ताज़ा खबर
 

मलेरिया नियंत्रण की चुनौती

एक अनुमान के मुताबिक मलेरिया के पैंसठ फीसद रोगी ओड़िशा, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर क्षेत्रों में ही पाए जाते हैं। इनमें भी ज्यादातर मरीज दुर्गम वनीय क्षेत्रों में निवास करते हैं। यहां लोग गरीब तो हैं ही, साथ ही सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं का भी अकाल है।

Author January 12, 2019 4:06 AM
प्रतीकात्मक फोटो (फाइल)

अभिजीत मोहन

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) की यह रिपोर्ट भारत के लिए चिंताजनक है कि 2017 में पूरी दुनिया में सामने आए मलेरिया के कुल मामलों में से अस्सी फीसद मामले भारत और पंद्रह फीसद उप-सहारा अफ्रीकी देशों से थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की कुल आबादी का बड़ा हिस्सा मच्छर जनित इस बीमारी की चपेट में आने की कगार पर था। हालांकि रिपोर्ट के मुताबिक भारत के लिए राहत की बात यह है कि उसने 2016 के मुकाबले 2017 में मलेरिया के मामले घटाने में सफलता हासिल की। साथ ही यह भी कहा गया है कि भारत 2020 तक मलेरिया के मामलों में बीस से चालीस फीसद की कमी लाने की राह पर है। देखना दिलचस्प होगा कि भारत इस लक्ष्य को हासिल कर पाता है या नहीं। चिकित्सा पत्रिका लासेंट की मानें तो भारत में हर साल दो लाख से ज्यादा लोगों की मौत मलेरिया से होती है। यह आंकड़ा विश्व स्वास्थ्य संगठन के पास क्लीनिक और अस्पतालों में होने वाली मौतों की संख्या के आधार पर है। जबकि बड़ी संख्या में मलेरिया से लोगों की मौतें घरों में होती है। ध्यान देना होगा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन स्वीकार भी कर चुका है कि आंकड़े जुटाने को लेकर उनकी सीमाएं हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की हालिया रिपोर्ट से एक बात और उजागर हुई है कि भारत में मलेरिया से निपटने की गति अत्यंत धीमी है और योजनाएं असरदार नहीं हैं। भारत सरकार ने 1953 में राष्ट्रीय मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम (एनएमसीपी) शुरू किया था, जो घरों के भीतर डीडीटी का छिड़काव करने पर केंद्रित था। इसके अच्छे प्रभाव देख कर राष्ट्रीय मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम (एनएमईपी) 1958 में प्रारंभ किया गया। लेकिन 1967 के बाद मच्छरों पर कीटनाशक बेअसर हो गए और मलेरिया रोधी दवाएं भी निष्प्रभावी होती गर्इं। इसके बाद तो देश में फिर से मलेरिया ने जोर पकड़ना शुरू कर दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि देश में मलेरिया और उसके प्रभाव से उत्पन्न अन्य बीमारियां बढ़ने लगीं। इसे ध्यान में रखते हुए 1997 में भारत सरकार ने अपना लक्ष्य रोग के उन्मूलन से हटा कर उसके नियंत्रण पर केंद्रित किया और कीटनाशकों के सार्वत्रिक छिड़काव को रोक कर चुनिंदा भीतरी जगहों पर छिड़काव शुरू किया। 2003 में राष्ट्रीय ज्ञात-कारण बीमारी नियंत्रण कार्यक्रम यानी (एनवीबीडीसीपी) के तहत मलेरिया नियंत्रण को अन्य ज्ञात-कारण बीमारियों के साथ मिला लिया गया, क्योंकि ऐसी सभी बीमारियों की रोकथाम के लिए एक ही रणनीति होती है, जैसे रासायनिक नियंत्रण, वातावरण प्रबंधन, जैविक नियंत्रण और निजी सुरक्षा उपाय। उल्लेखनीय है कि 2005 में भारत में शुरू किए गए राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन का उद्देश्य भी मलेरिया सहित सभी ज्ञात बीमारियों पर नियंत्रण लगाना है।

मलेरिया पर प्रभावी नियंत्रण बनाने के लिए विश्व बैंक भारत सरकार की लगातार मदद कर रहा है। विश्व बैंक के सहयोग से 1997 और 2005 के बीच एक मलेरिया नियंत्रण परियोजना चुनिंदा राज्यों और जिलों में लागू की गई थी। यह परियोजना सरकार द्वारा मच्छरों पर नियंत्रण के प्रयासों से हट कर उनके निवारण, जल्द निदान और उपचार के प्रयासों के समर्थन में कार्यरत थी। जहां भीतरी छिड़काव अधिक लक्ष्य केंद्रित एवं पर्यावरण संरक्षक विकल्पों वाला होना था, वहीं लार्वा भक्षक मछलियों और जैव लार्वानाशकों के इस्तेमाल को प्रोत्साहन दिया गया। यही नहीं, कीटनाशक-उपचारित मच्छरदानियों के इस्तेमाल को भी बढ़ावा दिया गया। यानी कहा जा सकता है कि परियोजना ने पहले के आदेश-आधारित उपायों से हट कर समुदाय समावेशित और स्वामित्व आधारित उपायों को अपनाया। इसका नतीजा यह हुआ कि परियोजना की समाप्ति पर बीमारी की घटनाओं में कमी देखने को मिली। एनवीबीडीसीपी के आंकड़ों पर गौर करें तो इस दरम्यान यानी 1997 में मलेरिया की घटनाएं 26.6 लाख से घट कर 2003 में 18.6 लाख रह गर्इं, साथ ही यह भी अनुभव किया गया कि कार्यक्रम के संचालन में आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत है। इसे ध्यान में रखते हुए 2009 में भारत सरकार की नई राष्ट्रीय मलेरिया नियंत्रण नीति के तहत मलेरिया निवारण में टिकाऊ कीटनाशक-उपचारित मच्छरदानियों के इस्तेमाल को प्रोत्साहन दिया गया और त्वरित निदान उपकरण एवं आर्टेमेसिनिन-आधारित सम्मिश्रण उपचार में प्रशिक्षित समुदाय स्वयंसेवियों के जरिए घटना प्रबंधन का विस्तार किया गया।

