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राजनीति: कोचिंग संस्थानों का मकड़जाल

ट्यूशन या कोचिंग के बारे में हमारा समाज पहले मानता था कि शिक्षा की यह एक सहायक गतिविधि है, जिसका सहारा लेकर पढ़ाई में कमजोर छात्र परीक्षा में अच्छे अंकों से पास हो सकते हैं। मगर देश में जब से मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों का बोलबाला बढ़ा है और इन संस्थानों से निकले कुछ डॉक्टर-इंजीनियर लाखों-करोड़ों कमाते दिखने लगे हैं, तब से हर कोई अपने बच्चे को इसी कतार में खड़ा करने की तैयारी में जुट गया है।

Author Published on: May 23, 2019 1:47 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

मनीषा सिंह

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए कोचिंग संस्थानों की बढ़ती भूमिका समाज के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। पर देश में ऐसा माहौल बना दिया गया है कि आर्थिक शोषण के बावजूद कोई इसकी जरूरत से इनकार नहीं कर पा रहा है। अब तो ऐसे अध्ययन भी सामने आ गए हैं, जिनमें दावा किया गया है कि कोचिंग के कारण बच्चों पर सिर्फ मनोवैज्ञानिक दबाव नहीं पड़ता, बल्कि कोचिंग उनमें कई शारीरिक व्याधियां भी पैदा कर देती है। हाल में जर्नल आॅफ फेमिली मेडिसिन ऐंड प्राइमरी केयर में प्रकाशित दिल्ली के सफदरगंज और भोपाल के एम्स अस्पतालों के वरिष्ठ डॉक्टरों की देखरेख में किए गए अध्ययनों से पता चला है कि करिअर संवारने के सपने दिखाने वाले कोचिंग सेंटर छात्रों को बीमार कर रहे हैं।

इस अध्ययन के मुताबिक कोचिंग सेंटरों में भीड़, घंटों एक ही जगह बैठे रहने और पीठ को आराम न मिलने से छात्रों की मांसपेशियों में दर्द की शिकायतें बढ़ रही हैं। अध्ययन में शामिल सोलह से बाईस साल के सतासी प्रतिशत विद्यार्थी मांसपेशियों के दर्द से जूझते मिले, जबकि पहले उन्हें कोई परेशानी नहीं थी।
अध्ययन में पता चला कि सतासी फीसद छात्र मस्कुलोस्केलेटल डिसआॅर्डर (एमएसडी) के शिकार पाए गए। एमएसडी असल में मांसपेशियों की बीमारी है, जिसमें गर्दन, कमर के निचले हिस्सा, एड़ी, पीठ के ऊपरी हिस्से, कंधे, घुटने, कलाई आदि की मांसपेशियों में असहनीय दर्द पैदा हो जाता है। अध्ययन करने वाले डॉ. हर्षानंद के मुताबिक ज्यादातर कोचिंग सेंटरों में बच्चे ऐसी बेंच पर बैठते हैं, जिसमें पीठ को पीछे से टेक नहीं मिलती। पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान देने के क्रम में ये छात्र कोई शारीरिक गतिविधि नहीं करते, जिससे मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं। लेट कर या आड़े-तिरछे बैठ कर पढ़ने से परेशानी और बढ़ जाती है।

हालांकि अभिभावकों को इसका अंदाजा है कि कोचिंग में लाखों रुपए खर्च करने के बावजूद छात्रों की जीवन में सफलता की कोई गारंटी नहीं होती, पर वे कथित तौर पर कोई जोखिम नहीं लेना चाहते हैं। इसके अलावा दूसरों की देखादेखी या कोचिंग संस्थानों के प्रलोभन में फंस कर भी वे अपनी जमा-पूंजी का बड़ा हिस्सा गंवा देते हैं और उसके बदले में उन्हें कुछ भी हासिल नहीं होता। शिक्षाशास्त्री इस बारे में चेताते रहे हैं कि खासतौर पर मेडिकल और इंजीनियरिंग के पाठ्यक्रम में दाखिले के लिए ज्यादातर विद्यार्थियों के लिए कोचिंग संस्थानों पर निर्भरता आज एक बड़ी समस्या बन चुकी है, पर विज्ञापन तंत्र के बल पर इन चेतावनियों का असर कम करते हुए कोचिंग संस्थान किसी भी हद तक जाने, कैसे भी प्रपंच रचने और प्रलोभन देने पर आमादा हैं।

यह एक सच्चाई है कि हमारे देश में कोचिंग उद्योग ने पिछले कुछ वर्षों से दिन दूनी, रात चौगुनी प्रगति की है। पढ़ने-पढ़ाने और परीक्षाओं की तैयारी कराने का यह मामला विशुद्ध से रूप से कारोबार में बदल गया है। इसमें करोड़ों के वारे-न्यारे किए जाते हैं। कोचिंग संस्थान वाले यह बात जानते हैं, इसलिए वे इसमें निवेश करने और इसका धंधा चमकाने का कोई मौका छोड़ना नहीं चाहते। प्रतिभाशाली छात्रों को मुफ्त आवास, सुविधाएं और बेहतरीन शिक्षक मुहैया कराने और सफल छात्रों को महंगी कार इनाम देने के उदाहरण वास्तव में कोचिंग के जरिए होने वाली असीमित कमाई के संदर्भ में किए गए मामूली निवेश हैं। ऐसी सफलताओं और पुरस्कारों की घोषणा के आधार पर ये कोचिंग संस्थान पूरे देश में चर्चा का विषय बन जाते हैं।

