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राजनीति: श्रम सुधारों की दशा और दिशा

अब श्रम कानूनों में लचीलापन लाने और इंस्पेक्टर राज को समाप्त करने के लिए श्रम नियमों को सरलतापूर्वक लागू करना होगा, नए कानूनों की भरमार कम करनी होगी, ऐसी नीतियां और कार्यक्रम लागू करने होंगे जिनसे उत्पादन बढ़े और उपयुक्त सुरक्षा ढांचे के साथ श्रमिकों का भी भला हो।

Author Published on: September 2, 2019 6:00 AM
श्रम नियमों को सरलतापूर्वक लागू करना होगा

जयंतीलाल भंडारी

सरकार ने वेतन संहिता 2019 को अधिसूचित कर दिया है। इससे राष्ट्रीय स्तर पर पचास करोड़ श्रमिकों को अनिवार्य रूप से न्यूनतम वेतन मिलने का रास्ता साफ हो गया है। यह विधेयक सरकार को श्रमिकों के लिए न्यूनतम वेतन लागू करने में मदद करेगा। साथ ही, इससे कर्मचारियों को वेतन भुगतान में मदद मिलेगी। वेतन संहिता में चार श्रम कानूनों, न्यूनतम वेतन कानून, वेतन भुगतान कानून, बोनस भुगतान कानून और समान भत्ता कानून को समाहित किया है। सरकार ने न्यूनतम वेतन का विस्तार देश के पूरे श्रमबल तक किया है और नियोक्ताओं को ठेके पर श्रमिक रखने के लिए कई कई के लाइसेंस लेने की जरूरत भी खत्म कर दी है। इस समय राज्यों को न्यूनतम वेतन तय करने का अधिकार है और देश में दो हजार से ज्यादा तरीके के वेतन-स्तर हैं, इसलिए नए कानून से देशभर में न्यूनतम वेतन का नया तरीका लाभकारी होगा।

नए कानून में यह भी प्रावधान है कि नौकरी छोड़ने या नौकरी से हटाए जाने या कंपनी के बंद होने की स्थिति में कंपनी को दो दिन के अंदर बकाया वेतन का भुगतान करना होगा। नए कानून में एक सौ अठहत्तर रुपए न्यूनतम दैनिक वेतन सुनिश्चित किया गया है। जिन राज्यों में इससे ज्यादा की व्यवस्था है, वहां श्रमिकों को ज्यादा वेतन देने की व्यवस्था जारी रहेगी। इस प्रावधान से मजदूरों का शोषण रुकेगा, क्योंकि अभी भी कुछ राज्यों में दैनिक मजदूरी पचास, साठ और सौ रुपए पर ही अटकी पड़ी है।

इन दिनों न सिर्फ देश, बल्कि पूरी दुनिया की निगाहें भारतीय अर्थव्यवस्था को गति देने के उपायों और अगले पांच वर्षों में उसे पांच लाख करोड़ डॉलर का आकार देने के मद्देनजर भारत की नई श्रम संहिता पर टिकी हैं। इस बार बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री ने कहा था कि सरकार चवालीस श्रम कानूनों को मिला कर चार श्रम संहिताएं बनाएगी। ये संहिताएं न्यूनतम वेतन और कार्यगत सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्यदशा, सामाजिक सुरक्षा और औद्योगिक संबंधों पर केंद्रित होंगी।

श्रम और औद्योगिक कानूनों की संख्या के मामले में हमारा देश दुनिया के दूसरे देशों की तुलना में चुनौतीपूर्ण स्थिति में है। देश में ढेरों श्रम कानून लागू हैं। केंद्र सरकार के पास श्रम से संबंधित चवालीस और राज्य सरकारों के पास सौ से अधिक कानून हैं। देश में कारोबार के रास्ते में कई कानून ऐसे भी लागू हैं जो ब्रिटिश शासनकाल के दौरान डेढ़-दो सौ साल पहले बनाए गए थे। कई वर्षों से यह अनुभव किया जा रहा है कि श्रम कानून भी उत्पादकता वृद्धि में बाधक बने हुए हैं। उच्चतम न्यायालय भी कई बार अप्रासंगिक हो चुके ऐसे कानूनों की कमियां गिनाता रहा है जो काम को कठिन और लंबी अवधि का बनाते हैं। दुनिया के आर्थिक और श्रम संगठन बार-बार यह कहते रहे हैं कि श्रम सुधारों से ही नए भारत का निर्माण हो सकता है।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि भारत के तेज आर्थिक विकास के लिए श्रम सुधार करना काफी जरूरी है। देश के श्रम कानून लंबे समय से लाइसेंस राज की विरासत को ढो रहे हैं। वस्तुत: जो श्रम सुधार नए दौर में आर्थिक व औद्योगिक विकास की मांग है, उसके लिए देश की नई चार श्रम संहिताओं से नई राह बनी है। ऐसे सुधारों से आर्थिक विकास और रोजगार के नए रास्ते खोले जा सकते हैं। निसंदेह श्रमिक हितों का संरक्षण जितना महत्त्वपूर्ण है, उससे ज्यादा जरूरी निवेश के लिए अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण करना है। भारत में विदेशी निवेश और कारोबार संबंधी अनुकूल ठोस कदमों की कमी बनी हुई है। विश्व व्यापार के संदर्भ में आई इकॉनोमिस्ट इंटेलीजेंस यूनिट (ईआइयू) की रिपोर्ट में विकासशील और विकसित देशों में व्यापार करने या उद्योग लगाने के परिप्रेक्ष्य में अनुकूल माहौल की चर्चा की गई है। इस रिपोर्ट में भारत को छियालीसवां स्थान दिया गया है। जबकि चीन, दक्षिण कोरिया, मेक्सिको और थाईलैंड की रैकिंग भारत से काफी ऊपर है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि भारत में उदारीकरण की प्रक्रिया काफी धीमी और जटिल है और श्रम सुधारों की गति मंद है।

