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राजनीति: उपभोक्तावाद और बच्चे

अभिभावक और बच्चों के बीच स्वस्थ संवाद न होने से बच्चों के जीवन से सामाजिक दुनिया दूर हो गई है। जहां उपभोक्तावादी समाज में हर वस्तु एक उत्पाद बन रही है, ऐसी स्थिति में बच्चे भी अब इससे अछूते नहीं हैं। बाजार की संस्कृति के सामने परिवार व स्कूल जैसी संस्थाएं भी कमजोर पड़ रही हैं। परिणामस्वरूप जुड़ाव की भावना, संयम, अनुशासन, परंपराएं, मूल्य, सहानुभूति और प्रेम जैसे शब्द बच्चों के स्वस्थ समाजीकरण की पृष्ठभूमि से गायब हो रहे हैं।

Author July 16, 2019 1:24 AM
सहानुभूति और प्रेम जैसे शब्द बच्चों के स्वस्थ समाजीकरण की पृष्ठभूमि से गायब हो रहे हैं।

विशेष गुप्ता

कुछ समय पहले झांसी के एक किशोर ने मोमो चैलेंज गेम के चंगुल में फंस कर आत्महत्या कर ली थी। पहले भी ऐसी कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। गौरतलब है कि तमाम बहस-मुबाहिसों के बावजूद हम ऐसी घटनाओं पर अंकुश नहीं लगा पा रहे हैं। वह इसलिए कि बच्चे आज हमारी प्राथमिकता में आखिरी पायदान पर हैं। देखने में आ रहा है कि बच्चों की एक बिल्कुल अलग दुनिया बस गई है। सीखने की कच्ची उम्र में वे रातों-रात युवा बन रहे हैं। सोशल मीडिया की नई आभासी दुनिया ने उनके सामने एक नया समूह लाकर खड़ा कर दिया है। दादा-दादी के परिवार में न रहने से आज माता-पिता बच्चों की दुनिया में खिसक कर दूसरे पायदान पर आ गए हैं। यह बात इसलिए सच है कि नई उदार वैश्विक दुनिया के सामाजिक और आर्थिक दबाव के कारण मां-बाप और बच्चों के बीच की दूरी बढ़ती हुई साफ नजर आ रही है। कड़वा सच तो यह है कि इस समय बच्चों का बचपन पूरी तरह उपभोक्तावाद की गिरफ्त में है। देशी और विदेशी शोधों से जो आंकडेÞ सामने आ रहे हैं, उनसे साफ है कि वैश्विक दौर की भागती जिंदगी ने बच्चों की आंखों से नींद ही छीन ली है। बच्चे अब पहले की तुलना में ज्यादा निर्मम, आक्रामक और एकल होते जा रहे हैं। यहां तक कि बच्चों का परिवार के अंदरूनी संबंधों का ढांचा भी दरक रहा है। पिछले दिनों ‘इंडियन पीड्रियाट्रिक्स’ जर्नल में छपी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के बयालीस फीसद बच्चे अनिद्रा के शिकार हैं और इस वजह से नींद में डर जाना, चलना, सोते-सोते बात करना, रोना और डरावने सपने देखना जैसी समस्याएं बच्चों को पेरशान कर रही हैं।

पिछले दिनों अमेरिका के फिलाडेल्फिया के सेंट जोसेफ विश्वविद्यालय द्वारा भारत के लगभग चार हजार बच्चों पर अध्ययन के बाद जो निष्कर्ष निकाले गए, उनसे साफ हुआ कि भारतीय बच्चे यूरोपीय बच्चों की तुलना में कम नींद ले पा रहे हैं। परिणामत: बच्चों का स्वाभाविक विकास नहीं हो पा रहा है उनके खेलने-खाने की उम्र में ही उनका बचपन विसंगतियों से भर रहा है। बच्चों का घर से भाग जाना, आक्रामक होना, एकांत में रहना, मोबाइल पर गेम की दुनिया में उलझे रहना, मोबाइल गेम की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप आत्मघात की ओर अग्रसर होना- जैसी सामाजिक विसंगतियों की पृष्ठभूमि में कहीं न कहीं पारिवारिक व स्कूली पृष्ठभूमि को टटोलना समय की मांग है।

बच्चों के बदलते व्यवहार के लिए केवल उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कहीं न कहीं इसके लिए बच्चों के बचपन को निश्चित दिशा देने वाली परिवार व स्कूल जैसी संस्थाओं की भूमिका पर विचार करना होगा। अवलोकन बताते हैं कि शहरों और महानगरों में भौतिक जीवन की बदलती जरूरतों के कारण माता-पिता और बच्चों के बीच होने वाले गहरे संवाद का ढांचा चरमरा रहा है। निस्संदेह संयुक्त परिवार अब टूट रहे हैं। अगर कहीं दादा-दादी का परिवारों में दखल है भी तो दूसरी पीढ़ी के बच्चों पर से नियंत्रण की डोर उनके हाथों से खिसक रही है। आज एकल परिवार समाज के आदर्श बन रहे हैं। स्कूल भी किताबी ज्ञान तक सीमित होकर रह गए हैं। ऐसे में स्कूलों में बच्चों का शैक्षिक समाजीकरण और परिवारों में अच्छी परवरिश एक चुनौती बन रहा है। साथ ही बच्चों के प्रति अनुराग और स्नेह की प्रवृत्ति भी शून्य हो चली है।

