आदिवासियों पर संकट

आर्थिक वैश्वीकरण ने सारी दुनिया में ऊर्जा और कच्चे माल के लिए कभी न मिटने वाली भूख को तेज कर दिया है। ऐसे में सवाल यह है की क्या आदिवासियों के दावों को खारिज किए जाने के पीछे खनन कंपनियों के लिए अपने खनिज के साथ जंगलों को साफ करने की कोई सरकारी ‘योजना’ तो नहीं है? जब आदिवासी अपने मूल से उजड़ेंगे तो जाएंगे कहां?

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर (Photo: Express Photo/Ganesh Shirsekar)

अमरेंद्र किशोर

वर्ष 1854 में अमेरिका के रेड इंडियन कबीले के सरदार ने वाशिंगटन के उस व्यापारी को पत्र लिखा था, जो आदिवासियों की जमीन खरीदना चाहता था। सरदार ने लिखा था- ‘कोई आकाश या पृथ्वी की आभा कैसे खरीद या बेच सकता है? हवाओं की ताजगी या जल की चमक के जब हम मालिक नहीं हैं, तो तुम उन्हें कैसे खरीद सकते हो?’ उसने आगे लिखा था, ‘गोरे लोग जब मर कर सितारों के बीच चले जाते हैं तो वे अपने उस देश को भूल जाते हैं जहां वे पैदा होते हैं, लेकिन हमारे लोग तो मर कर भी इस जमीन को कभी नहीं भूल पाते क्योंकि वह उनकी मां होती है।’

क्या भारत के आदिवासियों का दर्द रेड इंडियन कबीलों की पीड़ा और हताशा से अलग है? हरगिज नहीं! आजादी हासिल करने की कीमत देश के आदिवासियों ने भी चुकाई है, यह एक सच्चाई है। यह बात दूसरी है कि उनके बलिदान की गाथा गाने वाला न कोई लोकगायक रहा और न उन वीर आदिवासियों के साहसिक और पराक्रमी उपाख्यानों को किसी ने तरीके से बांचने की जरुरत समझी गई। ग्रंथों की गवाही है कि अनेकानेक कालखंडों में फलती-फूलती सभ्यताओं की करारी मार उनके ऊपर पड़ती रही है। अलबत्ता, उन जुल्मों को सहने की ताकत कुदरत ने उन्हें जरूर दी है और उन पर हुए ‘अन्याय’ का अफसोस देश की संसद को भी है।

लेकिन पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय के एक ऐतिहासिक आदेश में खुद को जंगल का निवासी सिद्ध करने में विफल रहे ‘अवैध कब्जेदारों’ को जंगलों से बेदखल करने का निर्देश दिया था। सुप्रीम कोर्ट में राज्यों द्वारा दायर हलफनामों के अनुसार, वन अधिकार अधिनियम के तहत अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वनवासियों द्वारा किए गए लगभग ग्यारह लाख बहत्तर हजार नौ सौ इकत्तीस भूमि स्वामित्व के दावों को विभिन्न आधारों पर खारिज कर दिया गया। इनमें वे लोग शामिल हैं जो ये सबूत नहीं दे पाए कि कम से कम तीन पीढ़ियों से भूमि उनके कब्जे में थी। अदालत का यह आदेश एक ऐसी याचिका पर आया था जिसमें वन अधिकार अधिनियम की वैधता पर सवाल उठाया गया था। याचिकाकर्ता ने पारंपरिक वनभूमि पर दावे खारिज करने की मांग की थी। आश्चर्य की बात है कि सरकार ने बचाव के लिए अपने वकील ही नहीं भेजे और मामले की सुनवाई कर रहे पीठ ने 17 जुलाई तक उन सभी आदिवासियों की बेदखली का आदेश दे दिया जिनके दावे खारिज हो गए हैं। इस आदेश से देशभर में तकरीबन दस लाख लोगों को जंगल खाली करने की नौबत आ गई। ये लाखों लोग वे हैं जो सदियों से जंगलों, पहाड़ों, तराई और वहां के मैदानी इलाकों में रहते चले आ रहे हैं। इन्हीं लोगों को आजादी मिलने के बाद भारत सरकार ने अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया था।

मगर पूरे मामले का मानवीय पहलू इतना संजीदा है कि सुप्रीम कोर्ट को आदिवासियों और वनवासियों को बड़ी राहत देनी पड़ी। इन आदिवासियों का अपना पक्ष है और जंगलों में उनकी उपस्थिति के अपने तर्क हैं। इस बात को ध्यान में रखते हुए फिलहाल उन्हें बेदखल नहीं करने का आदेश कोर्ट ने दिया है। मगर सुप्रीम कोर्ट ने यह जरूर जानना चाहा कि अभी तक सरकारें सोई क्यों रही? वाजिब-सी बात है कि आदिवासियों के पक्ष को सुनने में कोर्ट की अभिरुचि जरूर है, क्योंकि राज्य और जिला स्तर पर सरकार और प्रशासन के कार्य-प्रणाली पर सवाल उठना लाजिमी है। शुरू से ही जनसंगठनों और समाज विज्ञानियों ने अधिनियम के मानकों और कसौटियों पर सवाल उठाए हैं। आज भी सरकार न आदिवासी शब्द को स्पष्ट कर सकी है यानी किसे कहेंगे आदिवासी।

