ताज़ा खबर
 

राजनीति: गरमाती धरती के खतरे

वैश्विक स्तर पर धरती का तापमान बढ़ने से समुद्र तटीय क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों पर इसका व्यापक असर होगा। ग्रीनलैंड और अंटार्कटिक पर जमी बर्फ लगातार कम होती जा रही है। इससे समुद्र का जलस्तर दो मीटर तक बढ़ सकता है। इससे तटीय शहरों के डूबने का खतरा बढ़ जाएगा। कोलकाता, मुंबई और चेन्नई जैसे महानगरों का डूब जाना तो साधारण बात होगी।

Author June 19, 2019 1:19 AM
कार्बन की बढ़ती मात्रा चिंता पैदा कर रही है। इससे ग्लेशियर पिघलेंगे।

निरंकार सिंह

धरती का तापमान जिस रफ्तार से बढ़ता जा रहा है, वह इस सदी के अंत तक प्रलय के नजारे दिखा सकता है। इससे धरती का मौसमी चक्र बदल रहा है। दुनिया के कई देशों में चक्रवाती तूफान, बाढ़, सूखा और अतिवृष्टि जैसी कुदरती आपदाओं की तीव्रता और संख्या में भी वृद्धि हो रही है। कहीं ठंडक अधिक हो रही है तो कहीं गर्मी से लोग बेहाल हैं। भारत जैसे उष्णकटिबंधीय जलवायु वाले देश के मौसमी चक्र में भारी बदलाव हो रहा है। दुनिया के सबसे गर्म पंद्रह शहरों में दस शहर भारत के हैं। पचास के दशक में उच्च तापमान का क्षेत्र केवल दक्षिण-मध्य भारत तक सीमित था, जहां इकतालीस डिग्री सेल्सियस तक तापमान दर्ज किया जाता था। लेकिन अभी तो तकरीबन पूरा भारत ही गर्मी का गढ़ बन गया है। राजस्थान के श्रीगंगानगर और चूरू जैसे इलाकों में तापमान पचास डिग्री तक जा पहुंचा। मौसम विभाग के मुताबिक 1961 से 2018 के बीच तापमान में आश्चर्यजनक बढ़ोत्तरी (करीब 0.8 डिग्री सेल्सियस) दर्ज की गई है और गर्मी वाले दिनोें की संख्या पूरे देश में बढ़ गई है।

मौसम विभाग का मानना है कि अगर इस बार बारिश पूर्वानुमान के अनुसार नहीं होती है तो 2019 बीते साल से भी ज्यादा गर्म होगा। भारी गर्मी अपने साथ जल संकट भी लाती है। पिछले कुछ वर्षों से बार-बार सूखे का सामना कर रहे महाराष्ट्र के विदर्भ और उत्तर प्रदेश-मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड में पीने के पानी की समस्या बढ़ गई है। इन इलाकों में कई जलाशयों में पानी का स्तर क्षमता का दस फीसद ही रह गया है, जिससे कुछ फसलें संकटग्रस्त हो गई हैं। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार पानी का स्तर अभी बीते दस सालों में सबसे कम है। यह तो तात्कालिक संकट है। पर असली समस्या अत्यंत गंभीर है। जलवायु बदलने से फसलों की पैदावार से लेकर उनकी गुणवत्ता पर भी प्रभाव पड़ने वाला है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए यह संकट एक चुनौती के रूप में उभर रहा है। यदि अभी से हमने अपने पर्यावरण के संतुलन पर ध्यान नहीं दिया तो हमारा भविष्य संकटों से भरा होगा।

जलवायु संकट (ग्लोबल वार्मिंग) के कारण बीती आधी सदी में दुनिया भर में अतिवृष्टि के मामलों में काफी बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 1964 से लेकर 2013 तक अत्यधिक बारिश की सर्वाधिक घटनाएं हुर्इं। अत्यधिक वर्षा की घटनाएं कनाडा के कुछ हिस्सों, यूरोप, अमेरिका के मध्य-पश्चिम और पूर्वोत्तर क्षेत्र, उत्तरी आॅस्ट्रेलिया, पश्चिमी रूस और चीन के कुछ हिस्सों में बढ़ी हैं। कनाडा की सास्काचेवान यूनिवर्सिटी में हाइड्रो-क्लाइमेटोलॉजिस्ट साइमन के अनुसार इस अध्ययन के लिए वैश्विक स्तर पर बारिश के तमाम रेकार्ड खंगाले गए, जिनमें पाया गया कि बीते पचास साल के दौरान जब ग्लोबल वार्मिंग में तेजी आनी शुरू हुई तो अतिवृष्टि के मामलों में भी आश्चर्यजनक रूप से बढ़ोतरी देखी गई। यह बदलती प्रवृत्ति जलवायु परिवर्तन के खतरों के प्रति आगाह करती है। इसी दौरान यूरोप और एशिया के भागों में 8.6 फीसद ज्यादा अतिवृष्टि हुई। जलवायु संकट के कारण भारी बारिश के मामले बढ़ रहे हैं। साथ ही, यह कई बीमारियों को भी अपने साथ लेकर आती है। वर्ष 1980 से 2009 के बीच अतिवृष्टि के कारण आई बाढ़ में लगभग पांच लाख लोगों की मौत हो गई।

