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नोटा की सार्थकता और लोकतंत्र

हालांकि यह विडंबना ही है कि चुनावों में मतदान का फीसद बढ़ाने के लिए जहां मतदाताओं को जागरूक करने के प्रयास किए जाते रहे हैं, वहीं पिछले पांच वर्षों से ईवीएम में नोटा का उपयोग होने के बावजूद मतदाताओं को नोटा की पर्याप्त जानकारी देने और कोई भी उम्मीदवार पसंद न आने की स्थिति में नोटा का बटन दबाने के लिए प्रोत्साहित करने के कोई प्रयास नहीं किए जा रहे।

Author January 8, 2019 4:13 AM
प्रतीकात्मक फोटो (फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस)

योगेश कुमार गोयल

देश की आजादी के समय भारत में लोकतंत्र की स्थापना करते हुए जिस आम आदमी को इस लोकतंत्र की महत्त्वपूर्ण नींव माना गया था, वह हर पांच साल बाद इस भरोसे के साथ मतदान करता है कि चुनी जाने वाली सरकार उसके दुख-दर्द को समझेगी और उसकी तरक्की के लिए हरसंभव जरूरी कदम उठाएगी। किंतु इस आदमी का भरोसा हर बार टूटता रहा और यह सिलसिला यथावत चला आ रहा है। इसके चलते मतदाताओं के मन में रोष पनपता गया क्योंकि चुनावों के दौरान उनके समक्ष कोई विकल्प मौजूद नहीं था। लेकिन कुछ वर्ष पहले उसे ‘नोटा’ के रूप में एक ऐसा विकल्प मिला, जिसके जरिए वह चुनाव में अपनी नापसंद वाले उम्मीदवारों को नकार सकता है। पिछले दिनों हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में जिस प्रकार करीब बारह लाख मतदाताओं ने सभी उम्मीदवारों को खारिज करते हुए ‘नोटा’ के विकल्प को चुना, उससे नोटा एक बार फिर चर्चा में है और ऐसे में लोकतंत्र में नोटा की सार्थकता पर चर्चा करना जरूरी हो गया है। अनुमान लगाया जा सकता है कि चुनाव में जहां एक-एक वोट कीमती होता है, वहां इन बारह लाख नोटा वोटों का कितना महत्त्व रहा होगा। आंकड़ों पर नजर डालें तो सबसे ज्यादा छत्तीसगढ़ में 2.1 फीसद वोट नोटा के खाते में गए। मध्यप्रदेश में डेढ़ फीसद और राजस्थान में 1.3 फीसद मतदादाओं ने नोटा का बटन दबाया। तेलंगाना में नोटा के खाते में 1.1 और मिजोरम में 0.5 फीसद मतदाताओं ने नोटा को अपनाया।

अगर 2017 में हुए पांच विधानसभाओं के चुनावों में नोटा के इस्तेमाल की बात करें तो सभी राज्यों में कई उम्मीदवारों की हार-जीत में नोटा एक बड़ा कारक बन कर उभरा था। इन विधानसभा चुनावों में नोटा को कुल नौ लाख छत्तीस हजार पांच सौ तीन वोट मिले थे। वोटों की इस संख्या को किसी भी सूरत में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उत्तर प्रदेश में नोटा को 0.9 फीसद अर्थात करीब 7.58 लाख वोट मिले थे। इसी प्रकार उत्तराखंड में 50408 लोगों ने नोटा को पसंद किया। पंजाब में नोटा को 0.7 फीसद अर्थात एक लाख चौरासी हजार लोगों ने पसंद किया था, जबकि मणिपुर में 0.5 फीसद अर्थात 9062 लोगों ने नोटा का बटन दबाया था। गोवा में नोटा को कुल मतों के 1.2 फीसद वोट मिले और नोटा को पसंद करने वाले लोगों की संख्या 10919 रही। 2016 में हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव में तो 831835 मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाया था, जो कुल मतदान का डेढ़ फीसद रहा। तमिलनाडु में 557888 मतदाताओं ने जबकि केरल में एक लाख सात हजार मतदाताओं ने नोटा बटन दबाया था।

‘नोटा’ जिसका अर्थ है ‘नन आॅफ द अबॉव’ यानी कि इनमें से कोई नहीं। वर्ष 2009 में चुनाव आयोग ने मतदाताओं के लिए ‘नोटा’ विकल्प उपलब्ध कराने की मंशा जाहिर की थी और एक संस्था ‘पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज’ ने इसके समर्थन में अदालत में एक जनहित याचिका दायर की थी। अंतत: सुप्रीम कोर्ट ने 27 सितंबर, 2013 को ऐतिहासिक निर्णय में चुनाव आयोग को ईवीएम में ‘नोटा’ बटन उपलब्ध कराने का आदेश देते हुए कहा कि नोटा का बटन देने से राजनीतिक दलों पर भी अच्छे चुनाव प्रत्याशी खड़े करना का दबाव रहेगा। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर चुनाव आयोग ने सबसे पहले दिसंबर 2013 में छत्तीसगढ़, मिजोरम, राजस्थान, मध्यप्रदेश और दिल्ली के विधानसभा चुनावों में ईवीएम में ‘नोटा’ बटन का विकल्प उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए, ताकि चुनाव में अपनी पसंद का कोई भी प्रत्याशी न होने पर मतदाता इस बटन का प्रयोग कर सकें। उन चुनावों में पहली बार कुल पंद्रह लाख लोगों ने नोटा का इस्तेमाल किया। उसके बाद 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में भी नोटा का इस्तेमाल किया गया और तब करीब साठ लाख लोगों ने नोटा के विकल्प को चुना, जो इक्कीस पार्टियों को मिले कुल वोटों से भी ज्यादा था।