एसोचेम के सोशल डवलपमेंट फाउंडेशन ने देश के तीन हजार कामकाजी माता-पिता पर एक अध्ययन कराया था। इसमें पता चला कि कामकाजी माता-पिता के पास अपने बच्चों के साथ समय गुजारने के लिए केवल बीस मिनट का समय रह गया है। माता-पिता इससे ज्यादा वक्त बच्चों को दे ही नहीं पाते। निश्चित ही बच्चों के विकास के लिए यह कोई अच्छी खबर नहीं है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि कामकाजी माता-पिता के पास समय का अभाव होने से अब वे स्कूल के बाद बच्चों को होमवर्क कराने में भी मदद नहीं करते। सप्ताहांत में भी वे बच्चों के साथ एक वक्त का खाना नहीं खा पाते। इसका सीधा-सा अर्थ यह हुआ कि बच्चों का बचपन अब धीरे-धीरे सूना हो रहा है। अभिभावकों और बच्चों के बीच स्वस्थ संवाद न होने से बच्चों के जीवन से सामाजिक दुनिया दूर हो गई है। जहां उपभोक्तावादी समाज में हर वस्तु एक उत्पाद बन रही है, ऐसी स्थिति में बच्चे भी अब इससे अछूते नहीं हैं। बाजार की संस्कृति के सामने परिवार व स्कूल जैसी संस्थाएं भी कमजोर पड़ रही हैं। परिणामस्वरूप जुड़ाव की भावना, संयम, अनुशासन, परंपराएं, मूल्य, सहानुभूति और प्रेम जैसे शब्द बच्चों के स्वस्थ समाजीकरण की पृष्ठभूमि से गायब हो रहे हैं।

आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, कंप्यूटर, इंटरनेट, सोशल मीडिया, फिल्मों जैसे विभिन्न माध्यम स्कूलों और एकल परिवारों में सेंध लगा कर बच्चों के बीच पारिवारिक व स्कूली भूमिका का स्थानापन्न बन रहे हैं। सच्चाई यह है कि बच्चों के बचपन से माता-पिता और स्कूल के अनुपस्थित रहने का लाभ बहुराष्ट्रीय कंपनियां जम कर उठा रही हैं। यह बाजारवाद की विज्ञापन संस्कृति का ही असर है कि इन्हें अब बच्चे आने वाले समय के नए उपभोक्ता नजर आ रहे हैं। कहने का अर्थ यह है कि उदार दुनिया की गलाकाट होड़ के बीच के बाजार में एकल परिवारों के अकेलेपन से ग्रसित बाल मनोविज्ञान का लाभ उठा कर बच्चों के बीच इन कंपनियों को अपने उत्पाद खपत की अपार संभावनाएं नजर आ रही हैं। बाजार में तमाम देशी व विदेशी कंपनियां बच्चों को मुफ्त वस्तुओं का लालच देकर उनकी गुस्सैल उपभोग की भूमि को उपजाऊ बनाने का काम कर रही हैं। अवलोकन बताते हैं कि आज जितनी बुनियादी जरूरतें परिवारों की बन रही हैं उनमें से लगभग नब्बे फीसद बाल केंद्रित हैं।

यह कटु सच्चाई है कि एकल परिवारों के भी बच्चों से भावनात्मक रिश्ते समाप्त हो रहे हैं। माता-पिता को अपने कारोबार और भोगवादी पार्टियों से फुर्सत ही नहीं है। लिहाजा, बच्चे या तो घर की चारदीवारी में बंद होकर मोबाइल की दुनिया की ओर रुख कर रहे हैं। इस दुनिया की खराब बात यह है कि जब ये बच्चे वास्तविक जीवन की मुश्किलों का सामना करते हैं तब वे ऐसी परिस्थितियों से या तो पलायन करने लगते हैं या फिर तनाव और अवसाद के शिकार हो जाते हैं। हमारे सामने ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहां बच्चों ने अपनी परीक्षाओं के साथ अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं, यहां तक कि मोबाइल गेम तक में नाकाम रहने पर या तो अपने साथी की हत्या कर डाली अथवा आत्महत्या कर ली। स्मरण रहे, परिवार में बच्चों को संरक्षण, वात्सल्य व स्नेह का भाव जहां उन्हें सामूहिक सोच व आपसी जुड़ाव वाला बनाता है, वहीं उन्हें सुरक्षा और संरक्षण भी प्रदान करता है।

संचार माध्यमों ने बच्चों के कल्पनालोक और उनके यथार्थ में घालमेल करते हुए आक्रोश, अश्लीलता व हिंसा को केंद्र में लाकर रख दिया है। आक्रामकता, गुस्सा और हिंसा जैसे नकारात्मक तत्त्व अब बच्चों के व्यक्तित्व के सामान्य अनुभव बन रहे हैं। स्कूल व घर की व्यवस्था में धीरे-धीरे एक आक्रोश अपनी पैठ बना रहा है। इस सच्चाई को न तो इस शिक्षा व्यवस्था के नीति-नियंता समझ रहे हैं और न ही अभिभावक।

आज बाल मनोविज्ञान को समझना बड़ा जरूरी है। देखा जाए तो बच्चों के सृजनात्मक व्यक्तित्व के निर्माण के लिए आज शिक्षा, शिक्षक और अभिभावक बच्चों की अनिद्रा, आक्रामकता व हिंसात्मक व्यवहार को रोकने में पूर्ण सहायक हैं। बस आवश्यकता इस बात की है कि बच्चों के साथ संवाद का सिलसिला बना रहे। तभी हम उन्हें आभासी दुनिया से बाहर निकाल कर सृजन की वास्तविक दुनिया से परिचित करा सकेंगे।

 

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