वैश्विक स्तर पर धरती का तापमान बढ़ने से समुद्र तटीय क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों पर इसका व्यापक असर होगा। ग्रीनलैंड और अंटार्कटिक पर जमी बर्फ लगातार कम होती जा रही है। इससे समुद्र का जलस्तर दो मीटर तक बढ़ सकता है। इससे तटीय शहरों के डूबने का खतरा बढ़ जाएगा। कोलकाता, मुंबई और चेन्नई जैसे महानगरों का डूब जाना तो साधारण बात होगी। ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी आॅफ ब्रिस्टल के शोधकर्ताओं ने बताया कि ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका में बर्फ की चादरों के पिघलने के बाद समुद्र का स्तर बढ़ने से तटीय क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा, जो पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी सबसे बड़ा खतरा है। समुद्री जलस्तर बढ़ने के संभावित खतरों से निपटने के लिए अभी से वैज्ञानिक रणनीति बनाने की जरूरत है।
समुद्र के स्तर में वृद्धि के अनुमान ग्रीनलैंड और अंटार्कटिक बर्फ की चादरों के विकास के बारे में चल रही अनिश्चितता के कारण चुनौतीपूर्ण बने हुए हैं। शोधकर्ताओं ने बताया कि तकनीक का प्रयोग कर उन्होंने बर्फ की बाईस चादरों की जांच कर यह अनुमान लगाया है कि ग्रीनलैंड, वेस्ट अंटार्कटिक और पूर्वी अंटार्कटिक में बर्फ पिघलने से वैश्विक स्तर पर तापमान में क्या फर्क पड़ा। इस अध्ययन से पता चलता है कि वर्ष 2100 तक उच्च ताप वाले इलाकों में समुद्र का जल स्तर दो मीटर तक बढ़ सकता है। यदि ऐसा हुआ तो लगभग दस लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र जलमग्न हो सकता है और दस लाख लोग इससे प्रभावित हो सकते हैं।

इस संकट से निपटने के लिए कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक शोध केंद्र की योजना बनाई है। यह केंद्र पृथ्वी को बचाने के नए रास्ते तलाशेगा। इस शोध में ऐसे तरीकों की खोज की जाएगी, जिनसे ध्रुवों की पिघल रही बर्फ को फिर से जमाया जा सके और वातावरण से कार्बन डाइ आॅक्साइड निकाली जा सके। इस केंद्र को इसलिए बनाया जा रहा है कि वर्तमान में पृथ्वी पर जलवायु संकट के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए उठाए जा रहे कदम नाकाफी लग रहे हैं। यह पहल ब्रितानी सरकार के पूर्व मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार प्रोफेसर सर डेविड किंग की ओर से कराई जा रही है। डेविड किंग के अनुसार आने वाले दस सालों में हम जो भी करेंगे वह मानव जाति के अगले दस हजार सालों का भविष्य तय करेगा। यह मुहिम सामाजिक वैज्ञानिकों, वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को एक साथ लाएगी। यह वास्तव में हमारे समय की सबसे महत्त्वपूर्ण चुनौतियों में से है। यह धु्रवों पर बर्फ को जमाने की कोशिशों में सबसे कारगर कदमों में से एक होगा। इनके ऊपर पड़ने वाले बदलों को चमकदार करना है। इसके लिए बेहद पतली नलियों को मानव रहित जहाजों पर लगा कर समुद्री पानी को पंप से ऊपर खींचा जाएगा। इससे नमक के कण नली में आएंगे। इस नमक को बादलों तक पहुंचाया जाएगा। इससे बादल गर्मी को और भी ज्यादा परावर्तित कर सकेंगे।

जलवायु परिवर्तन से निपटने का एक और अहम तरीका है- कार्बन कैप्चर और स्टोरेज जिसे सीसीएस कहते हैं। सीसीएस में कोयले या गैस से निकाली कार्बन डाई आक्साइड को बिजली स्टेशनों या इस्पात संयंत्रों से इकट्ठा कर इसे भूमिगत भंडारों में सुरक्षित किया जाता है। यूनिवर्सिटी आॅफ शेफील्ड के प्रोफेसर पीपर स्ट्राइंग के अनुसार दक्षिण वेल्स के पोर्ट टैलबोट में टाटा स्टील के साथ एक कार्बन कैप्चर एंड यूटिलाइजेशन (सीसीयू) पायलट योजना विकसित की जा रही है, जो प्रभावी रूप से कार्बन डाइआक्साइड को पुनर्चक्रित करता है। प्रोफेसर स्ट्राइंग के अनुसार, इस योजना में एक संयंत्र की स्थापना की जाएगी जो फर्म के कार्बन उत्सर्जन को र्इंधन में परिवर्तित करेगा। हमारे पास हाइड्रोजन का एक स्रोत है। हमारे पास कार्बन डाइआक्साइड का एक स्रोत है, हमारे पास गर्मी का एक स्रोत है। हम इसके जरिए अक्षय ऊर्जा पैदा करेंगे। हम सिंथेटिक र्इंधन बनाने जा रहे हैं। इनमें से एक उपाय समंदरों को हरा-भरा करना भी है, ताकि वे अधिक कार्बन डाइआक्साइड को सोख सकें। इस समस्या के समाधान के लिए हमें अपनी धरती को हरा-भरा बनाना होगा, ताकि पेड़-पौधे अधिक कार्बन डाइआक्साइड सोख सकें और धरती का तापमान बढ़ने से रोक सकें। वृक्षारोपण को जन अभियान का हिस्सा बनाना होगा। वृक्षों को लगा कर और धरती पर हरियाली बढ़ा कर ही अपनी भावी पीढ़ी का भविष्य बचा सकते हैं।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App