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राजनीति: फिर सच साबित हुए आइंस्टीन

वैज्ञानिकों ने ऐसी ही छत्ते की तस्वीर खींची है। उन तरंगों के बीच दिख रहा काला हिस्सा ही ब्लैक होल है। वैज्ञानिकों के अनुसार इससे मानवीय कल्पना को अपनी ओर खींचने वाले स्पेस टाइम फैब्रिक के रहस्य का खुलासा हो सकता है।

Author Published on: October 21, 2019 1:31 AM
पहली बार नासा के शोधकर्ताओं ने सूर्य से साठ लाख गुना वजनी ब्लैक होल द्वारा ब्रह्मांडीय उथल-पुथल के तहत एक तारे को टूटते हुए देखा है।

ब्रह्मांड में ब्लैक होल यानी अंधेरी सुरंगों की परिकल्पना सबसे पहले सन 1915 में अल्बर्ट आइंस्टीन ने की थी। आइंस्टीन के सापेक्षवाद के सिद्धांत के अनुसार ब्लैक होल ऐसे खगोलीय पिंड हैं जिनका गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र इतना शक्तिशाली होता है कि प्रकाश सहित कुछ भी इनके खिंचाव से बच नहीं सकता। ये पिंड ब्लैक होल इसलिए कहलाते है क्योंकि ये अपने पर पड़ने वाले सारे प्रकाश को सोख लेते हैं और कुछ भी परावर्तित नहीं करते। आइंस्टीन के सिद्धांत से ब्लैक होल के बारे में दुनिया को जानकारी मिली थी। नासा द्वारा जारी की ‘सैगिटेरियस ए’ नामक ब्लैक होल की तस्वीरों से एक बार उनके सिद्धांत और उनकी परिकल्पना की पुष्टि हुई है। खगोलविदों ने ब्लैक होल के बारे में बड़ी उपलब्धि हासिल की है।

पहली बार नासा के शोधकर्ताओं ने सूर्य से साठ लाख गुना वजनी ब्लैक होल द्वारा ब्रह्मांडीय उथल-पुथल के तहत एक तारे को टूटते हुए देखा है। इस प्रक्रिया को ज्वारीय विघटन भी कहते हैं। इस विनाशकारी खगोलीय घटना को ग्रहों की खोज के लिए भेजे गए नासा के उपग्रह ट्रांजिटिंग एक्सोप्लैनेट सर्वे सैटेलाइट (टीईएसएस), नील गेहरेल्स स्विफ्ट वेधशाला और अन्य उपकरणों की मदद से पहली बार बारीकी से देखा गया। नासा ने बताया कि ब्रह्मांड में ज्वारीय विघटन बहुत ही दुर्लभ घटना है और प्रत्येक दस हजार से एक लाख साल में हमारी आकाशगंगा के बराबर के तारों के पुंज या आकाशगंगा में एक बार यह घटना होती है। अब तक केवल चालीस ऐसी घटना देखी गई हैं।

कैलिफोर्निया स्थित कार्नेजी वेधशाला में इस विषय पर काम कर रहे खगोल भौतिकविद् थॉमस होलोइन के अनुसार टीईएसएस की मदद से यह देखने में मदद मिली कि ब्रह्मांड में घटना वास्तव में कब शुरू हुई जिसे हम पहले कभी नहीं देख सके थे। ज्वारीय विघटन की जल्द ही पहचान धरती पर स्थित ऑल स्काई ऑटोमेटेड सर्वे फॉर सुपरनोवा (एएसएस-एसएन) से की गई और इस वजह से वे शुरुआती कुछ दिन में बहु-तरंग दैर्ध्य को सक्रिय करके अवलोकन में सफल हुए। इस खगोलीय घटना के समझने के लिए शुरुआती आंकड़े बहुत महत्त्वपूर्ण होंगे। एस्ट्रोफिजिकल जर्नल में प्रकाशित शोध के मुताबिक यह ब्लैक होल आकाशगंगा के बीच में है। यह वोलंस तारामंडल से करीब सैंतीस करोड़ पचास लाख प्रकाश वर्ष दूर है। कटे हुए तारे का आकार हमारे सूर्य के बराबर हो सकता है। नासा के मुताबिक इस ब्रह्मांडीय घटना की खोज इस साल 29 जनवरी को विश्व भर में फैले बीस रोबोटिक दूरबीनों वाले एएसएएस-एसएन नेटवर्क की मदद से की गई।