अपने छात्रों की सफलता का ढिंढ़ोरा पीटते हुए ये कोचिंग संस्थान सालों-साल करोड़ों रुपए की कमाई करते हैं। कुछ समय पहले आर्थिक संस्था एसोचैम ने एक आकलन किया था कि 2015 के अंत तक देश में कोचिंग का कारोबार चालीस अरब डॉलर तक पहुंच गया था। जहां तक दुनिया का अनुमान है, अंदाजा लगाया गया है कि 2022 तक प्राइवेट कोचिंग का कारोबार 227 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा। इसमें भी चीन-भारत जैसे देश काफी आगे होंगे, क्योंकि यहां बढ़ती आबादी के मुकाबले रोजगार के अवसर तेजी से सिकुड़ रहे हैं।

एक आंकड़ा यह भी है कि प्राइमरी में पढ़ने वाले सतासी फीसद और माध्यमिक में पढ़ने वाले करीब पंचानबे फीसद बच्चे ट्यूशन या कोचिंग लेते हैं। इस ट्यूशन की वजह से अभिभावकों की जेब पर भारी बोझ पड़ा है, पर चूंकि वे बच्चे के भविष्य की खातिर कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहते, इसलिए वे कोचिंग से परहेज नहीं करते हैं। यही नहीं, इसी आकलन में अठहत्तर फीसद अभिभावक यह भी मान चुके हैं कि आज बच्चों पर ज्यादा नंबर लाने का दबाव है और बिना कोचिंग के ऐसा करना संभव नहीं है।

ट्यूशन या कोचिंग के बारे में हमारा समाज पहले मानता था कि शिक्षा की यह एक सहायक गतिविधि है, जिसका सहारा लेकर पढ़ाई में कमजोर छात्र परीक्षा में अच्छे अंकों से पास हो सकते हैं। मगर देश में जबसे मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों का बोलबाला बढ़ा है और इन संस्थानों से निकले कुछ डॉक्टर-इंजीनियर लाखों-करोड़ों कमाते दिखने लगे हैं, तबसे हर कोई अपने बच्चे को इसी कतार में खड़ा करने की तैयारी में जुट गया है। आज स्थिति यह है कि देश के सारे इंजीनियरिंग कॉलेजों में कुल मिलाकर चालीस हजार सीटें हैं, मेडिकल कॉलेजों में भी यही हाल है। पर इन सीटों पर दाखिले के लिए हर साल बारह लाख से ज्यादा छात्र भाग लेते हैं। इसका फायदा उठाया है राजस्थान के कोटा और देश की राजधानी दिल्ली से लेकर रांची, लखनऊ, बहराइच जैसे हर छोटे-बड़े शहरों के गली-कूचों में खुले कोचिंग सेंटरों ने। ये कोचिंग संस्थान अपने एकाध पूर्व छात्र की सफलता का ढोल पीटते हुए बच्चे को इंजीनियर और डॉक्टर बनाने का सपना देखने वाले मां-बाप से लाखों रुपए ऐंठने में कामयाब होते हैं।

यहां महत्त्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या हमारा समाज कोचिंग को एक नफरत योग्य बीमारी मानने को तैयार है? बढ़ती आत्महत्याओं के मद्देनजर कोचिंग के खिलाफ अपने देश में खूब आवाजें सुनाई पड़ती रही हैं। यहां तक कि खुद मानव संसाधन विकास मंत्रालय कई बार इस पर चिंता जताता रहा है। ऐसी ही एक टिप्पणी फिल्म अभिनेता परेश रावल ने की थी। उन्होंने प्राइवेट कोचिंग संस्थानों को शैक्षिक आतंकवाद फैलाने वाला बताते हुए देश में प्राइवेट कोचिंग के लिए नियम-कानून बनाने की मांग की थी।

यह आश्चर्यजनक है कि देश में कोचिंग सेंटर खोलने के लिए किसी लाइसेंस की जरूरत नहीं होती, जबकि छोटे से छोटा स्कूल खोलने के लिए सरकार की इजाजत जरूरी है। इस मर्ज का एक विरोधाभासी तथ्य यह है कि लोग अपने बच्चों के सरकारी स्कूलों में पढ़ने के लिए बेशक न भेजें, लेकिन उन कोचिंग सेंटरों में जरूर भेजते हैं जहां सरकारी अध्यापक पढ़ाते हैं। इन तथ्यों के केंद्र में यह इशारा बार-बार मिलता है कि कुछ ऐसे उपाय किए जाएं, ताकि मेडिकल और इंजीनियरिंग एंट्रेंस में कोचिंग की भूमिका घटाई जा सके।

बहरहाल, समाज और सरकार को यह भी देखना चाहिए कि कोचिंग को जरूरी बना देने वाली प्रवेश परीक्षाओं की परिणति इस रूप में निकली है कि विज्ञान और गणित जैसे विषयों में भी रटंत विद्या को प्रश्रय मिला है और मौलिकता तो वहां लगभग मर ही गई है। कोचिंग की बदौलत आज आईआईटी जैसे संस्थानों में भी रट््टू तोतों की भरमार हो गई है, जबकि वहां उन प्रतिभाओं के पहुंचने की सारी गुंजाइशें खत्म हो गई हैं, जो कुछ मौलिक सोचते हैं। सोचना होगा कि आखिर यह कैसी शिक्षा व्यवस्था है, जो कोचिंग के सहारे सिर्फ रट््टू छात्रों को आगे बढ़ाती है और कुछ नया सोचने-करने वाले युवाओं के लिए जीवन और रोजगार के रास्ते बंद करती प्रतीत होती है।

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