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राजनीति: रक्षा बजट और पाक की रणनीति

पाकिस्तानी सैन्य बजट में इजाफा न होना भविष्य के लिए अच्छे संकेत माने जा सकते हैं। इससे एशियाई मुल्कों में हथियार खरीद को लेकर मची होड़ में कमी आ सकती है। पिछले कुछ दशकों में एशियाई देशों में सैन्य बजट जिस तेजी से बढ़ा है, उससे सैन्यीकरण को तेजी से बढ़ावा मिला है और एशिया क्षेत्र को भारी नुकसान हुआ है।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान। (फोटो-पीटीआई)

संजीव पांडेय

जब पूरे दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया में सैन्यीकरण पर भारी जोर हो, तब भी अगर कोई मुल्क अपना रक्षा बजट नहीं बढ़ाता है तो यह चौंकाने वाली बात हो सकती है। बेशक इसका मुख्य कारण आर्थिक संकट है। पर भविष्य में शायद यही फैसला कुछ संकेत लेकर आए। आज एशिया ही सैन्यीकरण का प्रमुख केंद्र बन गया है। चीन, भारत, जापान, उत्तर कोरिया, पाकिस्तान, सऊदी अरब और ईरान जैसे देश सैन्यीकरण को बढ़ावा दे रहे हैं। भारत, पाकिस्तान, ईरान और उत्तर कोरिया जैसे देश तो भारी सैन्यीकरण का नतीजा भुगत रहे हैं, क्योंकि ये मुल्क क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग को बढ़ाए जाने के बजाय अभी तक सैन्य शक्ति बढ़ाने में लगे रहे। भारत, पाकिस्तान और चीन तो इसकी शुरुआत काफी पहले कर चुके थे।

खराब आर्थिक हालात के मद्देनजर पाकिस्तान ने इस साल रक्षा बजट में बढ़ोतरी नहीं की। अगर डॉलर के नजरिए से देखें तो पाकिस्तानी रक्षा बजट में कटौती हो गई है। हालांकि लोग पाकिस्तान के रक्षा बजट में कटौती को लेकर उसका मजाक भी उड़ा रहे हैं। लेकिन अगर इसे दूसरे नजरिए से देखा जाए तो भविष्य में यह क्षेत्रीय शांति के लिए अच्छे संकेत भी हो सकते हैं। पाकिस्तान में वर्ष 2019-20 के लिए पेश बजट में रक्षा बजट के लिए 1152 अरब रुपए का प्रावधान किया गया है। 2018-19 में पाकिस्तान का रक्षा बजट 1137 अरब रुपए था। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले पाकिस्तानी रुपया गिर गया है। इस कारण डॉलर के नजरिए से पाकिस्तानी रक्षा बजट में इस साल लगभग दो अरब डॉलर की कटौती हो गई। इससे दुनिया भर के हथियार कारोबारी मायूस हो गए हैं, क्योंकि डॉलर में रक्षा बजट कम होने से पाकिस्तान की हथियार खरीद क्षमता पर असर पड़ेगा। डॉलर के नजरिए से पाकिस्तानी रक्षा बजट 7.6 अरब डॉलर का रह गया है, जबकि वर्ष 2018-19 में यह 9.6 अरब डॉलर का था।

पाकिस्तानी सैन्य बजट में इजाफा न होना भविष्य के लिए अच्छे संकेत माने जा सकते हैं। इससे एशियाई मुल्कों में हथियार खरीद को लेकर मची होड़ में कमी आ सकती है। पिछले कुछ दशकों में एशियाई देशों में सैन्य बजट जिस तेजी से बढ़ा है, उससे सैन्यीकरण को तेजी से बढ़ावा मिला है और एशिया क्षेत्र को भारी नुकसान हुआ है। जबकि रूस, अमेरिका और पश्चिमी देशों के हथियार उद्योग को एशियाई मुल्कों के इस सैन्यीकरण से खासा लाभ मिला है। दुनिया में सबसे ज्यादा हथियार एशियाई देश ही खरीदते हैं। उत्तर कोरिया के भय से जापान ने अपनी सैन्य ताकत बढ़ाई। भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव के कारण लगातार दोनों मुल्कों का रक्षा बजट लगातार बढ़ा है। 2009 से 2019 के बीच पाकिस्तान के रक्षा बजट में तिहत्तर फीसद की बढ़ोतरी हुई। यह दुनिया के कई देशों के रक्षा बजट के मुकाबले काफी ज्यादा है। इस अवधि में भारत के रक्षा बजट में भी उनतीस फीसद की बढ़ोतरी हुई। भारत और पाकिस्तान दोनों अपने रक्षा बजट का बड़ा हिस्सा हथियारों की खरीद पर लगाते हैं। इसका सीधा लाभ अमेरिका, फ्रांस, रूस और चीन जैसे देशों के रक्षा उद्योग को मिलता है। पाकिस्तान अभी तक सबसे ज्यादा हथियार अमेरिका से खरीदता था। लेकिन अब चीनी रक्षा उधोग ने पाकिस्तान में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई है।