जब होलोइन को नेटवर्क के दक्षिण अफ्रीका में स्थित उपकरण से घटना की जानकारी मिली तब उन्होंने तुरंत चिली के लास कैंपनास स्थित उपकरण से घटना की वास्तविक स्थान का पता लगाने के काम पर लगाया और सटीक नजर रखने के लिए अन्य एजेंसियों की भी मदद ली। टीईएसएस ने पहली बार इस ज्वारीय विघटन को 21 जनवरी को रिकार्ड किया था। इस शोध के सह-लेखक और नेशनल साइंस फाउंडेशन में स्नातक शोधकर्ता पैट्रिक वॉलेली ने कहा कि इस घटना की चमक बहुत स्पष्ट थी, जिसकी वजह से इस घटना की ज्वारीय विघटन के रूप में पहचान करने में मदद मिली। होलोइन की टीम ने बताया कि दूरबीन की मदद से जिस पराबैंगनी रोशनी का पता चला, उसका तापमान महज कुछ दिनों में चालीस हजार डिग्री सेल्सियस से गिर कर बीस हजार डिग्री सेल्सियस पर पहुंच गया। पहली बार ज्वारीय विघटन के दौरान इतने कम समय में तापमान गिरावट देखी गई है। हालांकि सैद्धांतिक रूप से पहले इसकी जानकारी थी।

अमेरिका स्थित नेशनल साइंस फाउंडेशन ने पिछले महीने वाशिंगटन में इवेंट हॉरिजन टेलीस्कोप (ईएचटी) प्रोजेक्ट के नतीजों का एलान किया था। ईएचटी को ब्लैकहोल की तस्वीर उतारने के लिए ही डिजाइन किया गया था। ब्रसेल्स, टोकियो, सैंटियागो, शंघाई और ताइपे में ब्लैक होल की तस्वीर जारी की गई। अप्रैल 2017 में हवाई, एरिजोना, स्पेन, मैक्सिको, चिली और दक्षिणी गोलार्द्ध में आठ रेडियो टेलीस्कोप स्थापित किए गए थे। इनकी मदद से ब्रह्मांड के दो अलग-अलग ब्लैक होल के आंकड़े जुटाए गए। एक ब्लैक हमारी गैलेक्सी ‘मिल्की वे’ के मध्य में स्थित है। ‘सैगिटेरियस ए’ नामक यह ब्लैक होल 4.4 करोड़ किलोमीटर में फैला हुआ है। इसका भार सूर्य से चालीस लाख गुना अधिक होने का अनुमान है। दूसरा ब्लैक होल ‘एम 87’ गैलेक्सी में स्थित है। माना जा रहा है कि यह सैगिटेरियस से भी डेढ़ हजार गुना भारी है। नासा ने पहली बार सैगिटेरियस ए ब्लैक होल की तस्वीरें 11 अप्रैल 2019 को जारी करके इसे बेहद अनोखी घटना बताया।

