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राजनीति: साइबर ठगी की फैलती जड़ें

समझना होगा कि देश में बढ़ रहे साइबर अपराध की इकलौती वजह इस तंत्र के प्रमाणन और निगरानी का अभाव ही नहीं है, बल्कि इसके पीछे उद्योग की परस्पर साठगांठ और वे कई मर्ज हैं जिनके चलते हमारे आइटी पेशेवर ईरान-कतर जैसे देशों की विदेशी नौकरियों के लिए बड़े खतरे उठाना भी मंजूर कर लेते हैं और देश में कोई साइबर गिरोह खड़ा कर अपना पूरा जीवन बर्बाद करने का जोखिम भी ले लेते हैं।

Author December 20, 2018 3:46 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर। (Source: Agency)

अभिषेक कुमार सिंह

बीते दो-ढाई दशकों में दुनिया में भारत की छवि जिन बातों से बनी है, उनमें एक योगदान आइटी क्षेत्र में युवाओं का रहा है। कंप्यूटर-बीपीओ उद्योग में भारत के प्रतिभावान युवाओं में अपनी कामयाबी के ऐसे झंडे गाड़े हैं कि देश जब भी अपनी चंद आधुनिक गौरव गाथाओं का गुणगान करता है, तो आइटी का महकमा सबसे ऊपर की पांत में नजर आता है। लेकिन अब शायद ही कोई हफ्ता ऐसा गुजरता हो, जब देश की जमीन पर किसी बड़े साइबर अपराध की खबर सुनने को न मिलती हो। बैंकों के एटीएम में सेंध लग रही हैं, कंप्यूटर हैक करके फिरौतियां मांगी जा रही हैं, साइबर फर्जीवाड़े कर देश ही नहीं, दुनिया के कई मुल्कों के लोगों को चूना लगाया जा रहा है। इन घटनाओं के बीच हमारे पुलिस महकमे की साइबर सेलों को जैसे सांप सूंघ गया है, क्योंकि वे एक मामला सुलझाते नहीं पाते, दूसरा कोई बड़ा मामला आ जाता है। साइबर अपराधों की तादाद जिस तेजी से बढ़ रही है, उससे यह विचार करने की जरूरत बन गई है कि आखिर हमारी उस युवा पीढ़ी को क्या हुआ है जो आइटी के सीधे रास्तों को छोड़ कर इसकी बदनाम गलियों में घुस गई।

पिछले कुछ महीनों में देश का आइटी हब कहलाने वाले नोएडा-गुड़गांव के दर्जनों फर्जी कॉल सेंटरों ने ढेरों साइबर फर्जीवाड़े कर डाले हैं। मुसीबत का अंदाजा इससे लगा है कि इस मामले में आइटी कंपनी माइक्रोसॉफ्ट के नाम पर भारत से हुए फर्जीवाड़े की शिकायतों पर अमेरिका की जांच एजेंसी फेडरल ब्यूरो आॅफ इन्वेस्टीगेशन (एफबीआइ), इंटरपोल और कनाडा की रॉयल कनैडियन माउंटेड पुलिस ने गुड़गांव और नोएडा पुलिस को मामलों की जांच करने को कहना पड़ा। शिकायत के बाद दिसंबर के शुरुआती हफ्ते में हुई कार्रवाई में ऐसे करीब सत्रह साइबर गिरोहों का पर्दाफाश हुआ और उनसे जुड़े बयालीस लोगों की धरपकड़ हुई। इनमें से आठ कॉल सेंटर गुड़गांव के थे, और नौ नोएडा के। इन लोगों ने अमेरिका, कनाडा, आॅस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड समेत पंद्रह देशों के करीब पचास हजार लोगों के कंप्यूटरों में माइक्रोसॉफ्ट कंपनी के नाम से भेजे गए पॉप-अप के जरिए वायरस (मालवेयर) भेजे और फिर मालवेयर हटाने के लिए सौ से हजार डॉलर तक ऐंठ लिए थे। गुड़गांव में इस साल पच्चीस और नोएडा में अक्तूबर और नवंबर में चौबीस फर्जी कॉल सेंटरों का भंडाफोड़ हुआ।

साइबर लूट की घटनाओं की यह सिर्फ एक बानगी है। एटीएम जालसाजी, बीपीओ के जरिए देश-विदेश में ठगी, क्लोनिंग के जरिए क्रेडिट कार्ड से बिना जानकारी धन-निकासी और बड़ी कंपनियों के खाते और वेबसाइट हैक करने और फिरौती वसूलने की घटनाएं तो बड़े पैमाने पर हो रही हैं। बैंकिंग से जुड़े सुरक्षात्मक उपायों की साइबर अपराधियों ने तो हवा ही निकाल दी है । साइबर ठगी के शिकार हुए सारे लोग डिजिटल सुरक्षा के उपायों से पूरी तरह अनभिज्ञ नहीं कहे जा सकते हैं। इनमें से बहुत से लोग पढ़े-लिखे हैं, लेकिन एटीएम मशीनों में ठगों द्वारा चोरी-छिपे ग्राहकों के कार्ड की सूचनाएं पढ़ने के लिए लगाई गई डिवाइसों (स्कीमर) के कारण अथवा अनजाने में फोन पर मांगी जाने वाली सूचना देने पर वे जालसाजी के शिकार हो जाते हैं। इसी तरह जालसाजी की बहुत-सी घटनाओं से साबित हुआ है कि उपभोक्ता ने सारी सावधानियां बरतीं, लेकिन हैकिंग अथवा एटीएम मशीनों में अपराधियों द्वारा लगाई गई स्कीमर जैसी डिवाइसों से उनके कार्ड की सूचनाएं (कार्ड नंबर, सीवीवी और पासवर्ड) पढ़ ली गर्इं, जिनका बाद में दुरुपयोग किया गया।