पाकिस्तान अगर सैन्यीकरण के बजाय अपने आंतरिक विकास पर ध्यान देता तो शायद आज पाकिस्तान को यह दिन नहीं देखने पड़ते। पाकिस्तान के भारत, अफगानिस्तान और ईरान विरोधी रवैए ने पाकिस्तान में सैन्यीकरण को बढ़ावा दिया। भारत के खिलाफ पाकिस्तान का छद्म युद्ध आज तक जारी है। इसके लिए पाकिस्तान ने सैन्यीकरण को बढ़ावा दिया। इसी का परिणाम है कि आज पाकिस्तान की गंभीर आर्थिक संकट में है। उसकी भुगतान संतुलन की स्थिति खराब है। आयात बिल चुकाने में पाकिस्तान को दिक्कत आ रही है। विदेशी मुद्रा भंडार दस अरब डॉलर के करीब रह गया है। एक सौ पांच अरब डॉलर का विदेशी कर्ज है। विदेश व्यापार घाटा तीस अरब डॉलर तक पहुंच गया है। पाकिस्तान बड़े पैमाने पर तेल और गैस का आयात करता है। निर्यात के मामले में हालत खराब है। पिछले साल इमरान खान ने जब सत्ता संभाली थी, उस समय पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति डांवाडोल थी। तब सऊदी अरब ने मदद की और छह अरब डॉलर का पैकेज दिया। संयुक्त अरब अमीरात ने भी तीन अरब डॉलर की मदद दी। चीन ने पाकिस्तान को दो अरब डॉलर से ज्यादा दिए। पाकिस्तान ने कर्ज के लिए अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) से भी संपर्क साधा। लेकिन उसने पाकिस्तान के सामने कई कड़ी शर्तें रखीं। इन शर्तों में कर सुधारों की बात थी जिसे पाकिस्तान को मानना पड़ा। कई खर्चों में कटौती के लिए भी पाकिस्तान तैयार हो गया। जनता को दी जाने वाली कुछ सबसिडी भी खत्म करने की बात मानी। हालांकि इससे इमरान खान के मंत्रिमंडल में ही गतिरोध पैदा हो गया। वित्त मंत्री असद उमर ने इस्तीफा दे दिया। वे आइएमएफ की कड़ी शर्तों को मानने के लिए राजी नहीं थे। आइएमएफ की शर्तों को देखते हुए सेना भी आगे आई और सैन्य बजट को पिछले साल के बराबर ही रखने का प्रस्ताव सरकार को दिया।

पाकिस्तान के निर्माण के साथ ही पाकिस्तान का सैन्यीकरण शुरू हो गया था। वर्तमान में पाकिस्तान का रक्षा बजट कुल राष्ट्रीय बजट का लगभग बीस फीसद है। किसी जमाने में रक्षा बजट कुल बजट का पचास फीसद तक होता था। लेकिन धीरे-धीरे रक्षा बजट में कटौती की जाने लगी। पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान ने हमेशा तर्क दिया कि तीन तरफ से दुश्मन मुल्कों से घिरे होने के कारण पाकिस्तान का सैन्यीकरण जरूरी है। डूरंड लाइन को लेकर अफगानिस्तान से विवाद था। अफगानिस्तान में सोवियत सेना का प्रवेश, उसके बाद तालिबान के शासन ने पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा पर सैन्य खर्च बढ़ाया। 2007 के बाद पाकिस्तानी तालिबान की पश्चिमी सीमा पर आतंकी सक्रियता ने पाकिस्तानी सेना की परेशानी और बढ़ा दी। पाकिस्तानी सेना ने अफगान सीमा पर कई बड़े सैन्य अभियान चलाए। इसमें पाकिस्तानी सेना के लगभग तीन अरब डॉलर खर्च हुए।

पाकिस्तान के सैन्य बजट का बड़ा खर्च भारतीय सीमा पर होता है। पाकिस्तानी सेना के बजट निर्धारण में भारतीय सीमा की भूमिका बड़ी है। पर पाकिस्तान के दक्षिणी सीमा पर ईरान से भी लंबे समय तक संबंध खराब रहे हैं। इसका कारण शिया-सुन्नी विवाद है। दोनों मुल्क एक दूसरे पर आतंकी संगठनों को संरक्षण देने का आरोप भी लगाते रहे हैं। ईरान पाकिस्तान की सीमा पर बसे ईरानी राज्य सीस्तान-बलूचिस्तान और पाकिस्तानी बलूचिस्तान में लगातार आतंकी संगठन लगातार हमले करते हैं। इसलिए दक्षिणी सीमा पर भी पाकिस्तान को अपना सैन्य बजट का अच्छा हिस्सा खर्च करना पड़ता है। दक्षिणी सीमा पर शांत के लिए हाल ही में इमरान खान ने ईरान का दौरा किया था। इसके अच्छे परिणाम निकलने की उम्मीद दोनों मुल्कों को है। हालांकि पाकिस्तान के रक्षा बजट में बढ़ोतरी न होने और पाकिस्तान के ऊपर संभावित खतरों पर चर्चा हो रही है। चूंकि पाकिस्तान एक परमाणु शक्ति-संपन्न राष्ट्र है, इसलिए परंपरागत रक्षा खर्चों में कुछ समय के लिए पाकिस्तान कटौती कर सकता है। परमाणु शक्ति-संपन्न होने के कारण पाकिस्तान के पर फिलहाल कोई बड़ा खतरा नहीं है। लेकिन सिर्फ परमाणु हथियारों के बल पर राष्ट्र की सुरक्षा भविष्य के लिए अच्छे संकेत नहीं है। इसलिए पाकिस्तान को पूर्वी सीमा पर भारत से भी संबंधों को ठीक करने के लिए प्रयास करने होंगे।

 

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