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राजनीति: ई-वाहन की कठिन डगर

वर्तमान में वैश्विक स्तर पर परंपरागत वाहनों के मुकाबले ई-वाहन महज एक फीसद हैं। लिहाजा, वर्ष 2030 तक सौ फीसद ई-वाहनों की बिक्री सुनिश्चित करना भारत के लिए आसान नहीं होगा। फिलहाल यात्री वाहन के निर्माण में हर साल आठ फीसद की दर से वृद्धि हो रही है। यदि देश में अभी से केवल ई-वाहनों का निर्माण किया जाता है तब भी वर्ष 2030 तक सौ फीसद ई-वाहनों की बिक्री नहीं की जा सकेगी।

Author नई दिल्ली | Updated: August 28, 2019 5:19 AM
वर्ष 2030 तक सौ फीसद ई-वाहन की बिक्री नहीं की जा सकेगी।

सतीश सिंह

बिजली से चलने वाले वाहनों को अपनाना समय की मांग है क्योंकि प्रदूषण की समस्या दिन-प्रतिदिन गहराती जा रही है। ई-वाहनों के उपयोग से प्रदूषण का स्तर तो कम होगा ही, साथ ही पेट्रोलियम आयात पर भी देश की निर्भरता कम होगी। इतना ही नहीं, इससे व्यापार घाटा कम करने में मदद मिलेगी। हालांकि ई-वाहनों का उत्पादन और इन्हें सबके लिए सुगम बनाना सरकार और उद्योग के लिए बड़ी चुनौती है। इसलिए इसे लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि भारत में इसके लिए बुनियादी ढांचा तैयार नहीं है। ई-वाहन महंगे होने के कारण आमजन इन्हें खरीदने में असमर्थ हैं। एक बात यह कही जा रही है कि इन वाहनों से भी पर्यावरण को नुकसान पहुंचेगा।

इस साल के बजट भाषण में ई-वाहन के उपयोग को बढ़ावा देने की बात कही गई थी। बजट में कहा गया कि यदि कोई बैंक से कर्ज लेकर ई-वाहन खरीदता है तो ब्याज पर डेढ़ लाख रुपए तक आयकर में अतिरिक्त छूट दी जाएगी। ई-वाहन की बैटरी खरीदने के लिए भी ग्राहकों को प्रोत्साहन देने की बात कही गई। देश में ई-वाहन की बिक्री बढ़ाने और बैटरी के निर्माण के लिए फैक्ट्रियां लगाने के लिए खाका तैयार किया है। नीति आयोग के अनुसार वर्ष 2030 तक देश में सौ फीसद ई-वाहन बिकने लगेंगे।

ई-वाहनों को बढ़ावा देने की दिशा में पहले दौर में दिल्ली, अमदाबाद, बंगलुरु, जयपुर, मुंबई, लखनऊ, हैदराबाद, इंदौर, कोलकाता, जम्मू एवं गुवाहाटी आदि शहरों में बुनियादी ढांचा तैयार किया जाएगा। इन शहरों में एक हजार चार्जिंग स्टेशन लगाए जाएंगे। इसके अलावा देश में ही बैटरी निर्माण पर जोर दिया जाएगा। भारत में लगभग 75 फीसद छोटी कारें हैं जिन्हें बिजली की गाड़ियों में बदलना और उनकी कीमत को किफायती रखना सरकार के लिए बड़ी चुनौती है। वर्तमान में ई-वाहन में बैटरी के रूप में लिथियम आयन बैटरी का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन यह बहुत महंगी है।

वर्तमान में वैश्विक स्तर पर परंपरागत वाहनों के मुकाबले ई-वाहन महज एक फीसद हैं। लिहाजा, वर्ष 2030 तक सौ फीसद ई-वाहनों की बिक्री सुनिश्चित करना भारत के लिए आसान नहीं होगा। फिलहाल यात्री वाहन के निर्माण में हर साल आठ फीसद की दर से वृद्धि हो रही है। यदि देश में अभी से केवल इ-वाहनों का निर्माण किया जाता है तब भी वर्ष 2030 तक सौ फीसद ई-वाहन की बिक्री नहीं की जा सकेगी।

भले ही प्रदूषण कम करने के लिए इ-वाहन के उपयोग की वकालत की जा रही है लेकिन पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहनों की तुलना में रख-रखाव, गति, कीमत आदि के मामले में यह कमतर है। ई-वाहन की बैटरी काफी ज्यादा भारी होती है। यह एक बार चार्ज करने पर बहुत कम दूरी तक चल पाती है। बैटरी को तुरत-फुरत चार्ज भी नहीं किया जा सकता। भारत में बैटरी रिचार्ज करने के लिए चार्जिंग स्टेशन की नहीं के बराबर ही हैं। जर्मनी जैसे विकसित एवं इ-कार के जन्मदाता देश में भी केवल चौदह हजार तीन सौ बाईस चार्जिंग स्टेशन हैं। ई-वाहन के मॉडल के अनुसार बैटरी को चार्ज करने के लिए ज्यादा वोल्टेज की जरूरत होती है। इसके सॉकेट और प्लग के लिए भी अलग-अलग मानक निर्धारित किए गए हैं।

