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राजनीति: मोटे अनाज की खेती पर संकट

मोटे अनाज की खेती को लेकर सरकार का रवैया बीते पांच सालों में जितना उत्साहवर्धक होना चाहिए, उतना दिखा नहीं। मोटे अनाज के बहुआयामी लाभों के बावजूद सरकार इनकी सरकारी खरीद, भंडारण और वितरण की कोई व्यवस्था नहीं करती। यही कारण है कि किसान इन फसलों की खेती मजबूरी में ही करते हैं।

Author June 20, 2019 1:00 AM
मोटे अनाज की खेती को लेकर सरकार भी उत्साहित नहीं।

रवि शंकर

एक समय था जब भारत की कृषि उत्पादन प्रणाली में काफी विविधता देखने को मिलती थी। गेहूं, चावल, जौ, राई, मक्का, ज्वार, बाजरा आदि अनेक प्रकार की फसलें उगाई जाती थीं। लेकिन समय के साथ मोटे अनाजों का रकबा कम होता गया। अब स्थिति यह है कि बदली कृषि नीति ने भारतीयों को गेहूं व चावल आदि जैसी फसलों पर निर्भर बना दिया है। इसके अलावा बाजारीकरण के बढ़ते प्रभाव से लोगों का मोटे अनाजों, दलहन और तिलहन की खेती से मोहभंग होता चला गया। हरित क्रांति के दौर में जिस एक फसली खेती को बढ़ावा मिला, उसमें धान और गेहूं जैसी फसलों को केंद्रीय भूमिका प्रदान की गई। इसका परिणाम यह हुआ कि कुल कृषि भूमि में मोटे अनाजों की पैदावार घटती गई। किसान भी गेहूं व धान का रकबा ज्यादा से ज्यादा रखना चाहते हैं, क्योंकि इनका समर्थन मूल्य पर बिकना तय है। इन फसलों का समर्थन मूल्य हर साल बढ़ता है। साथ ही, समर्थन मूल्य पर राज्य सरकारें अतिरिक्त बोनस की घोषणा भी करती हैं। इसलिए किसान हर साल इन फसलों का रकबा बढ़ाते जा रहे हैं। लेकिन ज्यों-ज्यों गेहूं और धान का रकबा बढ़ रहा है, त्यों-त्यों अन्य फसलों- दलहन, तिलहन और मोटे अनाज का रकबा लगातार घटता जा रहा है। प्रोटीन का मुख्य स्रोत माने जाने वाले मोटे अनाज जैसे ज्वार, कोदो, कुटकी, बाजरा अब दुर्लभ हो गए हैं। चिंता की बात यह है कि उच्च कैलोरी वाले ये परंपरागत मोटे अनाज अब हमारी थाली से गायब हो गए हैं। इनकी खेती पर्यावरण के लिए भी अच्छी है। पर पिछले पचास सालों में भारत में मोटे अनाज का रकबा साठ फीसद तक घटा है। इसके स्थान पर अब चावल और गेहूं की खेती ज्यादा होने लगी है। जबकि चावल और गेहूं ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करते हैं। इस पर शायद ही कोई ध्यान दे रहा हो या विचार कर रहा हो।

हम तिलहन और दालों का आयात करते हैं। हमारे छोटे-छोटे कस्बों के हाट बाजार तक में चीन से आयातित तुअर दाल बिक रही है। तुअर दाल शाकाहारियों के प्रमुख प्रोटीन का स्रोत है। मगर आजादी के बाद से इसके रकबे और पैदावार में लगातार गिरावट आ रही है। दलहनों की पैदावार में गिरावट की मुख्य वजह इसके रकबे में लगातार कमी होना है क्योंकि गेहूं और धान के मोह ने किसानों को दालों से दूर कर दिया है। तिलहन के मामले में हम हरित क्रांति के समय तक लगभग आत्मनिर्भर थे और करीब हर गांव में कोल्हू चलते थे। किसान अपने खेत में पैदा की गई मूंगफली, तिल और सरसों से तेल तैयार करवाते थे। लेकिन अब किसान गणेश की पूजा के लिए भी तिल बाजार से खरीदता है और बाजार में यह तिल आ रहा है चीन और ब्राजील से। अगर मलेशिया से पाम आॅयल, अमेरिका और ब्राजील से सोया आॅयल न आए तो देश में खाद्य तेलों को लेकर हाहाकार मच सकता है।

तिलहन की यह स्थिति इसलिए बनी है कि किसान ने इन्हें उगाना ही बंद कर दिया है। अब खेतों में केवल गेंहू, गन्ना और धान होने का सीधा-सा मतलब है कि ये फसलें हमारी फसलों की जैव विविधता को भी खत्म कर रही हैं। एक तरफ तो इन आसान फसलों ने जैविक विविधता को खत्म किया है दूसरी तरफ इनसे जल संकट बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है। इन फसलों में दलहन, तिलहन और मोटे अनाज की तुलना में कई गुना अधिक पानी लगता है। यह पानी धरती से आता है, जिसका सीधा असर भूजल स्तर पर पड़ा है। इससे पेयजल की किल्लत बढ़ रही है और पानी दुर्लभ होता जा रहा है। पानी के साथ इन फसलों में यूरिया की खपत भी लगातार बढ़ती जा रही है, जिससे जमीन का उपजाऊपन नष्ट हो रहा है।

