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राजनीति: हमले से उपजते संकट

सउदी अरब के अरामको सहित अनेक तेल उत्खनन प्रतिष्ठानों की चार दशक पहले अमेरिकी सहयोग से जो प्रगति हुई और जिस आधार पर वैश्विक तेल व्यापार सबसे उन्नत हुआ, वह अमेरिका-सउदी अरब के लिए अति लाभकारी सिद्ध हुआ। रूस, चीन और ईरान को इससे बड़ा झटका लगा था। वैश्विक प्रतिबंधों के बाद भी ईरान का गुप्त परमाणु हथियार परीक्षण कार्यक्रम इसी घटना की प्रतिक्रिया है।

Author Published on: September 28, 2019 1:55 AM
विश्व को तेल की आपूर्ति करने वाले केंद्र में हमले के बाद भयंकर आग लग गई ।थी। (pc- Reuters)

विकेश कुमार बडोला

सउदी अरब की तेल कंपनी अरामको पर ड्रोन हमलों ने वैश्विक बाजार में पेट्रो पदार्थों के मूल्यों में भारी वृद्धि कर दी है। इराक के बाद भारत दूसरा देश है, जो सउदी अरब से सबसे ज्यादा अपना अस्सी फीसद तेल आयात करता है। रूस और अमेरिका भी सउदी अरब के दो बड़े तेल ग्राहक हैं। ऐसे में महत्त्वपूर्ण देशों को तेल की आपूर्ति रुक जाने से वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता, अर्थव्यवस्था में मंदी और अनेक दूसरे दुष्प्रभाव पड़ने शुरू हो सकते हैं। हालांकि अमेरिका ने सउदी अरब को भरोसा दिया है कि वह जल्द ही अरब से तेल की आपूर्ति के काम को सामान्य बनाने के लिए उसकी सहायता करेगा। सउदी अरब पर कच्चे, प्रसंस्करित और अन्य प्रकार के तेलों और पेट्रो उत्पादों पर निर्भर रहने वाले देशों के लिए अचानक यह एक प्रमुख चिंता बन चुकी है।

इस साल अप्रैल में अरामको ने दक्षिण कोरियाई तेल रिफाइनरी हुंडई आॅयल बैंक में तेरह फीसद की हिस्सेदारी अर्जित करने के लिए सवा अरब अमेरिकी डॉलर देकर एक अनुबंध पर हस्ताक्षर किए थे। इस दिशा में आगे बढ़ते हुए अरामको ने पालैंड की प्रमुख तेल रिफाइनरी पीकेएन आॅर्लेन के साथ उसे अरबी कच्चे तेल की आपूर्ति करने के एक अनुबंध पर हस्ताक्षर किए। इतना ही नहीं, अरामको तेल एवं प्राकृतिक गैस उत्पादन के नए-नए कीर्तिमान स्थापित करती रही है। इसी क्रम में वह अब विश्व के सबसे प्रमुख तरलीकृत प्राकृतिक गैस उत्पाद बनाने की योजना भी बना रही है। अरामको एलएनजी बाजार में छा जाने का अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए क्षमतावान संयुक्त उद्यमों और साझीदारों की खोज में है। संभवत: यही कारण थे, जो अरब केंद्रित और ईरान-यमन-जॉर्डन आधारित तेल एवं प्राकृतिक गैस उत्पादों के मध्य गलकाट प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के प्रमुख कारक रहे हैं।

तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो सउदी अरब अरामको जैसे उत्कृष्ट तेल उत्खनन प्रतिष्ठान के नेतृत्व में तेल एवं प्राकृतिक गैस के कारोबार में एकाधिकार की स्थिति में आ चुका है। लेकिन ईरान में सरकार के समानांतर जो असंतुष्ट, विद्रोही और अराजक धनसंपन्न सत्ता-वर्ग पिछले पांच-छह दशकों में तैयार हुआ। वह ईरानी सरकार के गुप्त संरक्षण में ईरान के लिए चुनौती बने सउदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों को हानि पहुंचाने का जोखिम उठाने लगा है। इसका ताजा उदाहरण है अरामको पर हुआ ड्रोन हमला है। एक प्रकार से यह ईरान की सउदी अरब और अमेरिकी कारोबारी मित्रता से चिढ़-कुढ़ कर किया गया सामरिक प्रतिवाद है। इसे सउदी अरब और अमेरिका आसानी से भुला नहीं पाएंगे। हालांकि दोनों देशों का पहला दायित्व विश्व के देशों को सउदी अरब से होने वाली तेल की आपूर्ति को पूर्ववत स्थिति में लाना है, लेकिन ईरान और उसके सहयोगी इस्लामी देशों के संरक्षण में तेल प्रतिष्ठान पर ड्रोन से धावा करने वालों के प्रति अमेरिका शांत नहीं बैठेगा। सउदी अरब भी यही चाहेगा कि उसके विरोध में मध्य-पूर्वी एशियाई देशों से उठने वाली विद्रोही लहर को येन-केन-प्रकारेण थाम लिया जाए।