यहां जो अहम सवाल है, वह यह है कि आखिर इन साइबर गोरखधंधों के पीछे कौन हैं। ऐसे ज्यादातर मामलों में पकड़ में आए लोग दुर्दांत किस्म के अपराधी नहीं हैं, बल्कि यह साइबर अपराधियों की एक नई पौध है जिसने एफबीआइ तक को हिला दिया है। यह वही पीढ़ी है जिसने देश के तमाम आइटी संस्थानों में ही साइबर-गुर सीखे हैं। मुमकिन है कि इनमें से कुछ लोग मूलत: अपराधी प्रवृत्ति के हों और यह कहना भी आसान लगता है कि जल्दी पैसे कमाने की धुन इनमें से बहुत से लोगों को साइबर अपराध की दुनिया में खींच ले गई है। पर यह पूरा सच नहीं है। आखिर यह वही आइटी पीढ़ी है जिसने एक दौर में भारत को दुनिया भर के आइटी उद्योग का सिरमौर होने के गौरव का अनुभव कराया है। इसलिए यहां यह देखना जरूरी है कि आखिर वे कौन-से कारण हैं जिसकी वजह से साइबर जानकारों की एक फौज अपराध की गली मुड़ गई है।

असल में यह मामला देश की छवि और नौजवानों की प्रतिभा के गलत इस्तेमाल से लेकर उनकी बेरोजगारी का भी है। यह सवाल भी उठाता है कि हमारा आइटी उद्योग प्रमाणन का ऐसा कोई जरिया क्यों नहीं बनाता, जिसमें यदि कोई शख्स अपने आइटी ज्ञान का गलत इस्तेमाल करते पकड़ा जाता है, तो उसेडिग्री-सर्टिफिकेट से वंचित करते हुए उसके कामकाज पर रोक लगा दे। इन कारणों में अमेरिका-ब्रिटेन की कठिन वीजा शर्तों को भी शामिल करना पड़ेगा, जिसकी वजह से भारतीय युवा आइटी पेशेवरों के लिए विदेश में नौकरी के अवसर सीमित हुए हैं। आबादी में तेज बढ़ोत्तरी और आइटी स्कूलों से निकलने वाली फौज के मुकाबले एक तो बाहर से मिलने वाले काम में कमी आई है और दूसरे, देश में ही आइटी की नौकरी के अवसर भी सिकुड़े हैं। यही नहीं, देश में काम कर रही आइटी कंपनियां इन युवा पेशेवरों के साथ दासों जैसा व्यवहार कर रही हैं, यह बात भी कई विशेषज्ञों ने कही है।

आइटी क्षेत्र के इस घटाटोप का एक संकेत इन्फोसिस के सह-संस्थापक नारायण मूर्ति ने वर्ष 2017 में दिया था। उन्होंने कहा था कि इस क्षेत्र के सीनियरों और मैनेजरों को लालच छोड़ना चाहिए और नए नौजवानों के लिए कुछ त्याग करना चाहिए। पिछले करीब एक दशक से सॉफ्टवेयर उद्योग में नवांगतुकों और निचले-मध्य क्रम के कर्मचारियों का वेतन स्थिर बना हुआ है, जबकि इसी दौरान वरिष्ठ पदों पर तैनात लोगों का वेतन एक हजार फीसद तक बढ़ गया है। एक आकलन है कि नामी आइटी कंपनियां नए सॉफ्टवेयर इंजीनियर औसतन सालाना साढ़े तीन लाख रुपए वेतन देती हैं, जो अब से बीस साल पहले ढाई लाख रुपए सालाना था। इस तरह महीने का वेतन करीब बीस हजार रुपए से बढ़ कर करीब तीस हजार रुपए ही हुआ, जबकि इसी दौरान महंगाई दर कहां से कहां पहुंच गई है। साफ है कि आइटी उद्योग की घरेलू जमीन खोखली हो चुकी है, लेकिन उस ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा।

ऐसे हालात में अगर युवा साइबर अपराध करने का जोखिम ले रहे हैं, तो इस पर आइटी उद्योग और सरकार को विचार करना चाहिए। समझना होगा कि देश में बढ़ रहे साइबर अपराध की इकलौती वजह इस तंत्र के प्रमाणन और निगरानी का अभाव ही नहीं है, बल्कि इसके पीछे उद्योग की परस्पर साठगांठ और वे कई मर्ज हैं जिनके चलते हमारे आइटी पेशेवर ईरान-कतर जैसे देशों की विदेशी नौकरियों के लिए बड़े खतरे उठाना भी मंजूर कर लेते हैं और देश में कोई साइबर गिरोह खड़ा कर अपना पूरा जीवन बर्बाद करने का जोखिम भी ले लेते हैं। इसकी फिक्र सरकार को इसलिए करनी चाहिए क्योंकि यह हमारे स्वर्णिम आइटी अतीत और उसके गौरव का मामला है। यह काम इसलिए भी होना चाहिए कि कहीं भारत अब उन बदनाम देशों की सूची में ना शामिल हो जाए जहां से साइबर अपराध के अंतरराष्ट्रीय गोरखधंधों की शुरुआत होती है।

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