वस्तुस्थिति यह है कि देश का संविधान अनुसूचित जनजातियों को परिभाषित नहीं करता है, इसलिए अनुच्छेद 366(25) अनुसूचित जनजातियों का संदर्भ उन समुदायों के रूप में करता है जिन्हें संविधान के अनुच्छेद 342 के अनुसार अनुसूचित किया गया है। तब उन लोगों के आदिम लक्षणों, भौगोलिक अलगाव, विशिष्ट संस्कृति, बाहरी समुदाय के साथ संपर्क में संकोच और आर्थिक पिछड़ेपन को आधार मान कर देश की कल्याणकारी व्यवस्था में सुविधाओं से सीधे जोड़ा गया। इन्हें देश का मूल बाशिंदा कहते हुए सरकार और संसद ने भी माना कि ‘जंगलों पर पहला अधिकार आदिवासियों’ का है और इसी वजह से वनाधिकार अधिनियम 2006 अस्तित्व में आया था। यह कानून 31 दिसंबर 2005 से पहले कम से कम तीन पीढ़ियों तक वन भूमि पर रहने वालों को भूमि अधिकार देने का प्रावधान करता है। प्रावधान के मुताबिक दावों की जांच जिला कलक्टर की अध्यक्षता वाली समिति और वन विभाग के अधिकारियों के सदस्यों द्वारा की जाती है। इस अधिनियम के तहत मूल बाशिंदों को जंगलों से वनोपज जुटाने और उन्हें बेचने के साथ ही कुछ अन्य खास सुविधाएं दी गर्इं जिससे जन और वन के बीच के संबंधों की न सिर्फ व्याख्या हुई बल्कि उसे फिर से जिंदा किया गया। शीर्ष अदालत ने राज्य सरकारों को अब चार महीने की मोहलत दी है ताकि सरकारें यह बता सकें कि भारी संख्या में दावों के खारिज किए जाने की वजह क्या रही है। खारिज होते दावों को देख कर आदिवासी निराश हो गए, क्योंकि उनमें से कइयों के पास अपनी जमीन का खतियान नहीं था और न ही वह अपने को सिद्ध कर पाए कि वे सदियों से अपने गांव में रहते चले आ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को भी गंभीरता से लिया है।

देश भर से वन समुदायों से शिकायत यही आई है कि सबूतों के अभाव और प्रक्रियाओं की जानकारी के अभाव के कारण और वन विभाग द्वारा सबूत नहीं दिए जाने के कारण आदिवासी अपनी पैरवी ठीक ढंग से नहीं कर पाए और आखिरकार उनके दावे निरस्त हो गए। दुखद पहलू यह है कि जब उच्चतम न्यायालय में इस प्रकरण की सुनवाई हो रही थी उस समय केंद्र सरकार को आदिवासी और वनवासी समाज का पक्ष मजबूती के साथ रखना था। लेकिन आदिवासी और वनवासी हितों के अधिकारों के लिए सरकार उदासीन रही, जिसका परिणाम भी अब सामने है।

वनाधिकार अधिनियम लागू होने के बाद लघु वनोपजों पर पहला और आखिरी अधिकार वहां के मूल बाशिंदों- आदिवासियों या वनों पर आश्रित समाज का हो गया जिससे वन विभागों को घोर ऐतराज था। इसलिए इस कानून के लागू होने के बारह साल बाद भी जमीन पर मालिकाना हक को लेकर दुविधा और भ्रम की स्थिति बनी हुई है। तथ्य यह है कि अधिकारों की प्रक्रिया खराब कर दी गई है। अभी तक देश भर में इकतालीस लाख दावे दर्ज हुए जिनमें मात्र अठारह लाख दावों की मंजूरी दी गई है। मध्यप्रदेश और ओड़िशा में सबसे ज्यादा दावे खारिज किए गए। कई राज्यों में ग्राम सभा कारगर नहीं है, जो दावे की वास्तविकता का आकलन करने के लिए सबसे विश्वसनीय इकाई है। शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी कि ‘यह कानूनी समस्या से कहीं ज्यादा मानवीय समस्या है’, राज्यों के वन विभाग के नाकारेपन की ओर स्पष्ट इशारा है।

आर्थिक वैश्वीकरण ने सारी दुनिया में ऊर्जा और कच्चे माल के लिए कभी न मिटने वाली भूख को तेज कर दिया है। ऐसे में सवाल यह है की क्या आदिवासियों के दावों को खारिज किए जाने के पीछे खनन कंपनियों के लिए अपने खनिज के साथ जंगलों को साफ करने की कोई सरकारी ‘योजना’ तो नहीं है? जब आदिवासी अपने मूल से उजड़ेंगे तो जाएंगे कहां?

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