चार्जिंग के सॉकेट और प्लग भी एकसमान नहीं होते हैं, जिसके कारण चार्जिंग स्टेशन पहुंचने के बाद भी बैटरी रिचार्ज हो पाएगी या नहीं, इसका डर बना रहता है। चार्जिंग के दौरान सॉकेट भी बहुत जल्द गर्म हो जाते हैं, जिससे आग लगने का खतरा बना रहता है। भारत में महिंद्रा एंड महिंद्रा और ओला ने मिल कर नागपुर में सौ से अधिक ई-वाहन प्रयोगिक तौर पर चलाए हैं लेकिन कंपनियों को बैटरी चार्ज करने और बैटरी जनित अन्य समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। ई-वाहन की राह में बिजली की कमी सबसे बड़ी बाधा बन सकती है। इसलिए ई-वाहन की योजना को मूर्त रूप देने के लिए सबसे पहले देशभर में सौ फीसद बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करनी होगी।

भारत में आज भी नब्बे फीसद बिजली कोयले से बन रही है। हालांकि देश में नवीकरणीय ऊर्जा से बिजली उत्पादन की दर बढ़ी है लेकिन अभी भी इस स्रोत से अपेक्षित बिजली का उत्पादन नहीं किया जा रहा है। इसके अलावा पर्यावरण की समस्या का भी बिजली वाहन निराकरण नहीं करते। वर्ष 2018 में जर्मनी में 40.2 फीसद बिजली का उत्पादन नवीकरणीय ऊर्जा से किया जा रहा था। नार्वे में भी बिजली का उत्पादन परंपरागत ऊर्जा की जगह नवीकरणीय ऊर्जा से ज्यादा किया जाता है, लेकिन भारत में बिजली उत्पादन का मुख्य स्रोत कोयला है। शोधों से पता चला है कि ई-वाहन की बैटरी के निर्माण में बिजली की ज्यादा खपत होती है और जिन देशों में कोयले से बिजली उत्पादित की जाती है वहां कार्बन-डाईआॅक्साइड का उत्सर्जन ज्यादा होता है जबकि नवीकरणीय ऊर्जा से बिजली का उत्पादन करने में ऐसा नहीं होता है।

एक अनुमान के मुताबिक एक बैटरी को बनाने में लगभग पंद्रह टन कार्बन-डाईआॅक्साइड का उत्सर्जन होता है। इसके अलावा बैटरी को रिचार्ज करने में भी बिजली की खपत काफी ज्यादा होती है। लीथियम-आयन बैटरी का औसत जीवनकाल दस साल का होता है और एक कार औसतन पंद्रह हजार किलोमीटर हर साल चलती है। चूंकि भारत में दस साल से ज्यादा पुरानी गाड़ियां चल रही हैं। ऐसे में ई-वाहन में हर दस साल में बैटरी बदलने की जरूरत होगी। यदि बैटरी के निर्माण में होने वाली बिजली की खपत के साथ-साथ बैटरी को रिचार्ज करने में होने वाली बिजली की खपत को भी जोड़ दिया जाए तो कार्बन-डाइआॅक्साइड के उत्सर्जन का फीसद और भी ज्यादा बढ़ जाता है। कुछ अध्ययनों के मुताबिक ई-वाहन की उत्पादन प्रक्रिया के दौरान पेट्रोल एवं डीजल कारों की उत्पादन प्रक्रिया की अपेक्षा ढाई टन अधिक कार्बन-डाईआॅक्साइड का उत्सर्जन होता है। इस तरह, भले ही प्रत्यक्ष रूप से ई-वाहन से धुआं नहीं निकलता है, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप इसकी वजह से बड़ी मात्रा में कार्बन-डाईआॅक्साइड का उत्सर्जन होता है।

ई-वाहन की बैटरी में इस्तेमाल की जाने वाली लीथियम की उपलब्धता विश्व में बहुत ही कम है। लीथियम की दो-तिहाई मात्रा लैटिन अमेरिका के तीन देशों चिली, अर्जेंटीना और बोलिविया में उपलब्ध है। एक टन लीथियम हासिल करने के लिए बहुत ज्यादा बिजली और बीस लाख लीटर से ज्यादा पानी खर्च होता है। इसके अलावा, बैटरी के निर्माण में इस्तेमाल की जाने वाले कोबाल्ट और मैंगनीज भी विश्व में बहुत कम मात्रा में पाए जाते हैं। कम उपलब्धता की वजह से ही लीथियम की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी से बढ़ रही है। वर्ष 2015 की तुलना में इसकी कीमत में चार गुना वृद्धि हो चुकी है। चूंकि इसकी खपत में तेजी से वृद्धि हो रही है, इसलिए अनुमान लगाया जा रहा है कि आने वाले दिनों में इसकी कीमत में और भी ज्यादा इजाफा होगा, जिससे ई-वाहन और भी ज्यादा महंगे हो सकते हैं।

भारत में ई-वाहन का सपना साकार करने की राह में फिलहाल अनेक बाधाएं हैं। सबसे बड़ी बाधा इसके उत्पादन और संचालन के लिए बुनियादी ढांचा तैयार करने की है। भारत में पर्याप्त संख्या में चार्जिंग स्टेशन लगाने होंगे। इसके लिए निर्बाध बिजली आपूर्ति जरूरी है। इसके अलावा इ-वाहनों की कीमत बड़ा मुद्दा है। जब तक ई-वाहन सस्ते नहीं होंगे, आम आदमी इन्हें खरीद नहीं सकेंगे। वाहन कंपनियों और सरकार को इन सब कामों के लिए भारी-भरकम पूंजी लगानी होगी। लेकिन नीति आयोग की ई-वाहन नीति में इन मुद्दों पर चर्चा नहीं की गई है।

 

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