ताज़ा खबर
 

गगनयान और चुनौतियां

पिछले कुछ सालों में इसरो ने तमाम कामयाबियों से अपनी क्षमता दुनिया के सामने रखी है। इससे पूरे अंतरिक्ष कारोबार के बाजार में खलबली मची हुई है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान अमेरिका के निजी अंतरिक्ष उद्योग के कारोबारियों और अधिकारियों ने इसरो के कम लागत वाले प्रक्षेपण यानों से कड़ी प्रतिस्पर्धा मिलने की बात एक सार्वजनिक चिंता के रूप में सामने रखी थी।

Author January 5, 2019 3:30 AM
भारत 2022 में अपने तीन यात्रियों को इसरो के बनाए ‘गगनयान’ से अंतरिक्ष में भेजेगा। (फाइल)

अभिषेक कुमार सिंह

अंतरिक्ष में मानव मिशनों का इतिहास देखें तो अब तक अंतरिक्ष में इंसान को भेजने का करिश्मा सिर्फ अमेरिका, रूस और चीन ने किया है। अमेरिका और रूस शीत युद्ध के समय से दुनिया पर अपना वर्चस्व साबित करने की कोशिश में थे, और इसी का नतीजा था अंतरिक्ष और चंद्रमा तक इंसान का पहुंचना। रूस इस मामले में अव्वल रहा कि उसने अपने अंतरिक्ष यात्री यूरी एलेकसेविच गागरिन को दुनिया का ऐसा पहला इंसान बना दिया जो अंतरिक्ष में पहुंचा था। अमेरिका इस मामले में कामयाब रहा कि उसके अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा पर सबसे पहले अपने पांवों की छाप छोड़ने में सफल रहे। इन दोनों कामयाबियों को पांच दशक से ज्यादा अरसा बीत चुका है और इस बीच सिर्फ चीन है, जिसने करीब डेढ़ दशक पहले 15 अक्टूबर, 2003 को अपने नागरिक यांग लिवेई को यान शिंझोऊ-5 से अंतरिक्ष में भेजा था। सफलताओं की इस सूची में भारत का भी नाम अभी तक इस रूप में जुड़ता रहा है कि स्क्वाड्रन लीडर राकेश शर्मा 2 अप्रैल, 1984 को प्रथम भारतीय नागरिक के तौर पर अंतरिक्ष में कदम रख चुके हैं, लेकिन यह करिश्मा मित्र देश रूस की मदद से हुआ था जिसने अपने यान सोयूज-11 से उन्हें अंतरिक्ष में भेजा था। लेकिन अब भारत यह काम खुद के बूते करना चाहता है।

भारत 2022 में अपने तीन यात्रियों को इसरो के बनाए ‘गगनयान’ से अंतरिक्ष में भेजेगा। इसके लिए सरकार ने दस हजार करोड़ रुपए की राशि मंजूर की है। इस अभियान का मकसद देश में विज्ञान और प्रौद्योगिकी को एक नए स्तर पर ले जाना है। इससे अंतरिक्ष में शोध के नए रास्ते खुलेंगे। लेकिन हजारों करोड़ के खर्च के अलावा कई और बातें हैं, जिन्हें लेकर इस महत्त्वाकांक्षी योजना पर सवाल उठते हैं। एक गरीब और विकासशील देश होने के नाते इस अभियान पर भी वही सवाल उठते हैं जो पहले चंद्रयान और मंगलयान मिशन को लेकर पैदा हुए थे। देश के किसान आत्महत्या करें और करोड़ों नौजवान बेरोजगार हों तो तीन लोगों को अंतरिक्ष में भेजने वाले अभियान पर दस हजार करोड़ रुपए का खर्च बेहद खलता है। पूछा जा सकता है कि क्या तीन लोगों को अंतरिक्ष में भेजना इतना जरूरी है कि लाखों लोगों की शिक्षा, चिकित्सा, आवास, बिजली-पानी-सड़क जैसी तमाम बुनियादी जरूरतों को दरकिनार किया जा सके।

बेशक, दस हजार करोड़ के खर्च के बावजूद भारत का गगनयान आज की तारीख में दुनिया में सबसे सस्ता है। मिसाल के तौर पर सबसे नजदीकी मामला चीन का है जिसने रूस की मदद से अपने नागरिक को अंतरिक्ष में भेजा था। तब चीन ने अपने मानव मिशन पर 18,350 करोड़ रुपए के बराबर रकम खर्च की थी। आज अमेरिका के एक अंतरिक्ष मिशन का खर्च तकरीबन तीस हजार करोड़ रुपए बैठता है। गौरतलब है कि चालीस साल पहले अमेरिका ने अपने अपोलो मिशन (चांद पर इंसान भेजने वाले अभियान) पर एक लाख चालीस हजार करोड़ रुपए खर्च किए थे। आज की तारीख में यह रकम करीब सात लाख करोड़ रुपए के बराबर बैठती है। इसके अलावा बीते सत्तावन वर्षों में अमेरिका ने अपने अंतरिक्ष मिशनों पर चौंतीस लाख करोड़ रुपए खर्च किए हैं। उधर रूस हालांकि अपने अंतरिक्ष मिशनों के खर्च को जगजाहिर नहीं करता है, फिर भी अनुमान है कि वह अपने एक अंतरिक्ष अभियान पर बाईस हजार करोड़ रुपए खर्च करता है। इस दृष्टि से देखें तो गगनयान पर खर्च होने वाली दस हजार करोड़ की रकम ज्यादा नहीं है, बल्कि अहम बात प्राथमिकताओं और इस मिशन से मिलने वाली ठोस उपलब्धियों की है।

