में महिलाओं की प्रजनन दर पांच बच्चों की थी, जो छह दशक बाद आधे से भी कम यानी 2.4 रह गई है। साठ के दशक में जहां लोग औसतन बावन साल जीते थे, वहीं मौजूदा दशक में यह औसत बहत्तर साल हो गया। जापान में तो जीवन प्रत्याशा का औसत बयासी साल है। वर्ष 2018 में जापान की कुल आबादी में पैंसठ साल से ज्यादा के बुजुर्गों का प्रतिशत सत्ताईस, जबकि पांच साल से छोटे बच्चों का प्रतिशत मात्र 3.85 था।

जिन देशों में सामाजिक सुरक्षा की उदारवादी नीतियों के तहत अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं और पेंशन जैसी सुविधाएं हैं, वहां बुजुर्गों की ज्यादा संख्या आबादी के खराब अनुपात के अलावा कई आर्थिक और देश के विकास को प्रभावित करने वाली समस्याएं भी पैदा कर सकती है। असल में समाज में वृद्धों की आबादी बढ़ने का अर्थ है कामकाजी लोगों की संख्या में गिरावट, जिसकी वजह से देश की उत्पादकता कम हो सकती है और विकास प्रभावित हो सकता है। जापान का उदाहरण देते हुए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) ने यही चेतावनी दी है कि बुजुर्गों की ज्यादा आबादी से अगले चार दशकों में जापान की अर्थव्यवस्था पच्चीस फीसद तक सिकुड़ सकती है। असल में, बुजुर्गों का उपभोग भी अत्यंत सीमित होता है, वे ज्यादा खरीदारी नहीं करते, इसलिए वे देश के आर्थिक विकास में न्यूनतम योगदान दे पाते हैं। यह आशंका चीन को भी सता रही है, इसलिए उसने एकल बच्चे की नीति वाले जनसंख्या प्रतिबंधों को हटाने की बात कही है।

समस्या का एक छोर खुद बुजुर्गों से जुड़ा है जो ज्यादा चिंताजनक है। असल में किसी भी समाज में बुजुर्ग अकेलेपन और असुरक्षा जैसे मुद्दों को लेकर काफी समस्याग्रस्त होते हैं। कई देशों में हुए अध्ययन बताते हैं कि तेजी से बदलते सामाजिक और आर्थिक परिदृश्य में बुजुर्ग सामाजिक और भावनात्मक तौर पर अकेले पड़ते जा रहे हैं। इस बारे में वर्ष 2017 में एक अध्ययन हुआ था। इसमें दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का उदाहरण देते हुए बताया गया था कि इस इलाके में रहने वाले साठ साल से ज्यादा उम्र के लोगों में तिरासी फीसद अकेलेपन के शिकार हैं। अध्ययन में शामिल बुजुर्गों ने माना था कि वे सामाजिक रूप से अलग-थलग और अकेलापन महसूस करते हैं।

बताया गया कि वर्ष 2017 में सिर्फ दिल्ली में बारह लाख से ज्यादा (दो करोड़ की आबादी में आठ फीसद) बुजुर्ग थे जो छोटे परिवारों के बढ़ते चलन और तेजी से बदलती परंपरागत सामाजिक मूल्य प्रणाली के कारण काफी उपेक्षा महसूस कर रहे हैं। जीवन की सांझ में इन बुजुर्गों को आर्थिक-सामाजिक सहारा देना तो दूर, उनसे बात करने वाला भी कोई नहीं होता। न तो उनके बच्चों के परिवार उनके लिए समय निकाल पाते हैं और न ही आसपास का समाज उनसे कोई वास्ता रखता है। ऐसे में वे या तो अपराधियों के निशाने पर आ जाते हैं या फिर अपने ही परिवार की उपेक्षा के कारण तन्हा जिंदगी जीते हुए किसी दिन उनकी मौत हो जाती है। दो साल पहले मुंबई के एक उपनगर में एक आलीशान फ्लैट में बुजुर्ग महिला की मौत ने इसी सामाजिक समस्या की ओर ध्यान खींचा था। इस महिला का बेटा डेढ़ साल बाद जब अमेरिका से लौटा तो उसे फ्लैट के कमरे में एक बेड पर मां का सिर्फ कंकाल मिला था। डेढ़ साल पहले आखिरी बार महिला की बेटे से बात हुई थी।

बदलती सामाजिक व्यवस्था के कारण और घरों के सिकुड़ने से जहां परिवार छोटे हुए हैं, वहीं परिवारों में बुजुर्गों की भूमिका भी कम हुई है। पहले बुजुर्ग परिवार का महत्त्वपूर्ण अंग होते थे। नई पीढ़ी उनसे सामाजिक मूल्यों की विरासत का पाठ पढ़ती-सीखती थी। लेकिन अब बच्चे मोबाइल या टीवी में उलझे रहते हैं। उनके पास बुजुर्गों से बात करने का समय नहीं होता। बड़े शहरों में परिवार चलाने के लिए अगर पति-पत्नी दोनों कामकाजी होते हैं, तो घर के बुजुर्गों से बात किए हफ्तों भी बीत जाते हैं।

भारत में आज सबसे बड़ी समस्या बुजुर्गों की सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा की है। सरकार सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन जैसे विकल्प खत्म करती जा रही है। स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं का जहां तक सवाल है, आयुष्मान भारत जैसी योजनाएं एक खास गरीब तबके तक सीमित हैं। ऐसे में भारत जैसे देश में बुजुर्गों की बढ़ती आबादी और उनकी समस्याएं सरकार के लिए किसी चुनौती से कम नहीं हैं।

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