अब योजनाकारों को चिंतन करना है कि देश के लिए, किसान के लिए और आम आदमी के लिए गेहंू, गन्ना और धान के साथ अन्य फसलें भी जरूरी हैं। उन्हें भी न्यूनतम समर्थन मूल्य के साथ प्रोत्साहन और बाजार की व्यवस्था करने की जरूरत है। केवल गेहूं, गन्ना और धान का समर्थन मूल्य बढ़ा कर और उन पर बोनस घोषित कर चुनाव में किसानों के वोट तो बटोरे जा सकते हैं, मगर उसे अन्य जरूरी खाद्यान्न के लिए बाजार के हवाले कर उसका लाभ हानि में ही बदला जा रहा है। साथ ही, फसलों की जैविक विविधता के खात्मे के साथ जल संकट भी तेजी से बढ़ रहा है।

लंबे समय से मोटे अनाजों की खेती को मुख्यधारा में लाने के लिए प्रयासरत हो रहे हैं। मोटे अनाजों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत वितरित करने की योजना बन रही है, जैसे राजस्थान में बाजरा और दक्षिण भारत में रागी का वितरण हुआ है। इन अनाजों के लिए लाभकारी समर्थन-मूल्य घोषित किए जाने, इनकी सरकारी खरीद, भंडारण व विपणन के लिए प्रभावी नेटवर्क बनाने जैसे कदम बड़े उठाने की जरूरत है। इसके अलावा मोटे अनाजों के अनुसंधान व विकास की सुविधाएं देश भर में स्थापित की जाएं, मोटे अनाजों की खेती के लिए रियायती दर पर ऋण सुविधा के लिए कानून बने और सरकार सबसिडी नीति की दिशा मोटे अनाजों की खेती की ओर भी मोड़े, तभी अपेक्षित परिणाम देखने को मिलेंगे। इस प्रकार बदलते मौसम चक्र, एक फसली खेती से हो रहे नुकसान आदि को देखते हुए मोटे अनाज की खेती भविष्य में उम्मीद की किरण के समान है। इससे न केवल कृषि का विकास होगा, बल्कि खाद्य-सुरक्षा के साथ-साथ उचित पोषण और स्वास्थ्य-सुरक्षा भी हासिल होगी।

मोटे अनाज की खेती को लेकर सरकार का रवैया बीते पांच साल में जितना उत्साहवर्धक होना चाहिए, उतना दिखा नहीं। मोटे अनाज के बहुआयामी लाभों के बावजूद सरकार इनकी सरकारी खरीद, भंडारण और वितरण की कोई व्यवस्था नहीं करती। यही कारण है कि किसान इन फसलों की खेती मजबूरी में ही करते हैं। ऐसे में यदि सरकार गेहूं और धान से आगे बढ़ कर इन अनाजों की खरीद, भंडारण और बिक्री का नेटवर्क बनाए तो किसान एक बार फिर मोटे अनाज की बड़े पैमाने पर खेती के लिए प्रोत्साहित हो सकता है। लेकिन इसके लिए जिस राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है, उसका फिलहाल अभाव है। यह ठीक है कि बीते साल सरकार ने पोषक अनाज की पैदावार बढ़ाने के लिए मिशन शुरू किया है। इसके तहत देश के चौदह राज्यों के दो सौ से अधिक जिलों को चिह्नित किया गया है। इन राज्यों की जलवायु मोटे अनाज की खेती के अनुकूल है।

अब एक ऐसी नई हरित क्रांति लाने की आवश्यकता है जिससे मोटे अनाज की पैदावार में वृद्धि हो सके। इससे जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा संकट, भू-जल ह्रास, स्वास्थ्य और खाद्यान्न संकट जैसी समस्याओं को भी काबू किया जा सकता है। इन फसलों को पानी, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों की जरूरत कम पड़ती है और मिट्टी व भू-जल स्तर पर विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता। इसके अलावा, इन फसलों को उगाने में खेती की लागत भी कम बैठती है। सूखा प्रतिरोधी होने के साथ-साथ ये फसलें कम उपजाऊ भूमि पर भी सफलता से उगाई जा सकती हैं। पौष्टिकता और सेहत के मामले में भी मोटे अनाज गेहूं व चावल पर भारी पड़ते हैं। इनमें प्रोटीन, फाइबर, कैल्शियम, लोहा, विटामिन और अन्य खनिज चावल और गेहूं की तुलना में दो गुने अधिक पाए जाते हैं। इन विशेषताओं के बावजूद मोटे अनाज किसानों, कृषि-वैज्ञानिकों और नीति-निर्धारकों की नजर में उपेक्षित हैं तो इसके पीछे प्रमुख कारण जनसाधारण में इनके प्रति फैली उपेक्षा की भावना है।

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