अदालत के समक्ष यह गंभीर सवाल उठाया गया था कि यदि मतदाताओं को चुनाव के दौरान कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं आता है तो वे अपना मत किसे दें? लंबी जद्दोजहद के बाद मतदाताओं को इसी के अधिकार के रूप में नोटा अस्तित्व में आया और ईवीएम में ‘नोटा के चुनाव चिह्न को सभी चुनाव प्रत्याशियों के अंत में जगह दी गई। 2015 से नोटा को पूरे देश में लागू कर दिया गया और 2018 में इसे पहली बार देश में उम्मीदवारों के समकक्ष दर्जा दिया गया। पिछले साल 16 दिसंबर को हरियाणा में पांच नगर निगमों के चुनाव में हरियाणा चुनाव आयोग ने यह ऐतिहासिक निर्णय लिया कि यदि किसी भी सीट पर नोटा विजयी होता है तो ऐसी स्थिति में वहां सभी प्रत्याशी अयोग्य घोषित हो जाएंगे और चुनाव दोबारा कराया जाएगा, जबकि अभी तक नोटा के विजयी रहने की स्थिति में दूसरे स्थान पर रहने वाले प्रत्याशी को ही विजयी घोषित करने का नियम था। चुनाव आयोग के इस क्रांतिकारी कदम से आमजन की मतदान प्रक्रिया में ज्यादा से ज्यादा भागीदारी बढ़ने की उम्मीदें जगी हैं।

हालांकि यह विडंबना ही है कि चुनावों में मतदान का फीसद बढ़ाने के लिए जहां मतदाताओं को जागरूक करने के प्रयास किए जाते रहे हैं, वहीं पिछले पांच वर्षों से ईवीएम में नोटा का उपयोग होने के बावजूद मतदाताओं को नोटा की पर्याप्त जानकारी देने और कोई भी उम्मीदवार पसंद न आने की स्थिति में नोटा का बटन दबाने के लिए प्रोत्साहित करने के कोई प्रयास नहीं किए जा रहे। फिर भी ‘नोटा’ जिस प्रकार लोकप्रिय हो रहा है, उससे लोकतंत्र में नोटा की सार्थकता निरंतर बढ़ रही है। सवाल यह है कि आखिर देश में चुनाव प्रक्रिया में नोटा की जरूरत क्यों पड़ी? किसी भी राजनीतिक दल का एकमात्र उद्देश्य यही रहता है कि वह ऐसे व्यक्ति को ही अपना प्रत्याशी बनाए, जो किसी भी प्रकार चुनाव में जीत हासिल कर सके, भले ही उसका चाल, चरित्र, चेहरा, योग्यता इत्यादि कैसी भी हो। अधिकांश प्रत्याशी धनबल अथवा बाहुबल के प्रभाव से किसी पार्टी का टिकट हासिल करने में सफल हो जाते हैं और ऐसे उम्मीदवारों में भ्रष्ट, बेईमान, दागी और बागी किस्म के टिकटार्थियों की बहुत बड़ी संख्या होती है। ऐसे में मतदाता के समक्ष दो ही विकल्प थे। पहला तो यही कि वह उन तमाम प्रत्याशियों में से उस प्रत्याशी को अपना मत दे, जो उसकी नजर में सबसे कम खराब छवि का हो और दूसरा विकल्प यह कि वह अच्छा प्रत्याशी न होने के चलते वोट डालने ही न जाए। लोकतांत्रिक व्यवस्था में आमजन की अधिक से अधिक भागीदारी के लिए ही एक अन्य विकल्प पर विचार किया गया, जो ‘नोटा’ के रूप में सामने आया, जिससे मतदाता कोई भी प्रत्याशी पसंद न आने पर सभी को नकार सके लेकिन मतदान करने अवश्य जाए।

दरअसल अभी तक नोटा को मिले मतों का मतगणना पर कोई असर नहीं पड़ता था, क्योंकि अगर किसी चुनाव क्षेत्र में नोटा को सभी उम्मीदवारों से अधिक मत भी मिल जाते थे तो भी सर्वाधिक मत पाने वाला उम्मीदवार ही विजयी होता था। दरअसल, मतगणना के दौरान भले ही नोटा मतों की गिनती उसी प्रकार की जाती रही है, जिस प्रकार उम्मीदवारों के मतों की गिनती होती है, पर नोटा को मिले मतों की वजह से चुनाव निरस्त नहीं होता। लेकिन हरियाणा नगर निगम चुनावों में राज्य निर्वाचन आयोग की ऐतिहासिक पहल के बाद नोटा की सार्थकता लोकतंत्र में पहले के मुकाबले कई गुना बढ़ गई है। सही मायनों में नोटा एक नेता विहीन राजनीतिक आंदोलन है, जिसकी राजनीति में स्वच्छता एवं शुचिता बनाने के लिए आज के कटुतापूर्ण एवं घृणित राजनीतिक माहौल में सख्त जरूरत भी है।

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