भारत के इस मिशन पर अंतरिक्ष यात्रियों को कम से कम सात दिन के लिए अंतरिक्ष में रहना होगा। अंतरिक्ष यात्रियों का चयन भारतीय वायुसेना करेगी और उन्हें अंतरिक्ष उड़ान के प्रशिक्षण के लिए विदेशों में भेजा जाएगा। इस मिशन में इस्तेमाल होने वाले रॉकेट जियोसिन्क्रोनस सैटेलाइट लांच वेहिकल मार्क-3 (जीएसएलवी-एमके-3) से कम से कम दो मानवरहित उड़ानें होंगी। सबसे अहम बात है कि यह अभियान स्वदेशी होगा। इसरो इसकी कुछ तकनीक विकसित कर चुका है। जैसे इसरो ने पहले ही क्रू-मॉड्यूल और बचाव प्रणाली (स्केप सिस्टम) का परीक्षण कर लिया है। बाकी तैयारियां अगले कुछ चरणों में पूरी हो जाएंगी। इसरो ने मंगलयान के अलावा अपने रॉकेटों में भारी विदेशी उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित करके जो प्रतिष्ठा हासिल की है, उसे देखते हुए गगनयान से किसी भारतीय को अंतरिक्ष में भेजने का उसका सपना नामुमकिन नहीं लगता है। दस साल तक इसरो के प्रमुख रहे यूआर राव ने एक अवसर पर कहा था कि भारत को अंतरिक्ष में मानव मिशन की एक सख्त जरूरत चीन की चुनौतियों के मद्देनजर है। यानी भारत ने जल्द ही ऐसा नहीं किया तो वह अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी की दौड़ में पड़ोसी चीन से ही मात खा बैठेगा।

असल में, मामला अंतरिक्ष की खोज और उसके (संसाधनों के) दोहन का है। अमेरिका और रूस के बाद चीन इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। वह मानव मिशन को अंतरिक्ष में भेज चुका है और जल्द ही चंद्रमा पर ऐसा मिशन भेजने की उसकी योजना है। अंतरिक्ष के क्षेत्र में दबदबे के लिए जरूरी है कि कोई देश चांद या अंतरिक्ष के मानव मिशनों से अपनी योग्यता व क्षमता लगातार साबित करता रहे। पिछले कुछ सालों में इसरो ने तमाम कामयाबियों से अपनी क्षमता दुनिया के सामने रखी है। इससे पूरे अंतरिक्ष कारोबार के बाजार में खलबली मची हुई है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान अमेरिका के निजी अंतरिक्ष उद्योग के कारोबारियों और अधिकारियों ने इसरो के कम लागत वाले प्रक्षेपण यानों से कड़ी प्रतिस्पर्धा मिलने की बात एक सार्वजनिक चिंता के रूप में सामने रखी थी।

यह एक सच्चाई है कि आज की दुनिया दूरसंचार से लेकर मौसम की जानकारी तक के लिए काफी हद तक अंतरिक्ष में तैनात उपग्रहों पर आश्रित है। यही वजह है कि अब सूचना तकनीक (आइटी) और बीपीओ उद्योग के बाद अंतरिक्ष परिवहन दुनिया में ऐसे तीसरे क्षेत्र के रूप में उभरा है, जिसमें भारत को पश्चिमी देशों की आउटसोर्सिंग से अच्छी-खासी कमाई हो रही है। माना जाता है कि इसरो से उपग्रहों का प्रक्षेपण करवाने की लागत अन्य देशों के मुकाबले तीस से पैंतीस फीसद कम है। हालांकि इसरो इस कीमत का खुलासा नहीं करता, पर वह एक उपग्रह को कक्षा में स्थापित करने के लिए अमूमन 25-30 हजार डॉलर प्रति किलोग्राम के हिसाब से शुल्क लेता है। भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए विदेशी उपग्रहों को अपने राकेटों से अंतरिक्ष में भेजने का उपक्रम असल में पैसा जुटने का एक जरिया है।

आज स्थिति यह है कि कई यूरोपीय देश भारतीय रॉकेट से अपने उपग्रह अंतरिक्ष में भेजना इसलिए पसंद करते हैं कि यह उन्हें सस्ता पड़ता है। इसके अलावा भारतीय राकेटों की सफलता दर भी काफी ऊंची है। इसरो की कोशिश है कि निजी क्षेत्र की मदद से वह उपग्रहों और राकेटों के निर्माण में तेजी लाए और उन राकेटों के जरिए विभिन्न देशों के उपग्रह बेहद प्रतिस्पर्धी कीमतों पर अंतरिक्ष में छोड़े। इसरो की इस कामयाबी से अमेरिका की निजी कंपनियों की नींद उड़ी हुई है। उम्मीद है कि अंतरिक्ष अनुसंधान और कारोबार में भारत नई पताकाएं फहराएगा और देश की युवा शक्ति को गहन शोध कार्यों की तरफ मोड़ कर उनके रोजगर की इतनी फिक्र की जाएगी कि उन्हें शोध के लिए विदेशों का मोहताज न होना पड़े।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App