मलेरिया मानव को हजारों वर्षों से प्रभावित करता रहा है। संभवत: यह सदैव मनुष्य जाति पर परजीवी रहा है। उल्लेखनीय है कि मलेरिया पर पहला गंभीर वैज्ञानिक अध्ययन 1880 में हुआ था जब एक फ्रांसीसी सैन्य चिकित्सक चार्ल्स लुई अल्फोंस लैवेरन ने अल्जीरिया में काम करते हुए पहली बार लाल रक्त कोशिका के अंदर परजीवी को देखा था। तब उसने ही यह प्रस्तावित किया कि मलेरिया रोग का कारण यह प्रोटोजोवा परजीवी है। यहां ध्यान देना होगा कि मलेरिया प्रमुख रूप से वातावरण एवं जलवायु पर निर्भर करता है। मलेरिया के रोगवाहक तापमान एवं आर्द्रता के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं। हाल के दिनों में जलवायु परिवर्तन के मद्देनजर मलेरिया में भी बदलाव देखे गए हैं। आज मलेरिया से प्रति 30 सेकेंड में एक मौत होती है। इनमें से ज्यादातर पांच वर्ष से कम आयु वाले बच्चे होते हैं। गर्भवती महिलाएं भी इस रोग के प्रति संवेदनशील होती हैं। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि संक्रमण रोकने के प्रयास और इलाज करने के प्रयासों के बावजूद 1992 के बाद इसके मामलों में अभी तक अपेक्षित सफलता हाथ नहीं लगी है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मलेरिया की वर्तमान प्रसार दर इसी तरह बनी रही तो अगले बीस वर्षों में मृत्यु दर दोगुनी हो सकती है। विशेषज्ञों की मानें तो मलेरिया से जुड़े आंकड़े ज्ञात आंकड़ों से कई गुना अधिक होते हैं और इसलिए कि इसके अधिकांश रोगी ग्रामीण इलाकों में रहते हैं।

मलेरिया सामाजिक-आर्थिक जीवन पर बुरी तरह प्रभाव डाल रहा है। यह गरीबी और आर्थिक विकास में अवरोध का कारण बनता जा रहा है। यह पाया गया है कि जिन क्षेत्रों में मलेरिया का ज्यादा प्रभाव है, वहां यह नकारात्मक आर्थिक प्रभाव डाल रहा है। यदि 1995 के आधार पर प्रति व्यक्ति जीडीपी की तुलना करें तो मलेरिया मुक्त क्षेत्रों और मलेरिया प्रभावित क्षेत्रों में इसमें पांच गुना अंतर नजर आता है। जिन देशों में मलेरिया फैलता है, उनके जीडीपी में 1965 से 1990 के मध्य केवल प्रतिवर्ष 0.4 फीसद की वृद्धि हुई और मलेरिया से मुक्त देशों में यह वृद्धि 2.4 फीसद पाई गई। मलेरिया के कारण कितना आर्थिक नुकसान हो रहा है, वह इसी से समझा जा सकता है कि केवल अफ्रीका में प्रतिवर्ष पंद्रह अरब डॉलर का नुकसान हो रहा है। भारत की बात करें तो यहां भी मलेरिया से निपटने में हर वर्ष हजारों करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि देश की तकरीबन पिच्यासी फीसद आबादी मलेरिया के जोखिम वाले क्षेत्रों में निवास कर रही है। एक अनुमान के मुताबिक मलेरिया के पैंसठ फीसद रोगी ओड़िशा, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर क्षेत्रों में ही पाए जाते हैं। इनमें भी ज्यादातर मरीज दुर्गम वनीय क्षेत्रों में निवास करते हैं। यहां लोग गरीब तो हैं ही, साथ ही सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं का भी अकाल है। उचित होगा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन मलेरिया से निपटने के लिए ठोस नीति बनाए जिससे कि मानव को इस जानलेवा बीमारी से मुक्ति मिल सके। लेकिन यह तभी संभव होगा जब विश्व स्वास्थ्य संगठन मूलभूत ढांचे में सुधार के साथ प्रभावशील पूर्ण चेतावनी प्रणाली एवं असरदार नियंत्रण नीतियों पर अमल के साथ मलेरिया से जूझ रहे देशों को जरूरत के मुताबिक फंडिंग करेगा।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

X