अरामको जिसका आधिकारिक नाम साउबी अरबियन आॅयल कंपनी है और जो पहले (अरबियन-अमेरिकन आॅयल कंपनी) के रूप में नामांकित हो चुकी है, वह सउदी अरब की राष्ट्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस कंपनी है। यह देहरान, सउदी अरब में स्थित है। पिछले साल इसका कुल राजस्व 355.9 अरब अमेरिकी डॉलर रहा था और कुल आय 111.1 अरब अमेरिकी डॉलर थी। कंपनी का सौ फीसद स्वामित्व सरकार के पास है। इसमें बासठ हजार से ज्यादा कर्मचारी हैं। यह दुनिया की सबसे ज्यादा मुनाफा कमाने वाली तेल कंपनी है। अरामको विश्व के एकमात्र दीर्घ हाइड्रोकॉर्बन नेटवर्क का संचालन करती है। कंपनी सउदी अरब में सौ से ज्यादा तेल एवं गैस क्षेत्रों का प्रबंधन करती है, इनमें विश्व का सबसे बड़ा तटवर्ती तेल क्षेत्र घावर फील्ड और विश्व का सबसे बड़ा अपतटीय तेल क्षेत्र सफानिया फील्ड भी शामिल है।

सउदी अरब के अरामको सहित अनेक तेल उत्खनन प्रतिष्ठानों की चार दशक पहले अमेरिकी सहयोग से जो प्रगति हुई और जिस आधार पर वैश्विक तेल व्यापार सबसे उन्नत हुआ, वह अमेरिका-सउदी अरब के लिए अति लाभकारी सिद्ध हुआ। रूस, चीन और ईरान को इससे बड़ा झटका लगा था। वैश्विक प्रतिबंधों के बाद भी ईरान का गुप्त परमाणु हथियार परीक्षण कार्यक्रम इसी घटना की प्रतिक्रिया है। भले रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन अरामको तेल उत्खनन प्रतिष्ठान पर हुए ड्रोन हमले के लिए ईरान को निर्दोष बता रहे हैं और अमेरिकी विदेशी मंत्री माइक पोम्पियो हमले का दोषारोपण ईरान पर किए जाने को अप्रामाणिक बता रहे हों, पर इस संदर्भ में भारत का आत्ममंथन यदि स्वतंत्र होगा तो उससे पूर्णत: यही सिद्ध होगा कि सउदी अरब द्वारा तेल एवं प्राकृतिक गैस के क्षेत्र में की गई प्रगति पर ईरान जैसे मुसलिम देशों की दृष्टि अनुकूल तो कम से कम नहीं ही है।

सउदी अरब और ईरान मूलत: मुसलिम देश होकर भी शिया और सुन्नी में विभाजित हैं। इसी आधार पर उनके सामाजिक और व्यापारिक मतभेद पनपते रहे हैं। रूस, ईरान के पक्ष में इसलिए बोल रहा है क्योंकि उसकी सामरिक और वैज्ञानिक प्रगति के उत्पाद खरीदने के लिए ईरान और उसके पिछलग्गू मुसलिम देश भी बड़े ग्राहक हैं। फिर रूस मध्य-पूर्वी मुसलिम देशों के बल पर अपनी वैश्विक कूटनीति का प्रसार करने का परंपरागत अवसर भी नहीं चूकना चाहता। यह भी हो सकता है कि विश्व के विकसित देशों के गुटतंत्र में उपेक्षित छूट जाने के अपमान का बदला रूस ने ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और चीन की उन नीतियों का समर्थन करके किया है जो उसके संज्ञान में उसके मित्र राष्ट्र भारत सहित कई दक्षिण एशियाई राष्ट्रों के लिए आत्मघाती हैं। उसे चूंकि विश्व के शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में जैसे-तैसे अपनी पहचान बनाए रखनी है, इसलिए अब अरामको पर हमले के संदर्भ में ईरान की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष अथवा चाही-अनचाही हर प्रकार की भूमिका पर वह परदा डालना चाहता है।

ईरान के समर्थन में खड़े यमन के हूती विद्रोही अरब केंद्रित मुसलिमों से शिया-सुन्नी आधार पर धार्मिक मतभेद रखते आए हैं। सउदी अरब की उन्नति उनकी दृष्टि में हमेशा खटकती रही है। वे अरब को सदैव कोई न कोई हानि पहुंचाने का प्रयास करते रहे हैं। पिछले महीने ही ओमान की खाड़ी में तेल के दो टैंकरों को विस्फोट कर उड़ाया गया था। जांच और प्रमाण के बाद यही सिद्ध हुआ कि ईरान के गुप्त संकेत पर यमन के हूती विद्रोहियों और समुद्री लुटेरों ने विस्फोट किया। हालांकि अपने आरक्यू-4 ग्लोबल हॉक सर्विलांस ड्रोन की सहायता से अमेरिका ने विस्फोट के बाद घटनास्थल की सघन जांच करनी चाही, परंतु ईरान ने अमेरिकी ड्रोन हवा में ही नष्ट कर दिए थे। तब से ईरान और अमेरिका के बीच कटुता पहले से ज्यादा बढ़ गई है।

ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध लगा हुआ है। अमेरिकी आदेश के अनुसार वह भारत सहित कई देशों को अपने तेल की आपूर्ति नहीं कर सकता। इससे उसका व्यापार प्रभावित हो रहा है। परमाणु संधि के संबंध में अमेरिका, ईरान से पहले ही खफा है। किसी तरह ट्रंप ईरान से परमाणु संधि पर बात करने को राजी हुए थे, परंतु अरामको पर दो दिन पहले हुए ड्रोन हमले अब संधि पर चर्चा का दरवाजा बंद कर चुके हैं। हमले के बाद अरामको से तेल आपूर्ति ठप हो चुकी है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल मूल्यों में वृद्धि होना स्वाभाविक है। इसका दुष्प्रभाव भारत पर भी अवश्य पड़ेगा। ईरान से पहले ही तेल की आपूर्ति बंद है। ऐसे में अरामको संयंत्र पर हमला नई वैश्विक ऊर्जा समस्या उत्पन्न कर चुका है।

 

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