अर्थविशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक आर्थिक सुस्ती के कारण भारत में भी पिछले एक साल से आर्थिक सुस्ती का जो दौर चल रहा है, उसमें श्रम सुधारों से तेजी लाई जा सकती है और इसका देश की अर्थव्यवस्था की गतिशीलता पर अनुकूल प्रभाव पड़ेगा। स्थिति यह है कि रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया (आरबीआइ) ने वर्ष 2019-20 के लिए विकास दर का अनुमान घटा कर 6.9 फीसद कर दिया है। रेंटिग एजंसी क्रिसिल ने चालू वित्त वर्ष 2019-20 के लिए आर्थिक विकास दर का अनुमान 7.2 फीसद से घटा कर सात फीसद कर दिया है। अर्थविशेषज्ञों का कहना है कि श्रम सुधारों से निर्यात को गति दी जा सकती है। भारत के मुकाबले कई छोटे-छोटे देश मसलन बांग्लादेश, वियतनाम, थाईलैंड जैसे देशों ने अपने यहां निर्यातकों को एक ओर श्रम सुधारों का उपहार दिया, तो दूसरी ओर ढेरों सुविधाएं भी हैं। इससे इन देशों ने भारतीय निर्यातकों के सामने कड़ी प्रतिस्पर्धा खड़ी कर दी है। छोटे-छोटे देश श्रम सुधार करके तेजी से निर्यात बढ़ा रहे हैं। ऐसे में सरकार का नया श्रम सुधार अभियान निर्यात वृद्धि में सहायक साबित होगा।

अब श्रम कानूनों में लचीलापन लाने और इंस्पेक्टर राज को समाप्त करने के लिए श्रम नियमों को सरलतापूर्वक लागू करना होगा, नए कानूनों की भरमार कम करनी होगी और ऐसी नीतियां और कार्यक्रम लागू करने होंगे जिनसे उत्पादन बढ़े और उपयुक्त सुरक्षा ढांचे के साथ श्रमिकों का भी भला हो। श्रम कानूनों में नए बदलाव का मतलब श्रमिकों का संरक्षण समाप्त करना नहीं है, वरन इससे उद्योग-कारोबार में तेजी आएगी और उद्योगों में नए श्रम अवसर निर्मित होंगे। उद्योग जगत को भी यह समझना होगा कि वह श्रमिकों को खुश रख कर ही आगे बढ़ सकते हैं। सरकार को अधिकतम प्रयास करना होगा कि श्रम संगठन और उद्योग संगठन श्रम और पूंजी के हितों में तालमेल बनाने के लिए खुले मन से संवाद करें। ऐसा होने पर ही सरकार श्रम एवं पूंजी के बीच संतुलन बनाने की कठिन चुनौती का समाधान निकल सकेगा।

इस समय जब देश श्रम सुधारों के रास्ते पर बढ़ रहा है, तब औद्योगिक एवं श्रम संगठनों के विचार मंथन को ध्यान में रखा जाना होगा। यह संतोषप्रद है कि सरकार ने न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने वाली कमेटी में मजदूर संगठनों के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाना सुनिश्चित किया है। देश के प्रमुख श्रम संगठनों ने जहां वेतन और सामाजिक सुरक्षा संबंधी श्रम संहिता को लाभप्रद बताया है, वहीं इन संगठनों ने औद्योगिक संबंधों से जुड़ी संहिता पर आपत्ति भी है। कहा गया है कि श्रम संगठनों के पदाधिकारियों के लिए पात्रता सरकार द्वारा तय किए जाने, हड़ताल करने का अधिकार सीमित करने, कर्मचारियों को एकतरफा तौर पर निकालने और एप्रेंटिस श्रमिकों को अलग करने जैसे प्रावधानों से श्रमिकों के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। ऐसे में श्रमिकों की संतुष्टि के मद्देनजर सरकार को सभी संहिताओं में यथासंभव सुधार करके ही उन्हें कानून की शक्ल देनी चाहिए।

उम्मीद की जानी चाहिए कि देश में तेजी से आर्थिक व औद्योगिक विकास के लिए चार श्रम संहिताएं देश के श्रम क्षेत्र को नया रूप देंगी। इससे देश उत्पादन वृद्धि, निर्यात वृद्धि, रोजगार वृद्धि और विकास दर के ऊंचे लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में बढ़ेगा और भारत वैश्विक उद्योग-कारोबार के क्षितिज पर भी अपनी नई पहचान बनाने में कामयाब हो सकेगा।

 

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