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जीएम फसलों से उपजे सवाल

भारत के कृषि मंत्रालय की स्थायी संसदीय समिति की रिपोर्ट ने भी 2009 में खुलासा किया था कि इन बीजों से उपजाई गई फसलें मनुष्य व अन्य सभी जीवों के स्वास्थ्य व शरीर के अंगों पर प्रतिकूल असर डाल रही हैं। भेड़ों पर किए गए परीक्षण में जब उन्हें बीटी कपास के बीज खिलाए गए तो उनके गुर्दे, फेफड़े, जननांग और हृदय के वजन व आकार में आश्चर्यजनक कमी देखने में आई।

Author January 4, 2019 4:43 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Express Archives)

भारत समेत दुनिया के विभिन्न देशों में आनुवंशिक रूप से परिवर्धित (जेनेटिकली मॉडिफाइड) यानी जीएम बीजों से उगाई जाने वाली फसलों पर एक दशक से भी ज्यादा समय से विवाद बना हुआ है। लेकिन हाल में यह विवाद एक बार फिर से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का कारण बना है। नबंवर, 2018 की ‘करंट साइंस’ पत्रिका में प्रकाशित हरित क्रांति के जनक एमएस स्वामीनाथन और पीसी केसवन के लेख में जीएम फसलों की आलोचना की गई थी। इस पर बीज, खाद एवं कीटनाशक उत्पादक बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सरपरस्त वैज्ञानिकों ने तथ्यों को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया। इस विरोध के दबाव में पत्रिका से लेख को हटा दिया गया। इससे पता चलता है कि पश्चिमी हित परस्त वैज्ञानिकों का समूह उस वैज्ञानिक के द्वारा प्रस्तुत तथ्यात्मक जानकारी के विरुद्ध है, जिसने भारत में हरित क्रांति लाकर भारत को खाद्यान्न उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया।

एमएस स्वामीनाथन ऐसे कृषि वैज्ञानिक हैं, जो भारतीय भूमि की विविधता और भारत में पैदा होने वाली बहुफसलीय खेती के महत्त्व को भली-भांति जानते हैं। वे देश के भूगोल से जुड़े पारिस्थितिकी तंत्र और पर्यावरण संरचना को ठीक से जानने वाले वैज्ञानिकों में से हैं। ऐसे में जीएम फसलें भारत के लिए कितनी अहम हैं, उनसे ज्यादा कौन जान सकता है! जीएम फसलों को वैज्ञानिकों का एक पक्ष भूख से मुक्ति का उपाय बताता है, जबकि दूसरा पक्ष इन्हें पर्यावरण और भूमि की उर्वरता के लिए हानिकारक बताता है। हैरानी इस पर है कि फिलहाल जीएम फसलों पर अभी वैश्विक स्तर पर चर्चा हो रही है। बीजों को लेकर हुए विभिन्न शोधों के परिणाम नकारात्मक निकले हैं। इसलिए इन्हें एकाएक अपनाने का विरोध होता है। भारत बीटी कपास के दुष्परिणाम आज भी झेल रहा है।

दरअसल, जैव तकनीक बीज के डीएनए यानी जैविक संरचना में बदलाव कर उनमें ऐसी क्षमता भर देता है, जिससे उन पर कीटाणुओं, रोगों और विपरीत पर्यावरण का असर नहीं होता। नतीजतन, इन्हें फसल की उत्पादकता का भी कारक बताया जाता है। लेकिन फ्रांस के काएन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक गिल्स एरिक सेरालिनी ने इन पर किए शोध में पाया कि ये स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक हैं। सेरालिनी ने कुछ चूहों को दो साल तक जीएम बीजों से उत्पादित अनाज खिलाया। इस कारण चूहों के शरीर पर बड़ी-बड़ी गांठें निकल आर्इं। साथ ही उनमें यकृत और गुर्दे की बीमारियां भी पैदा हो गर्इं। यह शोध लगातार दो साल तक इसलिए किया गया कि चूहों का जीवन इतना ही होता है। यह निष्कर्ष जब 2012 में फ्रांस के साइंस जनरल में छपा तो इसकी तीखी आलोचना हुई। वैज्ञानिकों के एक समूह ने यहां तक कह दिया कि शोध में ईमानदारी नहीं बरती गई है। बाद में अमेरिका की कृषि एवं जैव प्रौद्योगिकी के उत्पादनों से जुड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी मोनसेंटो ने इस लेख को पत्रिका से बाहर निकलवा दिया। यह ठीक वैसा ही था, जैसा एमएस स्वामीनाथन के लेख के साथ हुआ। इसी तरह 1994 में जब पहली बार अमेरिका में जीएम टमाटर उगाया गया तो वहां के निवासियों में अनेक बीमारियां आश्चर्यजनक ढंग से प्रकट हो गईं।

