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राजनीति: शुद्ध हवा का संकट

समुद्र, धरती से लेकर अंतरिक्ष में तमाम उपलब्धियों के बाद भी आज मनुष्य को सांस लेने के लिए न तो शुद्ध हवा है और न पीने के लिए साफ पानी है। खाद्य पदार्थ भी प्रदूषित हो चुके हैं। उनमें ऐसे जहरीले कीटनाशक और रसायन प्रवेश कर चुके हैं जो हमारे स्वास्थ्य के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं।

विश्व के प्रदूषित देशों में दिल्ली, गुरुग्राम शामिल फोटो सोर्सः इंडियन एक्सप्रेस

दुनिया की बड़ी आबादी दूषित हवा में सांस लेने को विवश है। इससे हर साल छह लाख बच्चों सहित करीब सत्तर लाख लोगों की असमय मौत हो जाती है। पर्यावरण और मानवाधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ डेविड बॉयड के अनुसार दुनिया की करीब छह अरब आबादी दूषित आबोहवा में सांस ले रही है, जिससे उसकी जिंदगी और सेहत खतरे में पड़ गई है। इसमें एक तिहाई बच्चे हैं। कई साल प्रदूषित हवा में सांस लेने के कारण लोग कैंसर, सांस की बीमारी और हृदय रोग से पीड़ित हो रहे हैं। इससे हर घंटे आठ सौ लोगों की मौत हो रही है। इसके बावजूद इस ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा। वायु प्रदूषण हर जगह है। इसके प्रमुख कारणों में बिजली के लिए जीवाश्म र्इंधन जलाना, परिवहन और औद्योगिक गतिविधियों के अलावा खराब कचरा प्रबंधन और कृषि संबंधी कार्य हैं।

दुनिया के बीस सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में से पंद्रह भारत के हैं। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) पिछले साल विश्व में सर्वाधिक प्रदूषित क्षेत्र में रूप में उभरा है। नवीनतम डाटा आइक्यूएअर एअरविजुअल-2018 वर्ल्ड एअर क्वालिटी रिपोर्ट में संकलित है। रिपोर्ट ग्रीनपीस साउथ-ईस्ट एशिया के सहयोग से तैयार की गई है। इसमें कहा गया कि विश्व के बीस सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में से अठारह शहर भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के हैं। राजधानी दिल्ली ग्यारहवें नंबर पर है। कभी दुनिया के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में शामिल रही चीन की राजधानी बेजिंग पिछले साल सर्वाधिक प्रदूषित शहरों की सूची में एक सौ बाईसवें नंबर पर थी, लेकिन वह अब भी विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की सालाना सुरक्षित सीमा से कम से कम पांच गुना अधिक प्रदूषित शहर है। तीन हजार से अधिक शहरों में प्रदूषक कण (पीएम) 2.5 के स्तर को दर्शाने वाला डाटाबेस एक बार फिर वायु प्रदूषण से विश्व को खतरे की याद दिलाता है।

औद्योगिक विकास के साथ-साथ पराली, कूड़ा जलाने और पटाखों से भी प्रदूषण की समस्या गंभीर बनी है। आज हमारे पास सांस लेने के लिए न शुद्ध हवा है और न पीने के लिए साफ पानी है। अमेरिका के इंटरनेशनल फूड पालिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के एक अध्ययन के अनुसार पराली से होने वाले प्रदूषण की वजह से भारत को इक्कीस हजार करोड़ रुपए का नुकसान हर साल हो रहा है। जहरीली हवा से बच्चोें में फेफड़ों से संबंधित बीमारियों का खतरा भी बढ़ रहा है। अध्ययन में दावा किया गया है कि पराली जलाने और इससे होने वाले प्रदूषण से प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले लोग खासतौर पर पांच साल से छोटे बच्चों में इसकी वजह से एक्यूट रेस्पिरेटरी इनफेक्शन (एआरआइ) का खतरा तेजी से बढ़ रहा है।

यह अध्ययन इसलिए भी खास है कि कि उत्तर भारत में पराली से अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य को लेकर पहली बार बड़े नुकसान का आकलन सामने आया है। शोधकर्ताओं का दावा है कि पराली से होने वाले प्रदूषण की वजह से पंजाब, हरियाणा और दिल्ली को करीब इक्कीस हजार करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है। इसमें कहा गया है कि जैसे ही पंजाब और हरियाणा में पराली जलना शुरू होती है, अस्पताल में सांस और फेंफड़ों की बीमारियों वाले मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ने लगती है। रिपोर्ट में पटाखों, गाड़ियों आदि से होने वाले प्रदूषण का आकलन भी किया गया है। पटाखों से होने वाले प्रदूषण की वजह से इन हिस्सों में हर साल करीब पचास हजार करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है।