करीब पचास साल पहले वैज्ञानिकों ने हमारी आकाशगंगा के बीच एक चमकीले क्षेत्र का पता लगाया था। साठ के दशक में अमेरिकी वैज्ञानिक जॉन आर्कवाल्ड व्हीलर ने उसे ‘ब्लैकहोल’ का नाम दिया। स्टीफन हाकिंग ने भी ब्लैक होल का व्यापक अध्ययन किया था। उन्होंने ब्लैक होल से निकलने वाले हाकिंग रेडिएशन की परिकल्पना की थी। वैज्ञानिकों के प्रयास से दुनिया ने पहली बार ब्लैक होल की तस्वीर देखी। असल में किसी भी ब्लैक होल की तस्वीर लेना असंभव है। ब्लैक होल ऐसी संरचना है, जिससे प्रकाश भी वापस नहीं आता। ब्लैक होल की एक सीमा होती है, जिसमें पहुंचते ही कोई भी पिंड घूमते हुए धीरे-धीरे उसके केंद्र में समा जाता है। ब्लैक होल में हर पल अनगिनत पिंड समा रहे होते हैं। इस प्रक्रिया में उसके चारों ओर प्रकाश और तरंगों का का एक चक्र बन जाता है, जिससे छत्ते जैसी आकृति बनती है। वैज्ञानिकों ने ऐसी ही छत्ते की तस्वीर खींची है। उन तरंगों के बीच दिख रहा काला हिस्सा ही ब्लैक होल है। वैज्ञानिकों के अनुसार इससे मानवीय कल्पना को अपनी ओर खींचने वाले स्पेस टाइम फैब्रिक के रहस्य का खुलासा हो सकता है।

इस साल भौतिकी का नोबल ब्रह्मांड की संरचना और इतिहास पर नए सिद्धांत रखने के लिए जेम्स पीबल्स (अमेरिका) और सौरमंडल से बाहर एक और ग्रह खोजने के लिए मेयर व क्वालेज (स्विटजरलैंड) को संयुक्त रूप से दिया गया है। जेम्स पीबल्स ने 1960 के दशक में बिग बैंग, डार्क मैटर और डार्क एनर्जी पर जो काम किया था, उसे आधुनिक ब्रह्मांड विज्ञान का आधार माना जाता है। इस खोज से हमें पता चला कि ब्रह्मांड के महज पांच प्रतिशत पदार्थ के बारे में ही हम जान पाए हैं। ये वे पदार्थ हैं जिनसे तारे, ग्रह, पेड़-पौधे और हमारा निर्माण हुआ है। बाकी पनचानवे प्रतिशत हिस्सा अज्ञात डार्क मैटर और डार्क एनर्जी है।

आइंस्टीन के सिद्धांतों में भी ‘डार्क एनर्जी’ की जगह थी, हालांकि वे खुद इसके बारे में संशकित थे। वह इसे अपनी एक ‘भूल’ मानते थे। कुछ वर्ष पहले उनके सिद्धांत की पुष्टि के लिए अमेरिका की ‘नेशनल रेडियो स्ट्रोनामिकल आब्जर्वेटरी’ ने बृहस्पति ग्रह से पृथ्वी की ओर आती एक प्रकाश किरण की गति और उसके मार्ग की नाप जोख की थी। यह देखा गया कि यह प्रकाश (जो लाखों प्रकाश वर्ष दूर स्थित एक तारे से चला था) जब बृहस्पति के पास गुजर रहा था, तो उसने अपनी दिशा बदल दी और पृथ्वी की ओर मुड़ गया।

आइंस्टीन ने कहा था कि पदार्थ और ऊर्जा दोनों एक ही है। इसलिए जब कोई किरण किसी ग्रह के पास से गुजरती है तो ग्रह के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण उसकी दिशा बदल जाती है। इस प्रयोग से उनकी यह बात सिद्ध हो गई है। ‘डार्क एनर्जी’ ऐसी अनजानी ऊर्जा है जिसकी वजह से ब्रह्मांड तेजी से फैल रहा है और आकाशीय पिंड एक-दूसरे से दूर जा रहे हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि हमारे ब्रह्मांड का सत्तर फीसद इसी से बना है, हालांकि यह ऊर्जा क्या है, किसी को नहीं पता।

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