एलर्जी में 400 फीसद, अस्थमा में 300 और आॅटिज्म में 1500 फीसद की वृद्वि हुई। नतीजतन, अमेरिका ने जीएम फसलों के उत्पादन पर रोक लगा दी। भारत के कृषि मंत्रालय की स्थायी संसदीय समिति की रिपोर्ट ने भी 2009 में खुलासा किया था कि इन बीजों से उपजाई गई फसलें मनुष्य व अन्य सभी जीवों के स्वास्थ्य व शरीर के अंगों पर प्रतिकूल असर डाल रही हैं। भेड़ों पर किए गए परीक्षण में जब इन्हें बीटी कपास के बीज खिलाए गए तो इनके गुर्दे, फेफड़े, जननांग और हृदय के वजन व आकार में आश्चर्यजनक कमी देखने में आई। देश में लाखों टन बीटी कपास के बीजों का खाद्य तेलों के निर्माण में उपयोग हो रहा है। भारत में 2002 में जीएम बीज से कपास की खेती करने की अनुमति दी गई। इसके भयंकर दुष्परिणाम ये हुए कि कपास की खेती करने वाला महाराष्ट्र का किसान बर्बाद हो गया। विदर्भ के किसानों ने सबसे ज्यादा आत्महत्याएं इसी बर्बादी के कारण कीं। बीटी कपास का प्रयोग कराने के समय किसानों से कहा गया था कि इससे उत्पादन बढ़ेगा, लेकिन 11वीं पंचवर्षीय योजना में आंकड़ों की पड़ताल करने पर पता चला कि उत्पादन में महज 3.5 फीसद प्रति हेक्टेयर वृद्धि हुई। जबकि बीज निर्माता कंपनी मोनसेंटो ने रॉयल्टी के रूप में 400 करोड़ रुपए का मुनाफा कमाया और यह धनराशि अपने देश ले गई। इससे पता चलता है कि बीज निर्माता कंपनियां किसान की बजाय अपने मुनाफे की चिंता करती हैं। इसके बावजूद 2007 से जीएम सोयाबीन और कैनोला खाद्य तेल भारत लाया जा रहा है। 2008 में भारत में बीटी बैंगन की फसल को मंजूरी दे दी गई थी।

बीटी बीजों का सबसे दुखद पहलू है कि ये बीज एक बार चलन में आ जाते हैं तो परंपरागत बीजों का वजूद ही समाप्त कर देते हैं। बीटी कपास के बीज पिछले एक-ड़ेढ़ दशक से चलन में हैं और कपास की तिरानबे फीसद परंपरागत खेती को लील चुके हैं। नए परीक्षणों से यह आशंका बढ़ी है कि इसके बीजों से बनने वाला खाद्य तेल मनुष्य पर भी बुरा असर छोड़ रहा होगा, क्योंकि बतौर प्रयोग बीटी कपास के जो बीज जिन-जिन मवेशियों को चारे के रूप में खिलाए गए, उनकी रक्त धमनियों में श्वेत व लाल कणिकाएं कम हो गर्इं। जो दुधारू पशु इन फसलों को खाते हैं, उनके दूध का सेवन करने वाले मनुष्य का स्वास्थ्य भी खतरे में है।

राष्ट्रीय पोषण संस्थान हैदराबाद के एक प्रसिद्ध जीव विज्ञानी ने बीटी बीज की वजह से बैंगन की स्थानीय किस्म ‘मट्टुगुल्ला’ के बुरी तरह प्रभावित होकर लगभग नष्ट हो जाने के बारे में चेताया था। बैंगन के ‘मट्टुगुल्ला’ बीज से पैदावार के प्रचलन की शुरुआत पंद्रहवीं सदी में संत वदीराज के कहने पर मट्टू गांव के लोगों ने की थी। इसका बीज भी उन्हीं संत ने दिया था। कर्नाटक में इस किस्म का उपयोग हर साल किया जाता है और लोक पर्वों पर इसे पूजा जाता है। बीटी बैंगन की ही तरह गोपनीय ढंग से बिहार में बीटी मक्का का प्रयोग शुरू किया गया था। इसकी शुरुआत अमेरिकी बीज कंपनी मोनसेंटो ने की थी। लेकिन कंपनी द्वारा किसानों को दिए भरोसे के अनुरूप जब पैदावार नहीं हुई तो किसानों ने शर्तों के अनुसार मुआवजे की मांग की। किंतु कंपनी ने ठेंगा दिखा दिया। हालांकि बाद में बिहार सरकार के कड़े प्रतिवाद के बाद बीटी मक्का के प्रयोग पर रोक लग गई।

आज भारत को इस परिप्रेक्ष्य में सोचने की जरूरत है कि बिना जीएम बीजों का इस्तेमाल किए ही पिछले दो दशक में हमारे खाद्यान्नों के उत्पादन में पांच गुना बढ़ोतरी हुई है। मध्यप्रदेश में बिना जीएम बीजों के ही अनाज व फल-सब्जियों की पैदावार बेतहाशा बढ़ी है। जाहिर है, हमारे परंपरागत बीज उन्नत किस्म के हैं और वे भरपूर फसल पैदा करने में सक्षम हैं। इसीलिए अब कपास के परंपरागत बीजों से खेती करने के लिए किसानों को कहा जा रहा है। हमें भंडारण की समुचित व्यवस्था दुरुस्त करने की जरूरत है। ऐसा न होने के कारण हर साल लाखों टन खाद्यान्न खुले में पड़ा रहने की वजह से सड़ जाता है। लिहाजा, हमें संदिग्ध जीएम बीजों के प्रयोग से बचने की जरूरत है। इन सब तथ्यों को रेखांकित करते हुए डॉ स्वामीनाथन ने कहा है कि तकनीक को अपनाने से पहले उसके नफे-नुकसान को ईमानदारी से आंकने की जरूरत होती है।

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