एक चौंकाने वाला दावा यह है कि पिछले पांच सालों के दौरान पराली और पटाखों की वजह से देश को जितना नुकसान हुआ है, वह भारत के जीडीपी के 1.7 फीसद के करीब है। अध्ययन में दावा किया गया है कि सर्दियों में पराली जलाने की वजह से कुछ दिनों तक दिल्ली में पीएम (पार्टिक्यूलेट मैटर) का स्तर डब्ल्यूएचओ के मानकों से बीस गुना तक ज्यादा बढ़ जाता है। इस प्रदूषण में हरियाणा और पंजाब में जलने वाली पराली का काफी बढ़ा योगदान है। हालांकि दिल्ली की तुलना में एआरआई का खतरा अधिक पराली जलने वाली जगहों पर रह रहे लोगों पर तीन गुना ज्यादा है। इस अध्ययन का यह संदेश है कि यदि सावधानी बरती जाए तो इस तरह के प्रदूषण से बचा जा सकता है। पराली को सड़ा कर खाद बनाई जा सकती है और पटाखों पर रोक लगाई जा सकती है।

इंडियन काउंसिल आॅफ मेडिकल रिसर्च (आइसीएमआर) की पिछले दिनों जारी एक रिपोर्ट के अनुसार 2017 में देश में लगभग 12.4 लाख लोगों को प्रदूषित हवा के चलते जान से हाथ धोना पड़ा था। यदि वायु प्रदूषण कम होता तो लोगों की जीवन प्रत्याशा 1.7 साल ज्यादा होती। इतना ही नहीं, इसके चलते लोग तंबाकू के इस्तेमाल की तुलना में बीमार भी कहीं ज्यादा हो रहे हैं। पीएम 2.5 उत्तर प्रदेश और हरियाणा में जानलेवा साबित हो रहा है। लैनसेट प्लैनेटरी हेल्थ जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार वायु प्रदूषण के चलते दुनियाभर में समय-पूर्व मृत्यु दर अठारह फीसद है। जहरीली हवा के चलते पिछले साल भारत में जितने लोग मारे गए, उनमें आधे से अधिक लोगों की उम्र सतहत्तर से कम थी। अमेरिका के यूटा विश्वविद्यालय में हुए एक शोध के मुताबिक वायु प्रदूषण के संपर्क में थोड़ी देर के लिए भी आने से गर्भपात का खतरा बढ़ सकता है।

पर्यावरण में खतरनाक परिघटनाएं सामने आ रही हैं जो पृथ्वी की शक्ल-सूरत को मूलत: बदल सकती हैं और पशु जगत की अनेक जातियों तथा स्वयं मानव वंश के अस्तित्व को खतरे में डाल सकती हैं। प्रति वर्ष साठ लाख हेक्टेयर खेती योग्य भूमि मरुभूमि में परिवर्तित हो जाती है। ऊसर बनी ऐसी जमीन का क्षेत्रफल तीस साल में लगभग सऊदी अरब के क्षेत्रफल के बराबर होगा। प्रति वर्ष एक करोड़ दस लाख से अधिक हेक्टेयर वन उजाड़ दिए जाते हैं, जो तीन साल में ही भारत के क्षेत्रफल के बराबर हो सकता है। अम्लीय वर्षा मानवजाति के लिए सचमुच घोर विपदा बन गई है। जलाशयों में पड़ कर वह सब जंतुओं और वनस्पति तक को मार डालती है। खनिज र्इंधन जलाने के फलस्वरूप कार्बन डाइक्साइड वायुमंडल में उत्सर्जित हो जाती है, जिससे जलवायु विश्वव्यापी पैमाने पर धीरे-धीरे गरम हो रही है। दुनिया के कई इलाकों में भयंकर तूफान, बारिश, बाढ़, प्रलय के नजारे दिखा रही है। शताब्दी के अंत तक औसत भौगोलिक तापमान इतना बढ़ेगा कि कृषि क्षेत्र में बुनियादी परिवर्तन आ जाएंगे, धु्रवीय प्रदेशों के हिम-खंड पिघलने के कारण सागरों की सतह ऊंची हो जाएगी और तटवर्ती नगर डूब जाएंगे।

मानव जाति ने वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति के माध्यम से बहुत कुछ हासिल किया है। उसके जीवन का शायद ही कोई ऐसा पक्ष हो जो आधुनिक विज्ञान, तकनीक और प्रौद्योगिकी से प्रभावित न हो। मनुष्य ने बहुत कुछ रचा, निर्माण और रूपांतरित किया। पर इतना शक्तिशाली होने के बावजूद अपने जीवन की बहुत-सी समस्याएं हल नहीं कर पाया। समुद्र, धरती से लेकर अंतरिक्ष में तमाम उपलब्धियों के हासिल के बाद भी आज मनुष्य को सांस लेने के लिए न तो शुद्ध हवा है और न पीने के लिए साफ पानी है। खाद्य पदार्थ भी प्रदूषित हो चुके हैं। उनमें ऐसे जहरीले कीटनाशक और रसायन प्रवेश कर चुके हैं जो हमारे स्वास्थ्य के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं। वैज्ञानिक प्रगति के बावजूद धरती पर मानव का जीवन संकट में है। दरअसल, आधुनिक विकास के जिस रास्ते पर दुनिया चल रही है वह वास्तव में विनाश का रास्ता साबित हो रहा है।

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